उस जंगल का राजा!

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उस जंगल का राजा!

शंभूनाथ शुक्ल

तीन साल पहले 25 दिसंबर 2011 की वह शाम हमें नहीं भूलती। हर साल के बड़े दिन की तरह उस वर्ष भी हम जिम कार्बेट घूमने गए थे। मेरा पूरा परिवार साथ था। मलकिन के साथ बड़ी बेटी व नाती-नातिन तथा दामाद। चूंकि बड़ा दिन पर जिम कार्बेट टाइगर रिजर्ब में जंगल के अंदर गेस्ट हाउस फुल रहते हैं इसलिए हम अफजलगढ़ स्थित द्वारिकेश चीनी मिल के गेस्ट हाउस में रुके थे। वहां के प्रबंधक अनिल सिंह का आतिथ्य सत्कार मशहूर है और वे बागपत के उसी ककड़ीपुर गांव के रहने वाले हैं जहां उनके अलावा दो और हस्तियां मशहूर हैं। फिल्म अभिनेत्री महिमा चौधरी तथा प्रतिष्ठित और सम्मानित संपादक देशपाल सिंह पंवार। हो सकता है कि और भी हस्तियां उस ककड़ीपुर गांव की हों पर अनिल सिंह जी तीन के बाद विराम लगा देते हैं। हमारा प्रोग्राम था कि हम अगले रोज कालागढ़ साइड से जिम कार्बेट रिजर्ब फारेस्ट में प्रवेश करेंगे और इसके लिए देहरादून के चीफ फारेस्ट कंजरवेटर के यहां से अनुमति पत्र मंगा लिया था अपने साथ के आठ साथियों और दो एसयूवी गाडिय़ों का। पर 25 की शाम को ही अनिल जी के आग्रह पर हम यूपी की सीमा में आने वाले रिजर्ब फारेस्ट अमानगढ़ टाइगर रिजर्ब की तरफ घूमने गए। सुरक्षा की दृष्टि से यूपी वन महकमे के दो फारेस्ट गार्ड भी हमारे साथ थे। अब वृक्षाच्छादित उस प्रदेश के घने जंगल को चीरती हुई हमारी गाडिय़ां कब यूपी व यूके की सीमारेखा पार कर जिम कार्बेट में प्रवेश कर गईं हमें पता नहीं चला। धुंधलका हो आया था और एक सूखी नदी पार करते हुए मैने बीच में गाड़ी रुकवाई और लघुशंका हेतु नीचे उतर गया। आड़ की खातिर मैं अपनी गाड़ी से कोई 200 मीटर दूर एक झाड़ी के झुरमुट में हो लिया। तभी मेरी नजर दूर क्षितिज पर कुछ काली रेखाओं पर पड़ी। पहचानने में देर नहीं लगी एक तरफ से धारीदार और भारी-भरकम कुछ जानवर चले आ रहे थे। उनके पीछे कुछ हाथी। मैं जल्दी से निपटकर गाड़ी के पास आ गया। हमारा ड्राइवर बोला- सर जी शेर आ रहे हैं। हम लपक कर गाड़ी में बैठ गए और बच्चों को भी शीघ्र गाड़ी में बैठा दिया।

बाघों ने दिशा बदल ली और वे उस कच्ची सड़क पर हमारे करीब फर्लांग भर आगे चलने लगे। हमने भी तेजी से गाड़ी बढ़ाई और कुछ ही देर में हम उनके पीछे। हमने हेड लाइट ऑन कर ली। वे प्यारे से स्लीक और पतली व लचकीली कमर वाले बाघ इतने सुंदर दीख रहे थे कि कुछ देर तक हम मोहित से उन्हें देखते रहे। तब ही हमारे एक अन्य साथी सैयद अथरुद्दीन बोल पड़े- सर दुर्गा माँ की सवारी जा रही है जो कुछ मांगना हो मांग लीजिए। तब हमें चेत आया कि ये वाकई बाघ हैं। करीब आधा मील तक वे शेर हमारे आगे-आगे चलते रहे। फिर अचानक वे अमानगढ़ की ओर जा रहे एक सूखे नाले में कूद गए। हमने भी यात्रा तत्काल रद्द कर दी और अमानगढ़ होते हुए वापस द्वारिकेश चीनी मिल लौट आए। अगले रोज सुबह उत्तराखंड की वन सलाहकार समिति के अपने मित्र बलूनी जी का फोन आया कि आप कालागढ़ गेट कब पहुंचेगे? मैने कहा कि अब मैं जिम कार्बेट नहीं जाऊँगा क्योंकि जिस मकसद से लोग इस रिजर्ब फारेस्ट में आकर ठोकरें खाकर लौट आते हैं वह मकसद मेरा पूरा हो गया। मैने बाघ के दर्शन कर लिए। कहां? उन्होंने पूछा तो मैने जैसे ही बताया कि यूपी के अमानगढ़ में वे मानें ही नहीं कि भला यूपी में बाघ कहां से आ गया। बोले- नहीं वह हमारे उत्तराखंड के जिम कार्बेट का ही बाघ था वह यूं ही टहलते हुए अमानगढ़ चला गया होगा। मैने कहा- नहीं बलूनी जी वह हमारे इलाके का बाघ था वह तो आपके यहां तफरीहन गया था। खैर बलूनी जी के साथ ऐसी नोकझोंक चला करती थी पर इसमें कोई शक नहीं कि हमने बलूनी जी के साथ कई बार जिम कार्बेट में ट्रैकिंग की और बाघ, हाथी, भालू तथा तेंदुआ अनगिनत बार देखा।

पर जंगल जाते वक्त कुछ नियम-कायदों का सख्ती से पालन करना होता है क्योंकि हम वहां मौज मस्ती के लिए नहीं जा रहे होते हैं बल्कि वाइल्ड लाइफ को करीब से जानने की अपनी जिज्ञासा के चलते जा रहे होते हैं। जंगली पशु आपकी नैतिकता या मांसाहार और शाकाहार को लेकर इतना सचेत नहीं है इसलिए ध्यान रखें कि हम जिस किसी प्राणी के घर जाएं उसके सुभीते का ख्याल रखें अपनी जिम्मेदारी समझें और तब ही उसके करीब जाएं।

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गालिब छूट नहीं रही शराब!

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गालिब छूट नहीं रही शराब!
शंभूनाथ शुक्ल
कल ३१ दिसंबर है, साल का आखिरी दिन। असंख्य लोग नए साल की अगवानी में शाम ढलते ही शराब पीना शुरू कर देंगे। उन्हें शायद यह पता भी नहीं होगा कि राजधानी दिल्ली से कुल ३० किमी की दूरी पर स्थित कुछ गांवों की सैकड़ों महिलाओं ने शराब के खिलाफ एक जबर्दस्त मोर्चा खोल रखा है। उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्घ नगर जिले के सैनी सुनपुरा की प्रधान हरवती की अगुआई में चल रहे इस आंदोलन ने पूरे जिले में सनसनी फैला दी है।  गौतमबुद्घ नगर का जिला प्रशासन हरवती के विरुद्घ शराब के ठेके जलाए जाने का मुकदमा कर रहा है। लेकिन हरवती ने भी हार नहीं मानी है वे पूरी दृढ़ता से इस लड़ाई की कमान संभाले हैं। हरवती सरीखी सैकड़ों महिलाएं प्रशासन की धमकी के बावजूद अपने निश्चय पर अडिग हैं। उनका तर्क है कि शराब ने उनके घर बरबाद कर दिए हैं। उनकी जमीनों का ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने जो मुआवजा दिया है उसे उनके परिवार के पुरुष सदस्य शराब में उड़ाए डाल रहे हैं। वे इस बात पर कतई गौर नहीं कर रहे हैं कि शराब की यह लत उनके पूरे परिवार को गर्त में धकेल देगी। लाखों-करोड़ों रुपयों में मिला जमीन का मुआवजा अगर इसी तरह शराब के जरिए बहाया गया तो वह दिन दूर नहीं जब उनके बच्चे दाने-दाने को मोहताज हो जाएंगे। इसीलिए २० दिसंबर की रात सैनी गांव में ठेकों को महिलाओं ने फूंक डाला और अपने-अपने घरों में पुरुषों द्वारा लाकर रखी गई शराब की सैकड़ों बोतलें फोड़ डालीं।
शिवाज रीगल, ब्लैक लेबल, हंड्रेड पाइपर, टीचर और ब्लैक एंड व्हाइट की न जाने कितनी बोतलों का द्रव उस दिन खेतों में बहा दिया गया। जिन्हें शराब पीने की लत है उन्हें इस बात का अंदाजा होगा कि इनमें से कोई भी बोतल हजार रुपए से कम की नहीं होगी। फिर शिवाज रीगल और ब्लैक लेबल तो विदेशी स्काच हैं जो शायद तीन-तीन हजार रुपयों की आती हों। इतनी मंहगी बोतलें अगर फोड़ी गईं तो जाहिर है महिलाएं किस कदर शराब से परेशान होंगी। शराब कैसे घरों को बरबाद करती है, एक औरत से ज्यादा बेहतर कोई नहीं जानता होगा। शराबी तो पीकर दुनिया जहान की चिंताओं से मुक्त हो गया लेकिन घर के खर्चों और घर चलाने की जिल्लत महिलाओं को ही भोगनी पड़ती है। इसलिए उनका नाराज होना स्वाभाविक है। लेकिन इस पूरे प्रकरण में राजनीतिक दलों की चुप्पी अचंभे में डालने वाली है। गौतमबुद्घ नगर सीट से लोकसभा के सदस्य सुरेंद्र नागर और दादरी की विधानसभा सीट से विधायक सत्यवीर सिंह गुर्जर बहुजन समाज पार्टी के ही हैं लेकिन मुख्यमंत्री की इस गृहनगरी में महिलाओं के इतने बड़े आंदोलन के प्रति उनका चुप रहना हैरान करता है।
दिल्ली के पास उत्तर प्रदेश के नोएडा-ग्रेटर नोएडा (जिला गौतमबुद्घ नगर) और गाजियाबाद  ही नहीं बल्कि हरियाणा के गुडग़ांव और फरीदाबाद की हालत भी इससे अलग नहीं है और वहां भी सैकड़ों दफे महिलाओं ने शराब के खिलाफ मोर्चा खोला है पर दोनों ही प्रांतों की  सरकारें इस समस्या पर महिलाओं के पक्ष से विचार करने की बजाय हर गांव व कस्बे में शराब के ठेके तथा माडल बियर शॉप खोले जा रही है। शराब की दूकानें खोलने की हड़बड़ी में सरकारें खुद के बनाए नियमों को भी ताक पर रख रही हैं। स्कूल, रिहायशी क्षेत्र, धार्मिक स्थान और सार्वजनिक स्थलों से शराब की दूकानें कम से कम २०० मीटर की दूरी पर होनी चाहिए लेकिन आबकारी से पैसा उगाहने के चक्कर में सरकारें इस नियम का मखौल उड़ा रही हैं। सैनी सुनपुरा में ठेका गांव के ठीक बीचोंबीच है। यही हाल नोएडा तथा ग्रेटर नोएडा की शहरी आबादी का है। वहां भी कई शराब की दूकानें स्कूलों और शहरी आबादी के एकदम करीब हैं। गुडग़ांव तथा फरीदाबाद की स्थिति तो और भी खराब है। एक-एक सेक्टर में दो से ज्यादा शराब की दूकानें हैं। यहां तो दिन में टकीला और रात को जानी वाकर पीने का इतना रिवाज है कि सारा मुआवजा इन्हीं मंहगी शराबों के चक्कर में बहा जा रहा है।
ग्रेटर नोएडा से कुल आठ किमी पर है मायचा। करीब ५००० की आबादी वाला यह गांव मुआवजे की मलाई से एकदम तर है। गांव के सभी मकान पक्के तथा हर घर में स्कार्पियो सरीखी गाडिय़ां खड़ी दीखती हैं। लेकिन प्रशासन ने यहां स्कूल के नजदीक ही ठेका भी खोल दिया है। नतीजा यह है कि १५ साल के किशोर से लेकर साठ साल के बुजुर्ग तक इसी दूकान में दीख जाते हैं। माया कुम्हारिन कहती है कि गरीब के लिए रोटी नहीं है। राशन की दूकान नहीं खुलती लेकिन शराब की दूकान खुली रहती है। यहां सुरेश प्रधानिन ने मोर्चा संभाला हुआ है। गांव के राजेंद्र भगत यह तो नहींं मानते कि यहां के अधिकतर लोग शराबी हैं पर यह जरूर मानते हैं कि शराब के ठेके की वजह से लोग शराबी होते जा रहे हैं। जब से ग्रेटर नोएडा क्षेत्र का शहरीकरण शुरू हुआ है यहां शराब के ठेकों और अंग्रेजी शराब की दूकानों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। पूरे जिले में २८० शराब के ठेके हैं इसमें से अकेले ग्रेटर नोएडा में ही ४५ प्रतिशत हैं। मुआवजा पाए किसानों में से १५ प्रतिशत ऐसे किसान परिवार हैं जहां के पुरुष सदस्य सुबह से ही शराब पीना शुरू कर देते हैं। हालांकि यह भी सच है कि युवकों में शराब पीने की प्रवृत्ति बूढ़ों व अधेड़ों की तुलना में कम है। जहां ३० से ४० की उम्र वाले २० फीसदी लोग ही नियमित पीने की आदत डाले हैं वहीं ४० से ६० की उम्र वालों के बीच यह प्रतिशत ६० का है।
इसके उलट शहरी क्षेत्रों में शराब की खपत युवाओं में ज्यादा है। नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुडग़ांव व फरीदाबाद में युवा ज्यादा शराब के लती हो रहे हैं। यहां माल के अंदर निरंतर बढ़ रहे बार और पब ने इस प्रवृत्ति को ज्यादा उकसाया है। बियर, वाइन और व्हिस्की व रम आदि की इस लत को सरकारें राजस्व उगाही का हथियार बनाए रहीं तो यहां भी शायद देर-सबेर महिलाओं को ही मोर्चा संभालना पड़े।
$गम है तो शराब और खुशी है तो शराब। आखिर पीने वालों को कोई बहाना तो चाहिए ही।  क्या करें हम तो शराब छोड़ दें लेकिन न्यू इयर ईव तो मनाना ही पड़ता है। कभी मौसम की बेईमानी का बहाना होता है तो कभी उसके खुशगवार होने का। भुगतना पड़ता है घर की महिलाओं को। जिनके लिए हर वक्त मौसम खुश्क और गमशुर्दा ही होता है। गालिब का शेर है-
गालिब छूटी शराब पर अब भी कभी-कभी
पीता हूं शब-ए-रोज महताब में।

मित्रों, मैं ऐसा क्यों हूं!

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मित्रों, मैं ऐसा क्यों हूं!

प्रिय मित्रों,

फेसबुक के मेरे मित्रों को यह मलाल रहता है कि ऐसी किसी भी पोस्ट को, जो धड़ाधड़ लोकप्रियता हासिल करने लगती है और जिस पर कमेंट्स की होड़ लग जाती है, मैं डीलिट क्यों कर देता हूं। उनको लगता है कि मैंने बस मजे के लिए वह पोस्ट डाली और हटा ली। मैं अपने मित्रों और शुभचिंतकों के इस दर्द को समझता हूं, फिर भी मित्रों के दिल को दुखाने वाला यह कड़ा फैसला मैं करता हूं। अब इसकी वजह भी बताए देता हूं। ऐसा नहीं कि मैं मजे लेने के लिए कोई पोस्ट फेसबुक पर डालता हूं अथवा किसी का दिल दुखाना या उसकी भावनाओं से खिलवाड़ करना मेरा मकसद होता है। मित्रों मैं इस फेसबुक पर कोई समय काटने या बचाने अथवा खिलवाड़ के वास्ते नहीं आया हूं। मैं अपने समाज में अपनी उपयोगिता और सहभागिता को अच्छी तरह समझता हूं। मेरे लिए अपने विचार व्यक्त करने के लिए न तो मंच की कमी कभी रही है न आज है। जिस आदमी ने अपनी पूरी जिंदगी अखबार और पत्रिकाओं के शीर्ष पद पर रहकर गुजारी हो और जो सदैव देश के बड़े तथा नामी-गिरामी पत्र समूहों में रहा हो उसके लिए मंच की कमी नहीं रहती। मगर सदैव मुझे लगता रहा कि मैं शायद वह पत्रकारिता नहीं कर पा रहा जिसके लिए मेरा दायित्व था। मैं जीवन भर बस रोजी-रोटी वाली पत्रकारिता करता रहा। किसी को हटाया, किसी को निकाला और किसी को चढ़ाया तथा किसी के कहने पर उसका बयान छापा तथा फालतू के विषयों पर लिख-लिखकर कागज कारे किए। पर इस पत्रकारिता में मैने समाज को आईना दिखाने का साहस कब किया। बस यह अहसास होते ही मैं फेसबुक पर आ गया पूरी तरह समर्पित होकर। मुझे पता है कि अभी मेरा एनर्जी लेबल हाई है और आज के किसी भी संपादक से ज्यादा। मैं अनवरत लिख सकता हूं, किसी भी समाचार पत्र या पत्रिका को मार्केट में इतना उठा सकता हूं कि भले वह नंबर वन पर न आ पाए मगर इतना तो कर ही दूंगा कि उस पर पैसा लगाने वाला रोएगा नहीं यानी वह पत्र या पत्रिका बाजार में चल ही नहीं निकलेगी वरन् लाभ भी कमाने लगेगी। मैं आज चाहूं तो किसी भी राजनैतिक दल का तार्किक प्रवक्ता हो सकता हूं और किसी भी कारापोरेट घराने का पीआर भी बेहतर तरीके से कर सकता हूं। मेरे पास आइडियाज हैं, नया बाजारोन्मुख विजन है। मगर दोस्तों मैं अब नसाना नहीं चाहता। अब तक जितना नसाना था नसा लिया पर अब तय कर लिया है कि ‘अब लौं नसानीं, अब न नसैहों’। इसलिए कुछ सकारात्मक करने के मकसद से मैं इस फेसबुक जर्नलिज्म में आया हूं। मुझे पता है कि मुझे यहां लिख-लिखकर धेला नहीं मिलने वाला। जबकि मेरा बैंक बैलेंस निल है और मैं पूरी तरह बेरोजगार हूं। दिहाड़ी मजूरी कर बमुश्किल इतना कमा पाता हूं कि अपना और पत्नी गुजर कर सकूं। बाकी का सारा समय फेसबुक पर रहकर समाज सेवा करता हूं।

मैं अपने इस समाज की उदारता, उदात्तता और समझदारी को जांचने के लिए फेसबुक पर पोस्ट डालता हूं पर जैसे ही किसी पोस्ट पर धड़ाधड़ लाइकिंग मिलने लगती है मैं अलर्ट हो जाता हूं। यह अहसास होने लगता है कि या तो मेरी पोस्ट से किसी एक वर्ग के अतिवादियों को मनमांगी मुराद मिल गई। फिर कमेंट जांचता हूं और जैसे ही इसका भान होता है कि अरे इस पोस्ट को तो विरोधी समुदाय के प्रतिक्रियावादी तत्वों ने हैक कर लिया तो उसे डीलिट कर देता हूं। समाज की नब्ज देखने निकला हूं समाज को बाटने नहीं बल्कि मैं फेसबुक पर तो समाज के बीच सौहार्द और समन्वय का विस्तार देना चाहता हूं अन्य तमाम लोगों की तरह अपने समाज को न तो कूढ़मगज बनाना मेरा मकसद है न किसी राजनीतिक दल का प्रसार न किसी समुदाय का तुष्टीकरण। मैं अपने अतिरिक्त समय या अतिरिक्त धन को खपाने के लिए इस पर नहीं हूं। न मैं अपने नियोक्ता के एसी दफ्तर में बैठकर अपना बौद्घिक झाड़ रहा हूं। मैं तो यह शत-प्रतिशत समाज सेवा कर रहा हूं। जितना मैं यहां लिखता हूं उतना बाहर लिखू तो यकीन मानिए कि चार पैसे अतिरिक्त ही कमाऊँगा पर लगता है कि अगर जीवन इसी तरह गुजार दिया तो आने वाली पीढिय़ों को क्या देकर जाएंगे। बस कुर्सी तोड़ी, हरामखोरी की और वायु निकाल कर चल दिए। इसलिए मैं तो सबसे आग्रह करूंगा कि कम से कम फेसबुक पर आप वही लिखिए जो वाकई आप लिखना चाहते हैं। समाज को जोडि़ए उसे तोडि़ए नहीं यही आपके जीवन की सार्थकता होगी।

सादर

शंभूनाथ शुक्ल

Memory of Father

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Memory of Father

1942 में ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के दौरान पिताजी भी कांग्रेस के अन्य वालंटियर्स के साथ गए कानपुर कोतवाली गिरफ्तारी देने पर महबूब खाँ दरोगा ने पिता जी को बच्चा बता कर भगा दिया। तब पिताजी सोलह साल के थे। आजादी मिलने पर पिताजी को कांग्रेस ने विधानसभा का टिकट देने का फैसला किया पर पिताजी जिला कांग्रेस अध्यक्ष को अपनी यह स्वरचित कविता सुनाकर गाँव वापस लौट आए धान रोपने। पिताजी की वही कविता शेयर कर रहा हूं-

तुम्हें खुशी के गीत मुबारक हमें मसीहे गाने।

तुम सब समझदार हो साथी हम मूरख मस्ताने॥

शुभ्र, श्वेत, परिधान तुम्हारे सिर पर सुंदर टोपी।

और हमारे कटि प्रदेश में लपटी फटी लंगोटी॥

सभा भवन की शोभा तुम हो नित्य बुलावा आते।

कार, यान, तूफानमेल से नित्य कहीं तुम जाते॥

अलका सदा सशंकित रहती देख आपकी सत्ता।

वेतन से भी बढ़ जाता है मित्र आपका भत्ता॥

रितु अनुकूल कूल के ऊपर भवन बना है सुंदर।

देख जिसे ईष्र्या से जलते होते अगर पुरंदर॥

और हमारी पर्णकुटी भी है सौ छिद्रों वाली।

वर्षा रितु में रात-रात भर रोती है घरवाली॥

क्या वर्षा, क्या ग्रीष्म, शीत क्या हमें सभी में गम है।

अर्थ अभावों के चक्कर में मेरी नाकों दम है॥

तीन दिनों से चक्की चुप है चूल्हा नहीं जला है।

देशप्रेम के बदले हमको यह बरदान मिला है॥

मेरी तेरी क्या बराबरी कहां भोज कहां तेली।

जनता ने जयमाल गले में मित्र आपके मेली॥

ललौंछी गाय की सीख!

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ललौंछी गाय की सीख!
इमरजेंसी के दिनों मेें मुझे कुछ महीनों के लिए गांव-गांव भटकना पड़ा था। कानपुर में जो अखबार नया मोर्चा हम निकालते थे उस पर बैन लग गया था और उसके सारे कर्ताधर्ता यूजी हो गए थे। उन दिनों मेरे लिए सबसे सुरक्षित गांव समझा गया मुगल रोड किनारे स्थित कोरों कलां। मुगल रोड पर औरय्या के आगे बढ़ते ही एक सड़क लिंक रोड वाया बारां जोड़ कानपुर आती थी और दूसरी मुख्य सड़क वाया सिकंदरा, भोगनीपुर, मूसानगर व घाटमपुर, जहानाबाद होती हुए बिंदकी रोड को जाती थी। इसी रोड पर भोगनीपुर पार करते ही जमना के बीहड़ वाला अंचल शुरू हो जाता। हर दो कदम उछलती कूदती कोई नदी दीखती या गैर बरसाती दिनों में सूखा पड़ा नरवा। पर यही नरवा बारिश के दिनों में इतना भयावह हो जाता कि टांग तक पानी हो तो भी कदम उखाड़ दे। मूसानगर तक आते-आते मुगल रोड बिल्कुल मुगल कालीन दिखने लगता। सड़क पर हर दो कदम बाद कोई न कोई मुगलानी इमारत दिख जाती और कहीं कोई मजार या सराय। पर मूसानगर के आगे का इलाका सूनसान और भयावह। यहीं एक नरवा के किनारे-किनारे जमना की तरफ दो मील चलने पर आ जाता कोरों कलां। एक ऊँचे कगार पर स्थित छोटा सा गांव। वहां मेरे पिताजी की एक मौसी रहती थीं। वहां अपना डेरा जमा। दोनों समय अरहर की दाल और हाथ से बिली तथा चूल्हे पर बिना तवे की मदद से सेंकी गई पनेथी रोटी। वहां आसपास कोई बाजार नहीं था इसलिए शाक-भाजी का कोई मतलब नहीं। अलबत्ता दूध-दही की कमी नहीं थी। अक्सर शाम को मैं दिशा मैदान हेतु जमना की तरफ चला जाता तो दूर-दूर तक चली गई कगारों की श्रृंखला के बीच डूबता सूरज यूं लगता था जैसे अचानक वो कगारों पर चढ़ते-चढ़ते छप्प से जमना मेें कूदकर समा गया। पर सूर्य की लालिमा उसके डूबने के काफी देर तक बनी रहती।
पिताजी की मौसी का सबसे छोटा लड़का, जो रिश्ते में तो मेरा चाचा था पर उम्र में मुझसे उम्र में लगभग बराबर। उसे मैं चाचा कह नहीं पाता इसलिए तय हुआ कि वह मुझे भाई कहेगा और मैं उसे दाऊ। खैर, दाऊ जी महाराज बांसुरी अद्भुत बजाते। पूरी लय व तन्मयता के साथ। निश्चय ही उन्हें अगर कोई पंडित हरिशंकर चौरसिया मिले होते तो वह बहुत बड़ा बांसुरी वादक बन जाता। दाऊ का एक कमाल यह भी था कि उनकी बांसुरी की तान सुनकर दूर तक चरने गईं उनकी गैयां वापस आ जातीं। एक दिन सांझ ढले जब हम खलिहान में बैठे थे और अरहर की डालें लाकर डाली दी गई थीं मांडऩे के वास्ते। दाऊ की गैयां तब तक नहीं आईं। देर हो रहे थी पर एक ललौंछी गैया रह गई थी। दाऊ ने खूब बांसुरी बजाई पर गैया लापता। हम सब घबराए। ढूंढऩे निकले। एक जगह कगार से नीचे उतरकर हमने देखा कि जोर से हाउ-हाउ की आवाजें आ रही हैं। जैसे कि कोई धौकनी चल रही हो। हम कुछ डरे भी पर हिम्मत कर वहां पहुंचे। देखा तो अचंभित रह गए। एक तेंदुआ घायल पड़ा था खून से लथपथ और हमारी वह ललौंछी गैया उस पर लगातार अपनी नुकीले सींगों से वार पर वार किए जा रही थी। तब मुझे लगा कि कोई भी जन आंदोलन हो जन क्रांति हो कभी रुकती नहीं बस धैर्य और जीतने का जज्बा चाहिए।

गांधी लेखमाला- 5

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गांधी लेखमाला- 5

डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी

(दिल्ली के जिन मुस्लिम नेताओं ने गांधी जी को प्रभावित किया उनमें हकीम अजमल खाँ के बाद डॉक्टर मुख्तार अहमद अंसारी का नाम प्रमुख है। गांधी जी जब दक्षिण अफ्रीका से वापस आए तो हिन्दुस्तान की राजनीति में दिल्ली के दो मुस्लिम नेता राजनीतिक क्षितिज पर छाए हुए थे। हकीम अजमल खाँ और डॉक्टर मुख्तार अहमद अंसारी। यूपी के गाजीपुर जिले की मोहम्मदाबाद तहसील के गांव यूसुफ पुर के मूल निवासी डॉक्टर अंसारी उन दिनों लंदन से एमएस और एमडी की डिग्री लेकर आए थे और डाक्टरी विद्या के वे प्रचंड ज्ञाता थे। मुस्लिम लीग और कांग्रेस दोनों में ही वे एक्टिव थे। पर जब मुहम्मद अली जिन्ना कांग्रेस से दूरी बरतने लगे तो डाक्टर अंसारी मुस्लिम लीग छोड़कर गांधी व नेहरू के साथ आ गए। वे 1927 में कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। गांधी जी ने उनकी अध्यक्षी के लिए मार्मिक अपील भी की थी। आज की कड़ी में गांधी जी द्वारा की गई अपील के अंश।)

“आगामी वर्ष के लिए डॉ. अंसारी का महासभा के अध्यक्ष-स्थान के लिए चनाव होना प्राय: निश्चित-सा है। राष्ट्रीय क्षितिज पर इस चुनाव में आपत्ति करने वाला कोई नहीं है। डा. अंसारी जितने अच्छे मुसलमान हैं, उतने ही अच्छे भारतीय भी हैं। उनमें धर्मोन्माद की तो किसी ने शंका ही नहीं की है। वर्षों तक वे एक साथ महासभा के सह मंत्री रहे हैं। हाल ही में एकता के लिए किए गए उनके प्रयत्नों को तो सब कोई जानते हैं और सच्ची बात तो यह है कि अगर बेलगांव में मैं, कानपुर में श्रीमती सरोजनी नायडू और गोहाटी में श्रीयुत आयंगर मार्ग में न आते तो इनमें से किसी भी अधिवेशन के अध्यक्ष डा. अंसारी ही चुने जाते, क्योंकि जब ये चुनाव हो रहे थे तब उनका नाम प्रत्येक आदमी की जबान पर था, परन्तु कुछ खास कारणों से डा. अंसारी का हक आगे बढ़ा दिया गया और ज्ञात होता है कि विधि ने उनके चुनाव को इसीलिए आगे धकेल दिया था कि वे ऐसे मौके पर आवें जब देश को उनकी सबसे अधिक जरूरत हो। अगर हिन्दू-मुस्लिम एकता की कोई योजना दोनों पक्षों को ग्रहण करने योग्य मालूम हो तो नि:संदेह डा. अंसारी ही उसे महासभा के द्वार पर ले जा सकते हैं। …….अकेली यही बात (सर्वसम्मति से और हृदय से एक मुसलमान को अपना अध्यक्ष चुनना) हिन्दुओं की ओर से इस बात का साफ प्रमाण होगा कि हिन्दू एकता को दिल से चाहते हैं, और राष्ट्रीय विचारों वाले मुसलमानों में डा. अंसारी की अपेक्षा साधारणतया मुसलमान जनता में अधिक आदृत कोई नहीं है। इसलिए मेरे ख्याल से तो यही अच्छा है कि अगले साल के लिए डा. अंसारी ही राष्ट्रीय महासभा के कर्णधार हों, क्योंकि केवल किसी योजना को मंजूर कर लेना ही हमारे लिए काफी नहीं है। दोनों पक्षों द्वारा उसे मंजूर कराने की बनिस्बत उसे कार्य में परिणित करना शायद कहीं अधिक जरूरी है। और यदि हम मान लें कि दोनों पक्षों का समाधान करने वाली एक योजना मंजूर हो भी गई तो उस पर अमल करते समय बराबर सावधानी की आवश्यकता होगी। डा. अंसारी ऐसे ही काम के लिए सबसे अधिक योग्य पुरुष हैं। इसलिए मैं आशा करता हूं कि सभी प्रांत एकमत से डा. अंसारी के नाम को ही उस सर्वोच्च सम्मान के लिए सूचित करेंगे जो कि राषट्रीय महासभा के अधीन है।“

(हि. न. 21.07.1927)

बापू ने यह लेख डा अंसारी की मृत्यु पर शोक जताते हुए लिखा था-

“वह निसंदेह हकीम अजमल खाँ की तरह ही हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य के एक प्रतिरूप थे। कड़ी से कड़ी परीक्षा के समय भी वह अपने विश्वास से कभी डिगे नहीं। वह एक पक्के मुसलमान थे। हजरत मुहम्मद साहब की जिन लोगों ने जरूरत के वक्त मदद की थी, वह उनके वंशज थे और उन्हें इस बात का गर्व था। इस्लाम के प्रति उनमें जो दृढ़ता थी और उसका उन्हें जो प्रगाढ़ ज्ञान था उस दृढ़ता और उस ज्ञान ने ही उन्हें हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य में विश्वास करने वाला बना दिया था। अगर यह कहा जाए कि जितने उनके मुसलमान मित्र थे उतने ही हिन्दू मित्र थे तो इसमें कोई अतिशयोक्ति न होगी। सारे हिन्दुस्तान के काबिल-से-काबिल डाक्टरों में उनका नाम लिया जाता था। किसी भी कौम का गरीब आदमी उनसे सलाह लेने जाए, उसके लिए बेरोकटोक उनका दरवाजा खुला रहता था। उन्होंने राजा-महाराजाओं और अमीर घरानों से जो कमाया वह अपने जरूरतमंद दोस्तों में दोनों हाथों से खर्च किया। कोई उनसे कुछ माँगने गया तो कभी ऐसा नहीं हुआ कि वह उनकी जेब खाली किए बगैर लौटा हो। और उन्होंने जो दिया उसका कभी हिसाब नहीं रखा। सैकड़ों पुरुषों और स्त्रियों के लिए वह एक भारी सहारा थे। मुझे तनिक भी संदेह नहीं कि सचमुच वह अनेक लोगों को रोते-बिलखते छोड़ गए हैं। उनकी पत्नी बेगम साहिबा तो ज्ञान पारायणा हैं, यद्यपि वह हमेशा बीमार-सी रहती हैं। वह इतनी बहादुर हैं और इस्लाम पर उनकी इतनी ऊँची श्रद्घा है कि उन्होंने अपने प्रिय पति की मृत्यु पर एक आँसू भी नहीं गिराया। पर जिन अनेक व्यक्तियों को मैं याद करता हूं वे ज्ञानी या फिलॉस्फर नहीं हैं। ईश्वर में तो उनका विश्वास हवाई है, पर डा अंसारी में उनका विश्वास जीवित विश्वास था। इसमें उनका कोई कसूर नहीं। डाक्टर साहब की मित्रता के उनके पास ऐसे अनेक प्रमाण थे कि ईश्वर ने जब तक उन्हें छोड़ दिया तब डाक्टर साहब भी उनकी मदद तभी तक कर सके, जब तक कि सिरजनहार ने उन्हें ऐसा करने दिया। जिस काम को वे जीवित अवस्था में पूरा नहीं कर सके, ईश्वर करे वह उनकी मृत्यु के बाद पूरा हो जाए।“

(ह. से. 16.05.1936)

गांधी लेखमाला- 4

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गांधी लेखमाला- 4

अली बंधुओं के बारे में गांधी जी

(दो अक्तूबर तक चलने वाली गांधी लेखमाला की चौथी किश्त में आज अली बंधुओं मौ. शौकतअली और मौ. मुहम्मद अली के बारे में गांधी जी के विचार पेश हैं। ये वही अली-बंधु हैं जिन्होंने भारत में खिलाफत आंदोलन चलाया था। धर्म अथवा पंथ निरपेक्षता की डगर पर चलना अति कठिन है। यह तो वह प्रेम गली है जो अति साँकरी है।)

शौकत अली सरल और मिलनसार आदमी हैं, पर कट्टर हैं। और किसी का उन्हें भय और दबाव नहीं हैं।

(यं. इं. 23. 6. 20)

मौ. शौकत अली तो बड़े से बड़े शूरवीरों में से एक हैं। उनमें बलिदान की अद्भुत योग्यता है और उसी तरह खुदा के मामूली से मामूली जीव को चाहने की उनकी प्रेम शक्ति भी अजीब है। वह खुद इस्लाम पर फिदा हैं, पर दूसरे धर्मों से वह घृणा नहीं करते। मौ मोहम्मद अली इनका दूसरा शरीर है। मौ. मोहम्मद अली में मैने बड़े भाई के प्रति जितनी अनन्य निष्ठा देखी है उतनी कहीं नहीं देखी। उनकी बुद्घि ने यह बात तय कर ली है कि हिन्दू-मुसलमान एकता के सिवा हिन्दुस्तान के छुटकारे का कोई रास्ता नहीं। उनका पैन इस्लामवाद हिन्दू विरोधी नहीं है। इस्लाम भीतर और बाहर से शुद्घ हो जाए और बाहर के हर किस्म के हमलों से संगठित होकर टक्करें ले सके ऐसी स्थिति देखने की तीव्र आकांक्षा पर कोई कैसे आपत्ति कर सकता है? कोकोनाडा के उनके भाषण का एक हिस्सा बहुत ही आपत्तिजनक बताकर मुझे दिखाया गया था। मैने मौलाना का ध्यान उस पर खींचा। उन्होंने उसी दम स्वीकार किया कि हाँ, वास्तव में यह भूल हुई। कुछ दोस्तों ने मुझे सूचना दी है कि मौ शौकत अली के खिलाफ परिषद वाले भाषण में कितनी ही बातें आपत्तिजनक हैं। यह भाषण मेरे पास हैै परन्तु उसे पढऩे का मुझे समय नहीं मिल पाया। यह मैं जरूर जानता हूं कि यदि सचमुच उसमें ऐसी कोई बात होगी जिससे किसी का दिल दुखी हो तो मौ शौकत अली ऐसे लोगों में पहले व्यक्ति हैं जो उसको ठीक करने के लिए तैयार रहते हैं।

(हि. न. 01. 06. 1924)

अली भाइयों के जेल जाने के बाद मुस्लिम लीग की सभा में मुझे मुसलमान भाई ले गए थे। वहां मुझसे बोलने के लिए कहा गया था। मैं बोला। अली-भाइयों को छुड़ाने का धर्म मुसलमानों को समझाया।

इसके बाद वे मुझे अलीगढ़ कालेज में भी ले गए थे। वहां मैने मुसलमानों को देश के लिए फकीरी लेने का न्यौता दिया था। अली-भाइयों को छुड़ाने के लिए मैने सरकार के साथ पत्र-व्यवहार चलाया। इस सिलसिले में इन भाइयों की खिलाफत संबंधी हलचल का अध्ययन किया। मुसलमानों के साथ भी चर्चा की। मुझे लगा कि अगर मैं मुसलमानों का सच्चा मित्र बनना चाहूं तो मुझे अली-भाइयों को छुड़ाने में और खिलाफत का प्रश्न न्यायपूर्वक हल करने में पूरी मदद करनी चाहिए। खिलाफत का प्रश्न मेरे लिए सहल था। उसके स्वतंत्र गुण-दोष तो मुझे देखने भी नहीं थे। मुझे ऐसा लाग कि उस संबंध में मुसलमानों की माँग नीति-विरुद्घ न हो तो मुझे उसमें मदद देनी चाहिए। धर्म के प्रश्न में श्रद्घा सर्वोपरि होती है। सबकी श्रद्घा एक ही वस्तु के बारे में एक ही-सी हो तो फिर जगत में एक ही धर्म हो सकता है। खिलाफत संबंधी माँग मुझे नीति-विरुद्घ नहीं जान पड़ी। इतना ही नहीं बल्कि यही माँग इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री लॉयड जार्ज ने स्वीकार की थी, इसलिए मुझे तो मुझे उनसे अपने वचन का पालन कराने भर का ही प्रयत्न करना था। वचन ऐसे स्पष्ट शब्दों में थे कि मर्यादित गुण-दोष की परीक्षा मुझे सहज अपनी अंतरात्मा को प्रसन्न करने की ही खातिर करनी थी।

(आ. क. 1928)

उन्हें (मौ. शौकत अली) उर्दू कवियों के बढिय़ा वचन जबानी याद हैं। जब वे ये वचन सुनाते थे और उस जमाने में जो बातें करते थे, उस वक्त भी वह ईमानदार थे। आज भी ईमानदार हैं। मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि वह झूठ बोलते या धोखा देते थे। आज वह मानते हैं कि हिन्दू विश्वासपात्र नहीं हैं और उनके साथ लड़ लेने में ही कौम का भला है। यह मनोदशा बुरी है। मगर कौम की सेवा उनके दिल में है, उनका कोई स्वार्थी हेतु नहीं है। ऐसे ईमानदार आदमी बहुत मौजूद हैं।

(म. डा. भाग 1, 04. 07. 1932)

स्व. मौलाना शौकत अली के स्मारक के बारे में मैने कई तजबीजें पढ़ी हैं। ज्यों ही मुझे मौलाना की मृत्यु के बारे में मालूम हुआ, जिसकी कि अभी बिल्कुल ही आशा नहीं थी, मैने कुछ मुसलमान मित्रों को उनके साथ अपने अंतस्थल की सम्वेदना प्रकट करते हुए लिखा। उनमें से एक मित्र ने लिखा है-

“…….मैं यह जानता हूं कि मौ शौकत अली अपने खास ढंग से सच्चा हिन्दू-मुस्लिम समझौता कराने के लिए सचमुच चिन्तित थे। स्वर्ग में उनकी आत्मा को यह जानकर कि उनका एक जीवन-उद्देश्य आखिरकार पूरा हो गया, जितनी शान्ति मिलेगी उतनी किसी दूसरे काम से नहीं। ऐसे भी लोग हो सकत हैं, जिन्हें कि इसमें सन्देह हो, लेकिन मौलाना को और उनका दिमाग किस तरह काम करता था इसको अच्छी तरह जानकर, जैसा कि मैं उन्हें जानता था, मैं भरोसे के साथ इस बात की ताईद कर सकता हूं।“

“कभी-कभी जो वह जोश में आकर खिलाफ बोल जाते थे, उसके बावजूद मौलाना के दिल में एकता और शान्ति के लिए वही तमन्ना थी जिसके लिए कि वह खिलाफत के दिनों में बड़े मोहक ढंग से बोलते व काम करते थे। मुझे इसमें कोई शक नहीं कि उनकी यादगार में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही कौमों का एकता के लिए हुआ संयुक्त निश्चय ही सबसे सच्चा स्मारक होगा।“

“खाली कागज एकता का निश्चय नहीं, बल्कि दिली एकता का, जिसका आधार शक और बेऐतबारी नहीं, बल्कि आपस का विश्वास होगा। कोई दूसरी एकता हमें नहीं चाहिए और इस एकता के बिना हिन्दुस्तान के लिए सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो सकती।“

(ह. से. 17. 12. 1938)

मौ. मुहम्मद अली साहब भी कहते थे कि हमें अँग्रेजों से लड़कर स्वराज्य लेना है और हमारी लड़ाई होगी तकली की तोपों से और कुकुडिय़ों के गोलों से। वह जो विद्वान था, उतना ही कल्पनाएं दौड़ानेवाला था।

(प्रा. प्र. 05. 04. 1946)

(जन सेवक एवं सत्य-अहिंसा के शोधार्थी द्वारा संकलित किए गए गांधी साहित्य से लिए गए अंश।)