मदरसों में छिपा है भारतीय ज्ञान-विज्ञान का रहस्य

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मदरसों में छिपा है भारतीय ज्ञान-विज्ञान का रहस्य शंभूनाथ शुक्ल भारत के प्राचीन इतिहास को जानना कोई गलत बात नहीं है। अगर मौजूदा सरकार के नुमाइंदे ऐसा प्रयास कर रहे हैं तो सराहनीय है। मगर प्रॉब्लम यह है कि इनके आईसीएचआर के कर्णधार जिस मिथ को इतिहास साबित करने पर तुले हैं उसमें गल्प अधिक है प्रामाणिकता कम। अगर श्रीमान वाई सुदर्शन राव गल्प को इतिहास का दर्जा देने की बजाय अरबी-फारसी के लुप्तप्राय ग्रन्थों से भारतीय प्राचीन इतिहास की प्रामाणिकता को नापने का प्रयास करें तो वाकई एक क्रांतिकारी कदम होगा। ऐसा मैं कोई सेकुलरिज्म के प्रति आग्रही होने के कारण नहीं कह रहा बल्कि सत्य यही है। दरअसल अलाउद्दीन खिलजी से लेकर अकबर के काल तक भारत की सातवीं से बारहवीं शताब्दी तक का सारा श्रुति व लिखित साहित्य अरबी व फारसी में अनुवादित हो चुका था। मगर वह साहित्य अब करीने से उपलब्ध नहीं है। अगर उसी साहित्य को फिर से पढ़ा जाए तो काफी कुछ चीजें मिल जाएंगी। अल बरूनी के पहले भी कई अरब भारत आए और यहां का काफी साहित्य का उन्होंने अरबी में उल्था किया। अब अगर उसे तलाशा जाए तो बेहतर रहे। यहां के मुसलमान जो अरबी पढ़ते हैं वे या तो धार्मिक चीजें पढऩा पसंद करते हैं अथवा आधुनिक अरबी साहित्य। बहुत कम लोग हैं जो अरबी में लिखी गई विश्व इतिहास आदि की पुस्तकें पढ़ते हैं। अगर हिंदू गंभीरता पूर्वक अरबी को पढ़ें तो वे प्राचीन हिंदू धर्म और प्राचीन हिंदुस्तान के ज्ञान- विज्ञान की खोज सकारात्मक तरीके से कर सकते हैं। प्राचीन भारत की खोज में लगे लोग मिथ को यूं समझने की कोशिश करें- 1 सबसे पहले जो आर्य भारत आए वे भी दरअसल लुटेरे ही थे और अश्वमेधी घोड़ा छोड़कर उसी तरह राज्य व संपत्ति तथा लोगों को लूटते थे जैसे कि बाद में आए शक-हूण-आभीर व तुर्क लुटेरे। 2 इसके बाद इस बर्बर सभ्यता का नाश हुआ और महाभारत काल से लेकर बुद्घ तक आते-आते दासप्रथा लगभग समाप्त हो गई। 3 इसके बाद सामंतकाल आया और बड़े-बड़े भारतीय साम्राज्य बने। पहला ज्ञात साम्राज्य नंद का था और आखिरी हर्ष का। 4 इसके बाद मुस्लिम व विदेशी साम्राज्य बने। जो मुहम्मद गोरी से लेकर अकबर तक चले। 5 अकबर से लेकर औरंगजेब तक ये विदेशी साम्राज्य उसी तरह हिंदू साम्राज्य हो गए जैसे कि राजपुताने व बुंदेलखंड के सामंत। 6 औरंगजेब के बाद भारतीय जातीय साम्राज्य बने। जैसे मराठा, पंजाबी आदि। 7 फिर आया औपनिवेशिक शासन। सत्य तो यह है कि औपनिवेशिक शासन के दौरान यूरोपीय लोगों ने भारतीय व एशियाई ज्ञान-विज्ञान का भारत में समूल नाश कर दिया। इसिलए अगर वाकई इतिहास अनुसंधान परिषद की भारतीय ज्ञान-विज्ञान को जानने की रुचि है तो इसमें अरबी-फारसी तथा इस्लामी मदरसे मददगार हो सकते हैं।

Deoband Kavisammelan

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मुझे लगता है कि इन तनातनी के दिनों में यह लेख जरूर साया किया जाए। इसे पढ़कर आप वेस्टर्न यूपी की सांप्रदायिक मानसिकता को अच्छी तरह समझ सकते हैं- 
“बात 1995 की है। उस समय मेरठ के कमिश्नर श्री हरभजन लाल विरदी साहब हुआ करते थे। बहन मायावती का राज था और विरदी साहब मान्यवर कांशीराम जी के निकट के रिश्तेदार थे और यूपी की ब्यूरोक्रेसी में एक ईमानदार और सज्जन तथा धर्मभीरु स्वभाव के अफसर। देवबंद नगरपालिका हर साल एक मुशायरा व कवि सम्मेलन का आयोजन करती थी। विरदी साहब ने मुझे कहा कि आप कवि सम्मेलन की बागडोर संभालो और कवियों को बुला लो। मेरे लिए यह बड़ी चुनौती थी। मैं मंचीय कवियों के नखरों से अनजान था। फिर भी अपने कुछ मित्रों से बातचीत कर मंच के लिए उपयुक्त कवियों को बुलवाया। मुझे खुशी है कि पद्म भूषण गोपालदास नीरज तो मेरे सामान्य अनुरोध पर ही आ गए और श्री सोम ठाकुर भी। इस कवि सम्मेलन में राजस्थान की व्यास नाम की एक कवयित्री भी थीं। उन्होंने पिछले दिन मुशायरे में भी शिरकत की थी और उनकी कविताएं खूब सराही गई थीं। खैर निर्धारित समय पर मैं देवबंद पहुंचा। हमारी व्यवस्था देवबंद की चीनी मिल के गेस्ट हाउस में थी। वहां मच्छरों की भरमार थी। इसलिए वहां बैठना तक मुश्किल। उसी समय वहां के एक नगरसेठ के युवराज पधारे। और कवियों से आग्रह किया कि उनके घर चलकर जलपान कर लें। सब राजी हो गए। वे बहुत इसरार कर के उन कवयित्री व्यास को भी ले गए। बीच शहर में उनका महल जैसा घर। कवियों की व्यवस्था उन्होंने भव्य की थी। उस जमाने में कई बोतलें प्रीमियम व्हिस्की की तथा स्टार्टर। कवि गण टूट पड़े। मगर वे कवयित्री चुपचाप बैठी रहीं और उन्होंने कह दिया कि वे शराब नहीं पीतीं। यह बात उन सेठपुत्र को नागवार लगी और बोले- यह कैसे हो सकता है आप कल उन मुल्लों के बीच तो पी रही थीं। उन्होंने कहा कि नहीं उन मुल्लों ने मेरे साथ बहुत ही बेहतर सलूक किया था। किसी ने मुझे न तो शराब पीने को कहा और न ही मांसाहार को। पर वे सेठपुत्र मानें ही नहीं। मैने कहा कि क्यों आप उन भद्र महिला के पीछे पड़े हैं? उनकी जो इच्छा हो खायें-पियें। पर वे और बदतमीजी पर उतारू। अंत में मैने धमकी दी कि देखिए यह कवि सम्मेलन मेरा है। अगर किसी ने भी इन कवयित्री से बदतमीजी की तो मैं रिपोर्ट लिखाऊँगा। मैं अभी सहारनपुर के एसएसपी श्री जवाहर लाल त्रिपाठी और डीएम श्री हरभजन सिंह से बात करता हूं। मेरी धमकी काम कर गई और तत्काल एक कार द्वारा हमें कवि सम्मेलन स्थल में भेज दिया गया। रास्ते में उन कवयित्री ने मुझे धन्यवाद देते हुए कहा- शुक्ला जी ऐसे जाहिल लोग हैं ये हिंदी वाले हिंदू। कल मुझे मुशायरे वालों ने कितनी अधिक इज्जत दी और पूरे समय मुझे बेटी-बेटी कहते रहे। लेकिन हिंदी वालों के यहां तो किसी महिला का मंच पर आकर कविता पढऩा एक निकृष्ट पेशा समझा जाता है। मुशायरे और कवि सम्मेलन में यह फर्क साफ देखा जा सकता है। जहां मुशायरे में आज भी साहित्य की गरिमा रहती है वहीं हिंदी कवि सम्मेलन में एक तरह की लूट खसोट। दोनों के बीच शायद इस फर्क की वजह यह भी है कि हिंदी शुरू से ही हिंदुओं की सवर्ण कही जाने वाली जातियों के हाथ में आ गई इसलिए इसमें जातीय नफरत भी फैली और विधर्मियों के प्रति विद्वेष भी। शायद इसीलिए हिंदी हिंदुस्तान में हिंदू हो गई।“

घर जैसा लगता है अपना यूके!

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घर जैसा लगता है अपना यूके!

शंभूनाथ शुक्ल

उत्तराखंड तो लगता है अपना दूसरा घर बन गया है। गाजियाबाद स्थित अपने घर से हम दोपहर एक बजे निकले। हम यानी कि मित्र सुभाष बंसल उनके पुत्र राहुल बंसल और सार्थक बंसल। सुरेंद्र बिष्ट तथा राजेश झा। रास्ते भर हमारी फोर्ड एंडीवर गाड़ी बिष्ट जी ने चलाई। एक जमाने में बिष्ट जी ब्रिटिश हाई कमीशन में हाई कमिश्नर की गाड़ी चलाते थे। दिल्ली से निकलते ही पहला पड़ाव हरिद्वार रखा गया। वहां पर स्वामी सत्यमित्रानंद के भारत माता आश्रम, गीता आश्रम और माता आनंदमयी आश्रम में रुकने की व्यवस्था तो थी ही मित्र सुनीति मिश्र ने अपने होटल भज गोविंदम में भी इंतजाम कर रखा था। मगर रुकना कहीं संभव नहीं हो सका और सीधे ऋषिकेश होते हुए पहाड़ पर चढ़ गए। वहां नरेंद्र नगर का महाराजा पैलेस भी छोड़ा और आगराखाल, फकोट होते हुए सीधे नागनी जाकर रुके। वहां एक रेस्त्रां में चाय पी। शाम ढलने लगी थी इसलिए आम पहाडिय़ों की तरह यह रेस्त्रां भी बंद हो रहा था पर मुझे देखकर उसने तत्काल चाय बनाई और गरम चाय पीकर चले तो चंबा चढ़कर कंडीसोड पहुंचे। इसके पूर्व जैसे ही कमान्द पार किया कि एक तेंदुआ बीच रास्ते में आ गया। उसकी फोटो लेने की तमन्ना थी मगर वह भाग निकला। फिर चिन्यालीसोड आया। तब तक रात के 11 बज चुके थे। इसके बाद शुरू हुआ धरासू के धसकते पहाड़ों का सिलसिला। रात को थक भी चुके थे सो एक बार सोचा कि ऊपर चढ़कर वन विभाग के रेस्ट हाउस में रुका जाए पर लगा कि सीधे उत्तरकाशी ही ठीक रहेगा। चल पड़े अचानक बीच सड़क पर एक औरत लालटेन लिए प्रकट हुई। थोड़ा अजीब लगा। आधी रात को यह कैसा दृश्य! पर वह औरत जिस तरह प्रकट हुई उसी तरह विलुप्त हो गई। फिर आया डुण्डा। एवरेस्ट विजेता बछेन्द्री पाल का गांव। यहां तिब्बती बसे हैं। इसके बाद मातली और फिर सीधे उत्तरकाशी रात 12 बजे पहुंचे। वहां हमारे पंडित जी श्री जितेंद्र सैमवाल मिले और हम चल पड़े वहां से आठ किमी दूर नैताला की तरफ जहां पर हमारे रुकने की व्यवस्था थी। गंगोत्री जाते समय उत्तरकाशी रुकना ही पड़ता है। मगर मुझे लगता है कि बजाय उत्तरकाशी रुकने के नैताला रुका जाए। वहां पर शुरू में ही गुजरात गेस्ट हाउस है। शांत और सुंदर। भोजन भी लाजवाब और रुकने की व्यवस्था उत्तम। किसी भी स्टार होटल से कम नहीं पर टैरिफ निम्र मध्यवित्त वर्ग के सैलानियों की हैसियत के भीतर। नीचे बहती गंगा और ऊपर चौरस जगह पर नैताला एक छोटा-सा सुंदर गांव। नीचे गंगा तट पर शिवानंद योग केंद्र भी है तथा अन्य तमाम आश्रम भी। मगर मैं गुजरात गेस्ट हाउस में ही रुकना पसंद करता हूं। फिर वहां रुककर आप गंगोत्री अथवा हर्षिल के लिए निकल सकते हैं। वाया मनेरी, भटवारी, गंगनानी व सुक्की टॉप होते हुए सीधे हर्षिल। शांत और सुंदर आर्मी बेस कैंप तथा तिब्बती जाड़ा लोगों का गांव। यहां पर विल्सन ने सेबों के बाग लगाए थे। विल्सन नामक यह अंग्रेज एक फौजी भगोड़ा था जो मेरठ छावनी में एक मर्डर कर अंग्रेज पुलिस की नजर से बच कर भागा या हो सकता है कि अंग्रेज पुलिस ने उसे भगा दिया हो। यहां टिहरी नरेश ने उसे शरण दी बदले में विल्सन ने टिहरी नरेश के जंगलों को काट-काट कर लकड़ी विलायत भिजवाया करता और वहां से जो रेवेन्यू आता वह राजा को देता। विल्सन ने ही गंगोत्री से कलकत्ता तक गंगा का परिवहन रूट तय किया और हाथियों को लकड़ी निकालने के काम में लगाकर उनका व्यावसायिक इस्तेमाल करना टिहरी के राजा को सिखाया। इसीलिए लोग विल्सन को राजा कहने लगे थे। यह हर्षिल गांव ऊपर बसे भारत के अंतिम गांव मुकबा का ही रकबा है। मुकबा में गंगोत्री के पुरोहित सैमवाल लोग आबाद हैं और वे हर साल दीवाली में गंगोत्री से गंगा का कलेवर यहां मुकबा ले आते हैं। मुकबा में रात काटना बहुत मुश्किल होता है। सांय-सांय करते बर्फीले तूफान चलते हैं जिनसे बदन पलट जाने का खतरा बना रहता है और हिम तेंदुआ कभी भी आपको दबोच सकता है। मगर मैं 31 दिसंबर को मुकबा पहुंच ही गया पर पिछले साल के विपरीत इस साल मैं हर्षिल में आर्मी के गेस्ट हाउस तिरपानी काटेज में रुका। वहां हर तरह की सुविधा थी। अटैच्ड बाथरूम, उम्दा भोजन और पेय तथा टीवी व निर्बाध बिजली। मगर एक गड़बड़ हो गई। रात को मैं गीजर की टोटी खोलना भूल गया और सुबह उठा तो गीजर को जोडऩे वाली पाइप लाइन जाम हो चुकी थी। और मैं नहाने के लिए सिर पर शैंपू लगा चुका था। अब न तो बटमैन से गरम पानी मंगाया जा सकता था न तौलिया से बदन पोंछ कर बाहर आया जा सकता था इसीलिए उस माइनस पांच में गंगा जल के शीतल जल से ही स्नान करना पड़ा।

घर वापसी बजरिए कांग्रेसी पत्रकार!

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घर वापसी बजरिए कांग्रेसी पत्रकार!
1983 के जाड़े के दिन थे। एक शाम एक्सप्रेस बिल्डिंग से जनसत्ता की नौकरी कर हम बाहर निकले और खूनी दरवाजे पर आकर 26 नंबर की बस का इंतजार करने लगे। तब हम लोधी रोड रहा करते थे। हम यानी कि मैं और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तथा पूर्व की मनमोहन सरकार के मंत्री श्री राजीव शुक्ल। श्री शुक्ल अपने साथ ही जनसत्ता में थे और वे रात की ड्यूटी पर रहा करते थे। तब दिल्ली में शाम ढलते ही सन्नाटा छा जाता और सड़कें वीरान हो जाया करतीं। मेरी बस 26 नंबर करीब घंटे भर के इंतजार के बाद आई। यह बस मुझे इसलिए मुफीद रहती कि यह ठीक मेहरचंद खन्ना मार्केट के पास उतारती और वहां से मेरा फ्लैट दिखा करता। मगर उस दिन जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में क्रिकेट मैच चल रहा था इसलिए बस दयालसिंह कालेज जाकर टर्मिनेट हो गई। अब मेरे तो होश उड़ गए। न तो मुझे अपने घर का पता मालूम था न रोड न वह इलाका। मेरे पास कुल आठ आने थे उसमें से तीस पैसे बस टिकट में खर्च हो गए और अब आईटीओ वापसी के पैसे भी मेरे पास नहीं थे कि वापस दफ्तर जाकर राजीव से पता पूछ कर आता। तब न तो मोबाइल हुआ करता था न लैंड लाइन फोन सुविधा देने वाले पीसीओ। मैं उस ठंड में भी कांपने लगा। मात्र बीस पैसे लेकर कहां जाऊँ? यूं मैं कानपुर जा सकता था भारतीय रेलवे की फ्री यात्रा सुविधा का लाभ उठाकर। मगर रेलवे स्टेशन जाने के लिए भी न्यूनतम तीस पैसे होने जरूरी थे। तब यही सबसे कम बस टिकट थी। मैं लगभग रुआंसा हो गया। तब ही साक्षात देवदूत की तरह मुझे जनसत्ता के न्यूज एडिटर श्री Gopal Misra दिख गए। मैं भाग कर उनके पास पहुंचा और एक ही सांस में अपनी व्यथा-कथा कह डाली। मिश्रा जी बोले- तुम्हारे घर का कुछ नंबर या लैंडमार्क मालूम है? मैने पूछा कि यह लैंडमार्क क्या बला है? इस नाम का एक होटल जरूर कानपुर में बन रहा है। अब मिश्रा जी मेरे घामड़पन पर खूब हंसे और बोले- ठीक है तुम मेरे घर चलो वहां से फिर हम मिलकर तुम्हारा घर तलाशेंगे। हम पहुंचे मिश्र जी के घर। भाभी जी ने लखनवी अंदाज में चाय पिलाई और मठरियां खिलाईं तब मुझे कुछ चेत आया। मैने बहुत याद करने के बाद बताया कि वहां मदर डेयरी का एक बूथ है और पास में एनडीएमसी आफिसर्स क्वार्टर्स हैं। अब यह कोई पहचान नहीं हुई। खैर मिश्रा जी और हम चले अपना मकान तलाशने। अचानक मुझे वह बूथ दिखा और मैने चहक कर कहा बस मिश्रा जी वह रहा मेरा फ्लैट। हम लोग चूंकि तब वहां ताला-वाला नहीं लगाते थे इसलिए भिड़े किंवाड़ खोले और लॉबी में जाकर देखा तो पता चला अपने फ्लैट का नंबर। अब तो खैर मुझे भी याद है वह नंबर मगर लिखूंगा नहीं क्योंकि पता नहीं कौन भला आदमी वहां रह रहा हो और यह भी संभव है कि वह बेचारा भी सबलेटिंग में रह रहा हो जैसे कि हम रहा करते थे। ऐसा हुआ तो नंबर फ्लैश होते ही बेचारा मुसीबत में पड़ जाएगा क्योंकि ऐसा बताया जाता है कि मेरे फेसबुक अपडेट्स पीएमओ में भी बांचे जाते हैं। पर मिश्रा जी ने उसे रट लिया और कहा कि अब आगे कभी फिर भटकोगे तो आखिर घर वापसी कराने तो मुझे ही आना पड़ेगा। गोपाल जी बाद में कांग्रेस पत्रिका के संपादक रहे और वे खाँटी कांग्रेसी तो खैर थे ही। एक कांग्रेसी ने मेरी सकुशल घर वापसी करवाई।

बेहयाई की इंतहा

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बेहयाई की इंतहा
शंभूनाथ शुक्ल
सांप्रदायिकता पूंजीवाद और औद्योगिक सभ्यता की देन है। बाजार हथियाने के लिए बाजारवादी शक्तियां सांप्रदायिकता का हथकंडा अपनाती हैं। अपनी सांप्रदाकियता की धार को तेज करने के लिए वे अतीत को भी सांप्रदायिक बनाने का कुत्सित प्रयास करती हैं। इसमें कोई शक नहीं कि सामंती काल में भी मंदिर-मस्जिद ढहाए गए पर उसके पीछे सोच सांप्रदायिक नहीं विजित नरेश के सारे प्रतीकों को ध्वस्त करना था। हिंदू शासकों ने भी जब कोई राज्य जीता तो वहां के मंदिर तोड़े और पठानों व मुगलों ने भी जब कोई मुस्लिम राजा को हराया तब मस्जिदें भी तोड़ीं। ये अपनी प्रजा को अपने पक्ष में करने के लिए उनके पूजा स्थल बनवाते भी थे। तमाम उदाहरण मिल जाएंगे जब हिंदू शासकों ने मस्जिदें बनवाने के लिए अनुदान दिया और मुस्लिम शासकों ने मंदिरों के लिए माफी की जमीन दी। किसी भी सामंती शासक ने किसी धर्म पर प्रहार नहीं किया। जो लोग यह सोचते हैं कि फिर इतनी भारी संख्या में मुसलमान कैसे बने क्योंकि तुर्क जब आए तो मुठ्ठी भर ही थे। तो इसका भी एक मजेदार तथ्य है और वह भी परवर्ती व्यापारी कंपनी के काल का। शुरू में अंग्रेजों को लगा कि अगर इंडिया के हिंदुओं का द्विज तबका ईसाई बना लिया जाए तो यह देश उनके कहे मुताबिक चलेगा। उन्होंने गोआ, कोचीन और कोलकाता में ब्राह्मणों और अन्य द्विज जातियों को ईसाई बनाने की मुहिम चलाई। कुछ बने भी जैसे की बांग्ला के मशहूर कवि माइकेल मधुसूदन दत्त तथा तमाम बनर्जी और मुखर्जी परिवार। इसी तरह यूपी के कुमायूं में तमाम पंत और पांडे ईसाई बन गए। लेकिन हुआ कुछ नहीं क्योंकि जो ब्राह्मण ईसाई बनते उसे उसके ही परिवारजन और उसकी जाति इकाई अलग कर देती और बाकी का कुनबा जस का तस बना रहता। तब ईसाई मिशनरियों को लगा कि द्विज जातियों से अच्छा है कि अन्य जातियों पर डोरे डाले जाएं। आसान तरीका था यह क्योंकि अधिसंख्य तबका हिंदू धर्म की पूजा पद्घति से दूर था। इसमें सफलता तो मिली लेकिन यह गुर कारगर नहीं रहा। इसकी वजह थी मिशनरीज पर गोरों को दबाव होना। यह वह दौर था जब समानता, बराबरी और मानवता का पाठ लोगों ने पढ़ा और इसका असर यह हुआ कि लोगों को लगा कि समानता के मामले में इस्लाम ज्यादा बराबरी देता है। जब अपना मूलधर्म छोड़कर यह तबका अन्य धर्मों की तरफ जाने लगा तो उसे सूफी संतों की उदारता, सादगी और बराबरी पर जोर अधिक रास आई। इसलिए आप पाएंगे कि इस्लाम में जाने का रुझान 18 वीं व 19वीं सदी में सबसे अधिक हुआ पर इस्लाम में जो लोग गए वे या तो हिंदू धर्म की ब्राह्मण श्रेष्ठता के कारण किनारे पड़े थे अथवा वे हिंदू थे ही नहीं। वे नाथ, कनफटा और निरंजनी समाज के थे जहां एकेश्वरवाद, शून्यवाद और समान आत्मा का प्रचलन था इसलिए इस्लाम अंगीकार करने में उन्हें हिचक नहीं हुई। इसलिए आज यह कहना कि वे हमारे माल हैं आरएसएस की बेहयाई है।

आठ दिन 28 शहर 1600 किलोमीटर!

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आठ दिन 28 शहर 1600 किलोमीटर!
24 नवंबर को दिल्ली छोड़ी थी और दो दिसंबर को लौटा यानी पूरे आठ दिन। इस बीच ट्रेन की सवारी भी की और बस की तथा मांगे की कार की भी। रास्ते में आप 28 जगह रुकें, फेसबुक मित्रों का जमावड़ा करें तथा चायपान के बाद आगे बढ़ लें, यह कोई आसान सफर नहीं था मगर मैने पूरा किया। 1600 किमी की इस आवारगी में आठ दिन गुजर गए। लेकिन जब तक आवारगी नहीं करेंगे तब तक दुनिया को कैसे जानेंगे? दिल्ली से गोरखपुर के बीच की इस यात्रा में थ्रिल था और सब को सुनने व जानने-समझने का मौका भी मिला। स्त्रियों व पुरुषों दोनों को। किशोर, युवा और जवानों को भी। उनके बदलते ट्रेंड को जाना और उनके अंदर चल रही कसमकश को भी। केंद्र व राज्य सरकारों के विकास की पोल को भी देखा और मीडिया की अहमन्यता तथा तिल को ताड़ बनाने की उसकी समझ को भी देखा।  एक बात जो देखी कि यूपी में एनएचएआई की सड़कों पर न चलें तो बेहतर। टोल पर लूट है और सड़कें जानलेवा। मसलन कानपुर से लेकर लखनऊ के बीच की मात्र 80 किमी की दूरी पर आपको कार के लिए 60 रुपये देने पड़ते हैं मगर सड़क पर एक-एक फिट गहरे गड्ढे हैं। आगे एनएच-28 पर लखनऊ के आगे वाया बाराबंकी, फैजाबाद, बस्ती, संतकबीर नगर से लेकर गोरखपुर तक पूरे पांच टोल पड़ते हैं। 95 से 85 रुपये तक टोल भरना पड़ता है। और टोल पर वाहनों का जाम इतना हो जाता है कि लखनऊ से लेकर गोरखपुर तक महज 280 किमी की यात्रा पूरे छह घंटे में पूरी हो पाती है। हर टोल पर 15 से 30 मिनट तक जाया जाना लाजिमी है। टोल कर्मचारी गुंडों की तरह सलूक करते हैं। मसलन 95 रुपये का टोल देने के लिए आप सौ रुपये देंगे तो वे आपको पांच रुपये के बदले में नमकीन का पैकेट या टाफी पकड़ा देंगे। विरोध करने पर गुंडई करेंगे। फोरलेन हाई वे पर कहीं भी डिवाइडर में हैज नहीं लगवाई गई जिस वजह से विपरीत दिशा से आने वाले वाहनों की हेड लाइट अंधा कर देती है। इसके उलट राज्य के हाईवे एसएच रोड बेहतर हैं। बाराबंकी रोड पर लखनऊ में बाबू बनारसी दास कालेज के पास से एक फलाईओवर ऐसा बनाया ा है जो सीधे आपको अमौसी लाता है। राज्य सरकार की यह फोरलेन फ्लाई ओवर कोई 25 किमी का है लेकिन शानदार है। रात को उसमें रेडियम की पट्टियां चमकती हैं इसलिए एक्सीडेंट का डर नहीं और डिवाइडर में इतनी डेंस ग्रीनरी है कि उस पट्टी पर चल रहे वाहन की हेड लाइट आप पर कतई नहीं पड़ेगी। आठ दिन तक यूपी में रहा लेकिन इस बीच शायद ही कहीं बिजली जाती मैने देखी हो। लखनऊ तो खैर राजधानी है मगर कानपुर में खूब बिजली आती रही। सरकार चाहे बसपा की रही हो चाहे सपा की विकास कार्य हुए हैं। पर मीडिया को दिखाई नहीं पड़ते। कभी दिल्ली से बाहर निकलिए और नोएडा या वसुंधरा, वैशाली ही नहीं थोड़ा आगे बढि़ए सुदूर पूरब तक जाएं तो विकास आपको दिखेगा। अगर यमुना एक्सप्रेस हाई वे से चलकर नोएडा से आगरा आप महज डेढ़ घंटे में पहुंच सकते हैं तो यकीन मानिए कि जल्द ही अखिलेश यादव सरकार जो गंगा एक्सप्रेस हाई वे बनवा रही है उसके जरिए आप आगरा से लखनऊ महज तीन घंटे में पहुंच जाएंगे। जिस तेजी से यह रोड बन रहा है उससे तो यही लगता है कि बस डेढ़ साल में ही यह चमत्कार हो जाएगा।

झाड़े रहो कलेक्टर गंज!

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झाड़े रहो कलेक्टर गंज!

Shambhunath Shukla

सर्वेश यादव समेत कई लोगों ने मुझसे अनुरोध किया है कि फ्रेज झाड़े रहो कलेक्टर गंज का मतलब बताऊँ। तो खैर सुनिए। यह मुहावरा मैं भी बोला करता था। लेकिन मुझे नहीं पता था कि यह शुरू कहां से हुआ। इसलिए पूरा किस्सा सुनाता हूं। बात 1990 की है। राम मंदिर विवाद के चलते पूरा यूपी दंगे की आग में सुलग रहा था। मुझे अपने चचेरे भाई की शादी में शामिल होने के लिए कानपुर जाना था। तब नई दिल्ली स्टेशन से रात पौने बारह बजे एक ट्रेन चला करती थी प्रयागराज एक्सप्रेस। चलती वह अभी भी है लेकिन समय बदल गया है। तब नई-नई ट्रेन थी और सीधे बोर्ड द्वारा चलवाई गई थी इसलिए सुंदर भी थी और साफ-सुथरी भी। इसके थ्री टायर सेकंड क्लास में मेरा रिजर्वेशन था। और वह भी एक सिक्स बर्थ वाले कूपे में। जब गाड़ी में दाखिल हुआ तो पाया कि ट्रेन खाली है उसी दिन गोमती एक्सप्रेस में सफर कर रहा एक व्यक्ति दिन-दहाड़े काट डाला गया था क्योंकि दंगाइयों को उसने अपना नाम नहीं बताया था। गाड़ी के जिस कूपे में मेरा नंबर था उसमें मेरे अलावा पांच मौलाना थे। दाढ़ी और टोपी वाले। कुछ वे सहमे और कुछ मैं। मगर बाहर जाने का कोई मतलब नहीं था क्योंकि बाहर तो पूरे कोच में सन्नाटा पसरा था। सफर शुरू हुआ। न तो उन मौलानाओं को नींद आ रही थी न मुझे। शायद अंदर ही अंदर डर सता रहा होगा। गाड़ी जब कानपुर पहुंचने को आई तो सहयात्रियों में से सबसे बुजुर्ग मौलाना ने पूछा कि बेटा आप कानपुर उतरोगे? मैने कहा हां तो बोले- हमें छोटे नवाब के हाते में जाना है। और हम पाकिस्तान कराची से आए हैं। अब मुझे भी काटो तो खून नहीं। रात भर मैं अजनबी विदेशियों के बीच सफर करता रहा। लेकिन एक डर यह भी कि ये विदेशी अब अपने गंतव्य जाएंगे कैसे? पहले तो झुंझलाहट हुई और खीझ कर कहा कि बड़े मियाँ इसी समय आपको इंडिया आना था। वे बोले- बेटा भतीजी की शादी है इसलिए आना जरूरी था। खैर मैने कहा कि आप अकेले तो जाना नहीं और मैं भी छोटे मियाँ के हाते शायद न जा पाऊँ पर आपको पहुंचा जरूर दूंगा। उतरने के बाद मैने वहां के तत्कालीन पुलिस कप्तान श्री विक्रम सिंह को बूथ से फोन किया और अनुरोध किया कि आप रेल बाजार थाने से फोर्स भेज कर इन विदेशियों को सुरक्षित पहुंचा दें। जब थाने से सिपाही स्टेशन आकर उन लोगों को ले गए तो मुझे राहत मिली और मैं अपने घर की तरफ चला। दिल्ली लौटने के बाद मैने जनसत्ता में कानपुर दंगे पर खबर लिखी और यह भी लिखा कि कैसे अराजक तत्वों ने राजनीतिक स्वार्थों के लिए उस शहर का मिजाज जहरीला बना दिया है जहां पिछले साठ वर्षों से हिंदू-मुस्लिम दंगा नहीं हुआ। यह अलग बात है कि मुस्लिम समुदाय के शिया-सुन्नी दंगे की खबरें जरूर पढ़ा करते थे। यह खबर लोकसभा में तब के नेता विरोधी दल अटलबिहारी बाजपेयी ने पढ़ी और उन्होंने हमारे अखबार के ब्यूरो चीफ श्री रामबहादुर राय से पूछा कि ये शंभूनाथ शुक्ल कौन हैं, मेरे पास किसी दिन भेजना। राय साहब के निर्देश पर मैं एक दिन बाजपेयी जी के छह रायसीना रोड आवास पर पहुंच गया। परिचय होते ही बाजपेयी जी ने पूछा कि अच्छा झाड़े रहो कलेक्टर गंज । मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आया कि बाजपेयी जी कहना क्या चाहते हैं। मैने पूछा कि इसके मायने क्या हैं तब उन्होंने इस मुहावरे का बखान किया। जो यूं है-

“गांधी जी के स्वदेशी आंदोलन के दौरान सबसे अधिक मार पड़ी विदेशी चीजें बेचने वाले व्यापारियों पर। ये व्यापारी अधिकतर खत्री थे। दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, बनारस, पटना और कलकत्ता के व्यापारी सड़क पर आ गए। उन्हीं दिनों कानपुर में कलेक्टर गंज में आढ़तें लगनी शुरू हुईं। इसमें मारवाड़ी व्यापारी अव्वल थे। तभी आई तीसा की मंदी। अब तो व्यापारियों का घर तक चलना मुश्किल हो गया। इसलिए रात को इन्हीं सफेदपोश व्यापारियों के घर की महिलाएं कलेक्टर गंज आतीं और आढ़त मंडी की जमीन की मिट्टी झाड़तीं तथा जो शीला निकलता उसे घर ले जातीं और तब उनका चूल्हा जलता। सबेरे सेठ जी साफ भक्क कुर्ता-धोती पहन कर बाजार आते और अनाज की दलाली करते। अब शुरू-शुरू में तो कोई जान नहीं पाया लेकिन जब सब सफेदपोशों के घर की औरतें आकर सीला बिनने लगीं तो भेद खुला और सबेरे जो भी साफ धोती-कुरता पहने दीखता अगला आदमी दाएं हाथ की तर्जनी अंगुली को अंगूठे की छोर से छुआता और फटाक से दागता- चकाचक!!! झाड़े रहो कलेक्टर गंज। यानी हमें पता है इस सफेदी की हकीकत लेकिन………..!”