सीतल सुकुल की मस्जिद

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औरंगजेब द्वारा ध्वस्त किए गए मंदिरों और उसी के द्वारा मंदिरों को माफी की जमीन देने के किस्‍से आम हैं। लेकिन ऐसा नहीं कि सिर्फ मुस्लिम शासकों ने ही मंदिरों को माफी में जमीन दी। हिंदू शासकों ने भी मुस्लिम इलाकों में मस्जिदें, तालाब और कुएं खुदवाए। सम्राट फरुखसियर के वक्‍त एक थे सीतल सुकुल। वे कोड़ा जहानाबाद के नवाब अल्मास अली खां के यहां चकलेदार थे। उन्होंने मु‌‌‌‌स्लिम बहुल इलाके अकबरपुर में एक विशाल तालाब खुदवाया तथा पठानों के गांव बारा में एक मस्जिद बनवाई। अकबरपुर में ही छब्बा कलवार ने कुएं खुदवाए तथा नत्‍था खां ने एक बावड़ी बनवाई थी। यह अकबरपुर आज कानपुर देहात का जिला मुख्यालय है। देव समाज के प्रवर्तक स्वामी सत्यानंद अग्निहोत्री का जन्म इसी अकबरपुर में हुआ था। रुड़की से ओवरसियरी की परीक्षा पास करने के बाद वे लाहौर जाकर सरकारी नौकर हो गए। वहीं पर वे ब्राह्मो समाज के संपर्क में आए और प्रचारक हो गए। बाद में लाहौर में ही उन्होंने देव समाज की स्‍थापना की थी। आज अकबरपुर लोकसभा सीट भी है और कांग्रेस के राजाराम पाल फिलहाल वहां के सांसद हैं। वे फिर कांग्रेस के टिकट पर ही लड़ रहे हैं। उनके विरुद्घ बसपा ने अनिल शुक्‍ल वारसी को और भाजपा ने पूर्व मंत्री भोले सिंह को उतारा है। अकबर पुर के आसपास का क्षेत्र चौ‌हान और चंदेल ठाकुरों का है।

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कांग्रेस के दलाल

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धर्म के बिना कोई राजनीतिक व्यवस्‍था साकार रूप नहीं ले सकती। धर्म ही उसको जनता के बीच आधार प्रदान करता है। जिस योरोपीय लोकतंत्र के हम हामी हैं वह भी ईसाई धर्म के प्रोटेस्टेंट संप्रदाय की देन है। धर्म का ईश्वर से कोई लेना-देना हो अथवा नहीं हो पर राजनीतिक व्यवस्‍था से जरूर है। हिंदू धर्म चूंकि अनेक संप्रदायों में बटा है इसलिए वह कोई एकरूप राजनीतिक स्वरूप नहीं दे सका है। भारत में यह जो विभिन्नता है वह दरअसल मत और संप्रदाय विभन्निता है। इसका नतीजा है कि कोई ठोस राजनीतिक विकल्प हमें नहीं दीखता। इस कमजोरी का लाभ कांग्रेस उठाती है और वह एक ऐसी राजनीतिक तंत्र को जन्म देती है जो दरअसल पूंजीवाद का सबसे विकृत स्वरूप है। कांग्रेस दलाल पूंजीवादी व्यवस्‍था को जन्म देती है। और यह दलाल पूंजीवादी व्यवस्‍था लूटतंत्र को पैदा करती है। मंहगाई का मायाजाल, गरीब को सब्सिडी देने के नाम पर नौकरशाही को बेलगाम करना तथा मीडिया को अपने हेतु खरीद लेने का दुष्‍चक्र यही कांग्रेस चलाती है। देश जब तक कांग्रेस के लूटतंत्र से छुटकारा नहीं पाएगा वह इसी तरह के दुष्चक्र में फंसा रहेगा। कांग्रेस अल्पसंख्यकों का भयादोहन करती है और समाज के बीच ऊँच-नीच का भेद पैदा करती है। यह देश का दुर्भाग्य ही है कि अभी तक देश में कोई भी गैर कांग्रेसी सरकार नहीं बन सकी है। जो लोग अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार को गैर कांग्रेसी सरकार मानते हैं वे मूर्ख हैं। अटल बिहारी ने एक भ्रष्‍ट और निकम्मी सरकार दी थी जिसमें रंजन भट्टाचार्य थे, प्रमोद महाजन थे और कांग्रेसी मानसिकता वाले तमाम नेता थे जिन्होंने अटल बिहारी की सरकार को एक दूसरे दलालतंत्र में बदल दिया था। लेकिन इसके बावजूद उस राज में मंहगाई कम हुई थी और तमाम तरह की सरकारी अडंगेबाजी से छुटकारा मिला था। पर मनमोहन-सोनिया राज ने देश में फिर लूट मचा दी। अचानक गेहूं आदि खाद्य सामग्री के दाम आसमान छूने लगे थे। यही कारण है कि देश आज एक विकल्प चाह रहा है और वह विकल्प तब ही संभव हो पाएगा जब कोई गैर सवर्ण देश का सर्वेसर्वा बनेगा और देश को कांग्रेसी नीतियों से सदा के लिए छुटकारा दिला देगा। भूल जाइए कि कांग्रेस समरसता चाहती है। इस देश में सांप्रदायिकता का बीज बोने वाली कांग्रेस ही है। कांग्रेस कभी मुसलमानों को मारती है कभी सिखों को तो कभी सवर्ण अवर्ण के बीच रार पैदा करती है। लोग भूले नहीं होंगे जब मंडल को हवा राजीव गांधी खुलेआम दे रहे थे। इसलिए कांग्रेस से बचना जरूरी है। तब ही यह देश बच पाएगा। भले इस देश में इस्‍लामिक गणतंत्र कायम हो जाए पर कांग्रेस के दलाल पूंजीपतियों से बचना जरूरी है। कांग्रेस के प्रचारक या तो भोले हैं अथवा बहुत ही काईंयां।

गांवन मा छत्तीस कौम हैं!

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मेरे अपने गांव में छत्तीसों कौमें रहती हैं। पर ठाकुरों का एक भी घर नहीं है। वजह यह बताई जाती है कि आमतौर पर कुर्मियों के गांव में ठाकुर नहीं रहते। गांव में कुर्मी जमींदार रहे हैं। उनकी जमींदारी सात आने की थी बाकी की नौ आने की जमींदारी एक सुकुल परिवार के पास। कहा जाता है कि सुकुलों को यह जमींदारी अंग्रेजों के प्रति उनकी वफादारी दिखाने के चलते दी गई थी और कुर्मियों के पुरखे लक्ष्मण सिंह ने चूंकि १८५७ में हिंदुस्तानी सिपाहियों को शर्बत पिलाया था और इसकी शिकायत पास के गौरा के ठाकुर जमींदार ने अंग्रेज हाकिम से कर दी थी इससे नाराज लक्ष्मण सिंह ने गौरा के ठाकुरों के घर फूंक डाले थे। अंग्रेज चिढ़ गए और लक्ष्मण सिंह की जागीरदारी छीन कर उन्हें कालापानी भेज दिया तथा नौ आने की जमींदारी उस सुकुल सिपाही को दे दी जिसने बागियों का साथ छोड़कर एक अंग्रेज फौजी को बचाया था। बाकी सात आने की जमींदारी कुर्मी लक्ष्मण सिंह की विधवा मुसम्मात रामकली देवी को बख्श दी। गांव में आबादी ब्राह्मणों की है क्योंंकि यहां के कुर्मियों का अपनी अन्य कुर्मी बिरादरियों में हुक्का पानी बंद था इसलिए यह खुलवाने हेतु उन्होंने अपनी जमींदारी में ब्राह्मण ला-लाकर बसाए। हमारे बाबा बताया करते थे कि कुर्मी जमींदार ज्यादा मानवीय थे। वे लगान वसूली के लिए सुकुलों की तरह लठ नहीं बजवाया करते थे। हमारे परिवार के पुरखों ने चूंकि दोनों जमींदारों के जंगल सलामी देकर नौतोड़ में लिए थे इसलिए उन्हें दोनों की चापलूसी करनी पड़ती। पर हमारा घर कुर्मी जमींदार के सहन में था इसलिए हमारे सबसे करीबी वही हुए। मेरी अपनी दोस्ती भी इन्हीं कुर्मी परिवारों से ज्यादा है। इन कुर्मी जमींदारों में कुछ बातें तो मैने भी देखीं। मसलन ये जमींदार अपने प्रीवीपर्स के कागज दिखाकर रौब नहीं झाड़ा करते थे सुकुलों की तरह। न वे अपने सुकुल साथियों की तरह उस नरेंद्र मंडल में शामिल हुए जो भारत संघ में विलय होने के खिलाफ कुछ राजा-रजवाड़ो ने अपनी बची-खुची इज्जत बचाने के लिए खड़ा किया था। सरदार पटेल इस नरेंद्र मंडल के विरोधी थे।
अभी पिछले दिनों मैं जब गांव गया तो अपने कुर्मी दोस्तों ने बताया द्याखै महाराज आप चाहे जितनी बातें करौ पै या बात गांठ बांध लेव कि अबकी अहिहै तो मोदी ही। काहे कि मोदी बंभनन ठकुरन की तरह धोखेबाज नाहीं है। उहिके राज मां वो सब होही जो होंय का चाही। बंभनन ठकुरन का जहां जांय का होय जांय पै अब मोदी का उईं रोक नहीं सकत। उनका कहना है कि मोदी का हिंदू धर्म ब्राह्मण-ठाकुरों का हिंदू धर्म नहीं। वह जिस तरह का धर्म होगा उसकी वजह से किसी हिंदू को शर्मसार नहीं होना पड़ेगा कि इस समाज में इंसान इंसान को पशु से भी बदतर समझता है।