navneet sahgal

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सिकंदरराऊ से लेकर बेवर तक रैदासी भगत

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गुरु मिलया रैदास दीन्हीं ग्यान की गुटकी!

शंभूनाथ शुक्ल

अलीगढ़ से लेकर इटावा तक तमाम गांवों में आपको रैदासी भगत काफी संख्या में मिल जाएंगे। कंठीेधारी ये भगत भजन गाते हैं और गृहस्थ होते हैं। अलीगढ़ के सिकंदरराऊ से लेकर एटा, मैनपुरी, बेवर, छिबरामऊ, गुरसहाय गंज से लेकर कन्नौज तक इनकी बहुतायत है। इनमें कबीरपंथी भी हैं और दादू, जगजीवन व सेन नाई पंथ के अनुयायी भी। ये भगत सारे निर्गुन संतों की बानी गाते हैं। शाकाहारी और सदाचारी तथा अपने नियम कायदों का कड़ाई से पालन करने वालेे इन रैदासी भगतों में गजब की प्रतिभा है। ऐसा माना जाता है कि ये संत रविदास के अनुयायी हैं। संत रविदास के बारे में धन्ना भगत ने लिखा है कि इन्होंने नित्यप्रति ढोरों का व्यवसाय करते हुए माया का परित्याग कर दिया। ये साधुओं के साथ प्रत्यक्ष रहने लगे और इस प्रकार भगवान का दर्शन प्राप्त करने में सफल रहे। स्वयं रविदास जी के पदों से भी पता चलता है कि इनके कुटुंब वाले ‘ढेढ़’ लोग बनारस के आसपास ढोरों या मृत पशुओं को ढो-ढोकर ले आया करते थे। संत रविदास का वर्णन मीरां बाई ने भी अपने भजनों में किया है- ‘गुरु मिलया रैदासजी दीन्हीं ग्यान की गुटकी’ तथा ‘रैदास संत मिले मोहिं सतगुरु, दीन्हा सुरत सहदानी’ आदि।

इन रविदासी या रैदासी भगतों के भजनों में राम नाम का प्रयोग अक्सर होता है पर इनके राम वे दशरथ पुत्र राम नहीं हैं। इनके राम तो अनिर्वचनीय हैं। इन्होंने अपने राम के बारे में लिखा है- ‘जस हरि कहिये तस हरि नाहीं, है अस जस कछु तैसा’। वैसे इन रैदासी भगतों और कबीर पंथी भगतों में कुछ फर्क है। जैसे कि रविदासी भगत अष्टांग साधन मानते हैं। ये इस प्रकार हैं 1. गृह, 2. सेवा, 3. संत, 4. नाम, 5. ध्यान, 6. प्रणति, 7. प्रेम व आठवां विलय अथवा समाधि। इसीलिए ये भगत अपने परंपरागत व्यवसाय में रत रहते हैं और गृहस्थ जीवन में भी।

हालांकि उत्तर प्रदेश के इस इलाके में इनकी बहुतायत है पर हरियाणा, पंजाब, राजस्थान तथा गुजरात में इनकी संख्या काफी है। कभी इस इलाके में जाएं तो इन रैदासी भगतों से भी मिले तब ही पता चलेगा कि यादवों के प्रभुत्व वाले इस इलाके में एक बड़ी आबादी रैदासी भगत हैं जो यादवों के अर्दब में कतई नहीं हैं।

धीरे बहो यमुना रे!

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जरा धीरे बहो यमुना रे!
शंभूनाथ शुक्ल
किताबों में बहुत सी बातें नहीं मिलतीं न पढ़ाई जाती हैं। वे आप खुद तलाश सकते हैं। जैसे कभी दिल्ली से यमुना के किनारे-किनारे सड़क मार्ग से जाइए। आगरा तक यमुना वैसे ही बहती है जैसे कि गंगा। सपाट जलधारा कहीं साफ कहीं ज्यादा, कहीं उथली कहीं गहरी कहीं मटमैली कहीं हरे रंग का पानी। मगर जैसे ही आप आगरा के आगे बढ़ते हैं तो ऐसा लगता है कि यमुना मानों तेज गति से किसी गहरे गड्ढे में झम्म से कूद पड़ी हो। फिर यमुना के अगल-बगल समतल मैदान नहीं ऊँचे-ऊँचे कगार दिखते हैं और गांव दूर-दराज छूट जाते हैं। यमुना जैसे पुन यमुनोत्री मार्ग का अनुशरण करती है। मिटटी के ये पहाड़ कभी यमुनोत्री के पहाड़ों की तरह पत्थर के भी बन सकते हैं बशर्ते वैसा ही सर्द मौसम उन्हें मिले और उतना ही समय यानी कम से कम एक लाख वर्ष का समय। मगर मैदानी इलाके में यह संभव नहीं है।
दरअसल विंध्य के उत्तर के उत्तर के हिस्से मेें भारत का ढाल पश्चिम से पूरब की तरफ है इसलिए नदियां यहां पश्चिम से पूरब की तरफ बहती हैं। गंगा भी यमुना भी, घाघरा, सरयू और कोसी भी। यहां तक कि ब्रह्मपुत्र के प्रवाह की दिशा भी यही है। पर आगरा के बाद का आप जैसे-जैसे पूरब चलेंगे यमुना के एक तट पर मैदान और दूसरे तट पर बुंदेलखंड का पठारी इलाका है। इसलिए जमीन का ढलुआँ हिस्सा बढऩे लगता है। यमुना जब इस इलाके से गुजरती है तो इस ढलुआँ इलाके के कारण उसके दोनों ही तट पर बड़े-बड़े पहाड़ बन गए हैं। ये मिट्टी के पहाड़ इतने दुर्गम और बबूल के पेड़ों से घिरे हैं कि वहां कोई भी मजे से छुपा रह सकता है। इसीलिए आप पाएंगे कि सारे डकैत इसी इलाके में पलते रहे हैं। यमुना और उसके दक्षिण की अन्य समानांतर प्रवाह वाली नदियां चंबल, पहुज, क्वारी आदि सभी ढलुआँ इलाके से ही गुजरती हैं इस वजह से उनके किनारे भी ऐसे ही बीहड़ हैं। एक और वजह रही आगरा के बाद यमुना के तटवर्ती गांवों में छेरी (बकरी) पालक आभीर जातियों और शक द्वीप से आए ब्राह्मणों ने डेरा डाला। चूंकि शक द्वीप से आए ब्राह्मण मध्य एशिया के जिस इलाके से आए थे वहां वे छेरी का दूध ही सेवन करते थे इसलिए उनके साथ उन्हें चराने वाली जातियां भी आकर बस गईं। नारायण संप्रदाय के ये शक द्वीपीय ब्राह्मण पहले से बसे आर्य और घनघोर मांसाहारी ब्राह्मणों के कारण यमुना के तटीय और सूनसान पर वनाच्छादित इलाकों में बसे। लेकिन इनके बसने और छेरी और अपने साथ लाए ऊँटों की बहुतायत के कारण यमुना का ये सारा इलाका वनस्पति विहीन होता चला गया। छेरी और ऊँट दो ऐसे पशु हैं जो सारी पत्तियां चट कर जाते हैं। ये दोनों ही पशु चाहे जितने अफरे हों आप कुछ खाने को परोस दें तो फौरन मुंह मारने लगेंगे। सो यह इलाका भी वनस्पति विहीन होता चला गया। आगरा, बटेसर से लगाकर जहानाबाद तक। उसके बाद फिर यमुना मैदान में प्रवेश करती हैं और कगार खत्म।
पर इस इलाके में जमीन के ढलुआँ होने और नदी के तेज गति से बहने का लाभ एक और आदिम जाति को मिला वह जाति जो मल्लाह थी पर नारायण संप्रदाय में दीक्षित हो गई। यही कारण है कि यहां ब्राह्मणों के साथ अन्य जातियां भी शाकाहारी हैं जबकि यह इलाका गोपालकों से ज्यादा छेरी पालकों का है और यहां की छेरियां बंाग्लादेश तक जाती हैं। छेरियों का एक बाजार भोगनीपुर से कालपी जाने वाली रोड पर आटा नाम की जगह पर लगता है। और हर बुधवार को यहां अनगिनत छेरियां बंगाल व बिहार भेजी जाती हैं। लेकिन यहां के लोग बहादुर और आत्म स्वाभिमान से भरे हुए मिलते हैं। यह इलाका दस्युप्रभावित जरूर रहा होगा लेकिन इतना आत्म अनुशासित कि अगर घनघोर जंगल से कोई अकेली दुकेली खूब गहनों से लदी-फदी निकल जाए तो उसे लूटना तो दूर गहनों की ओर कोई देखेगा भी नहीं। पर यहां यह ध्यान रखें कि ये दस्युओं के बाबत ये बातें मैं सुनी सुनाई ही बता रहा हूूं। तब कि जब यहां डाकू मान सिंह और लुक्का का राज था आज की नहीं। इसलिए कोई यह प्रयोग नहीं करे। यह वही इलाका जहां इटावा है, औरय्या है, भोगनीपुर है, कालपी है, चपरघटा, मूसानगर और जहानाबाद है।  मालूम हो कि मुगल फौजों के दस्ते आगरा से कोड़ा जहानाबाद और इलाहाबाद इसी रास्ते से जाया करते थे इसलिए मुगलों ने आगरा से इलाहाबाद तक यमुना रिवर साइड जो सड़क बनवाई उसका नाम मुगल रोड पड़ा। शाहजहां के समय में आम व्यापारियों के लिए भी यह सड़क खोल दी गई थी पर चपरघटा में जहां पर सड़क सेंगुर नदी के ऊपर से गुजरती है व्यापारियों का काफिला लूट लिया जाया करता था। एक कहावत मशहूर हो गई थी कि दिल्ली की कमाई, चपरघटा में गंवाई। इसीलिए शाहजहां ने मूसानगर में अपनी एक छावनी बनवाई थी। मूसानगर में कसाइयों की बड़ी बस्ती है जो मुगल फौजों के लिए मांस मुहैया कराती थी लेकिन छेरियों का ही।
अब यह भी समझ लिया जाए कि ये दस्यु कौन थे? ये वही पिंडारी थे जो पहले देसी रियासतों की फौज में थे पर बाद में अंग्रेजों द्वारा जरायम पेशा कौम में डाल दिए गए। इसमें ब्राह्मण भी थे, ठाकुर भी थे और भी मार्शल कौमें। लेकिन पिंडारियों से दस्यु बनने तक की कहानी कल के अंक में।

किसान की कहानी बकलम खुद

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किसान की कहानी बकलम खुद

 

किसान की कहानी बकलम खुद
शंभूनाथ शुक्ल
शंभूनाथ शुक्ल वल्द रामकिशोर शुक्ल साकिन मौजा दुरौली डाकखाना गजनेर जिला कानपुर। अपने होशोहवाश से मैं बता सकता हूं कि हमारे गांव में हमारे पास कुल जमा १४ बीघा तीन विस्वांसी जमीन थी। यह सारी जमीन हमारे परबाबा स्वर्गीय मनीराम सुकुल ने नौतोड़ के जरिए बनाई थी। और दो हारों में बटी थी। सिंचित खेती एक पटिया थी जो पांच बीघे का चक था। यह सुकुल जमींदारों के जंगल बिलहा को तोड़कर बनाई गई थी और दूसरी करीब दस बीघा जमीन का एक चक जो अकबरपुर के कुर्मी जमींदारों के महुए के जंगल को तोड़कर। इसके एवज में मनीराम बाबा ने सलामी तो दी ही थी और दस साल तक हमारे परिवार को गांव के दोनों जमींदारों के यहां बेगार करनी पड़ी थी। कुर्मी जमींदार के यहां रसोई संभालने का काम तथा जाड़ों में उनकी फसलों की सुरक्षा का काम व गर्मी में उनके खलिहान में सोना पड़ता। दादी को कुर्मियों की बहू को खुश रखने के लिए उनके यहां जाकर दही बिलोना पड़ता और पीसन का काम करना पड़ता। और सुकुल जमींदारों के यहां पानी पिलाने से लेकर उनकी बहुओं के मायके जाने पर उनके साथ बतौर सिपाही बनकर जाना पड़ता या फिर जमींदारनी के तीरथ जाने पर उनकी गाड़ी के पीछे-पीछे भागना पड़ता। जमींदार इसके बदले उन्हें कोई ईनाम इकराम तो नहीं देते बस नौतोड़ की जमीन का लगान दस साल तक के लिए माफ था।
मेरे बचपन तक गांव में नील की कोठियां बनी थीं। हम उनमें जाकर छुपन छुपाई खेलते या रात को कुर्मी लोग अपने ढोर बांधते। कुछ और काम भी यहां होते मसलन जिसको प्रेम की प्रबल चाह होती तो वह गांव की नजरों से बचकर यहीं आ जाता भले किसी भोले भाले लड़के को पटाकर लाया हो अथवा किसी लड़की को उड़ाकर। पर एक जमाने में अंग्रेज सौदागर लुईस पफ ने यहां पर जमींदार से जमीनें ठेके पर लेकर किसानों से जबरिया नील की खेती करवानी शुरू की थी। और उसकेे बदले में उन्हें न तो खाद्यान्न मिलता न कोई खास नगदी। यहां तक कि उनकी मजूरी भी न मिलती। पर गांधी बाबा के कारण जब निलहे भाग गए तो कोठियां वीरान हो गईं और उनके लगाए जंगल भी उजड़ गए। तब जमींदारों ने उन जंगलों को खालसा मानकर उन्हें अपनी जमीन में मिला लिया और साधारण सलामी लेकर उन्हें भूमिहीन किसानों को विकसित करने को दे दिया गया। इन जंगलों को तोडऩा आसान नहीं था। आमतौर पर जंगल तोडऩे के लिए हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती और पांच साल तक तो उनमें दाना भी नहीं उगता। पर जमींदार इसके लिए किसानों को अपने अहसान तले दबा लेता। यह साल १९२० का जमाना था जब हमारे परबाबा और बाबा ने जमीन तोड़ी। पंाच बीघे के इस जंगल को तोडऩे के लिए दादी और बुआदादी को भी जाकर फड़वा चलाना पड़ता। मालूम हो कि हमारी बुआदादी छह साल तक चूडिय़ां पहनने के बाद विधवा हो गई थीं और विधवा होने के बाद वे सारा जीवन हमारे यहां ही रहीं। बेहद गरीबी और भुखमरी के दिन थे वे।
दरअसल मनीराम बाबा हमारे सगे परबाबा नहीं थे वे बाबा के ताऊ जी थे और अपने छोटे भाई व उसकी पत्नी के भरी जवानी में ही चल बसने के बाद से उन्होंने हमारे बाबा को पाला पोसा था। बाबा कुल चार साल के थे जब उनके पिता और मां चल बसीं। मनीराम बाबा ने शादी नहीं की थी। कहना चाहिए कि हुई ही नहीं थी। इसकी भी विचित्र कहानी है। मनीराम बाबा अपने तीन भाईयों में मंझले थे। उनके पिता कन्हाई बाबा रानी झांसी की फौज में सिपाही हुआ करते थे। जब १८५७ में लड़ाई शुरू हुई और १८५८ में रानी को मार दिया गया और झांसी पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया तो रानी समर्थक वहंा से भागे। अधिकंाश लोग सुदूर सिंध के कराची शहर में जा बसे। वहंा अंग्रेजों का खतरा कम था। हमारे परबाबा के पिता कन्हाई बाबा अपनी पत्नी चिरौंजी देवी व अपने बच्चों को लेकर कराची चले गए पर उनके भाई व चाचा लोग अपने पुश्तैनी गांव कानपुर जिले में ही भोगनीपुर तहसील के तहत गिरसी के पास गुलौली में ही रहते रहे। कराची में रहते हुए १८८५ में कन्हाई बाबा का निधन हो गया। उनकी धर्मपत्नी एक दिन रोती-कलपती अपने बच्चोंं को लेकर गुलौली लौट आईं। हमारे परिवार में बताया जाता है कि एक ङ्क्षसधी उन्हें बैलगाड़ी में बिठाकर कराची से गुलौली लेकर आया था। वह  ङ्क्षसधी परिवार फिर कराची वापस नहीं गया और कानपुर शहर में रहकर व्यापार करने लगा। बाद में उसका परिवार कानपुर शहर में साडिय़ों को थोक व्यापारी बना और नौघड़ा में सबसे बड़ी दूकान उसी की हुई। गुलौली में अपनी भाभी को तीन बच्चों समेत आया देख कन्हाई बाबा के छोटे भाई बनवारी बाबा के मन में पाप आ गया और उन्होंने अपनी भाभी तथा उनके बच्चों को  मार डालने की ठान ली। बताया जाता है कि चिरौंजी दादी के खाने में जहर दिया गया। पर मरते-मरते उन्होंने अपने बच्चों को जीवनदान दे दिया। बच्चों को उन्होंने फौरन गुलौली से भगाकर अपनी बड़ी बेेटी की ससुराल रठिगांव भेज दिया। कन्हाई बाबा अपनी बेटी की शादी पहले ही कर गए थे। चिरौंजी दादी तो नहीं रहीं पर बच्चे बहन के घर में आ गए। रठिगांव गुलौली से करीब तीन कोस पूरब में है। बहन की ससुराल वाले खाते पीते किसान थे। शुरू में तो बहन के ससुराल वालों ने इन बच्चों को प्यार से लिया पर जब पता चला कि वे यहीं रहेंगे तो उनसे दुरदुराने लग। बहन अपने छोटे भाईयों को अपमान सहती रही पर एक दिन उसने कह दिया कि देखो तुम लोगों के पास अपनी खेती है सो अपने गांव जाओ वर्ना तुम्हारे चाचा लोग जमीन हड़प कर जाएंगे। उस समय सबसे बड़े शिवरतन बाबा लगभग आठ साल के तथा मनीराम बाबा पांच साल के व रामचरन बाबा ढाई तीन साल के रहे होंगे। अब ये तीनों भाई कहां जाएं? ये अनाथ बच्चे नहर के किनारे-किनारे गिरसी की तरफ बढ़े। नहर के किनारे तब घोर जंगल था। बर्घरे व भेडिय़ों का भी आतंक। तीनों रोते कलपते जा रहे थे। रास्ते में दुर्गादेवी का मंदिर पड़ा तो ये परसाद के लालच  में मंदिर चले गए। मंदिर एकदम निर्जन और खंडहर जैसा था। मंदिर के अंदर बैरागी सुकुल जोर-जोर से दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे थे। बच्चे कुछ पाने की आस में बैठे रहे। जब पूजा के बाद बैरागी सुकुल ने इन्हें देखा तो चौंके पूछा इस घने जंगल में कस? बच्चे रोने लगे और बोले भूख लगी है। बैरागी बाबा ने भुट्टे भून कर खिलाए। तब इन बच्चों ने अपनी रामकहानी बताई।  बैरागी सुकुल ने पूछा जाति? बच्चों ने बताया कि सुकुल बांभन हैं। जनेऊ हुआ कि नहीं तो बच्चे चुप। बैरागी सुकुल तीनों बच्चों को अपने गांव दुरौली ले आए जहां पहले तो इनका जनेऊ किया फिर अपने घर पर ही खेतों की देखभाल के काम में लगा दिया।
यहीं पर काम करते हुए जब ये बच्चे बड़े हो गए तो बैरागी सुकुल ने कुछ जमीन छप्पर छाने के लिए दे दी और कुछ पैसे देकर कहा कि बच्चों अब तुम अपना काम अलग करो। शिवरतन बाबा ने सबसे पहले अपना छप्पर अलग किया और एक तिवारी परिवार की सद्य विधवा कन्या को लेकर अलग रहने लगे। शिवरतन बाबा ने लोकलाज के कारण कहना चाहिए कि डर के कारण विवाह तो नहीं किया पर रहते वे उन विधवा दादी के साथ ही थे। एक बेटी उनके हुए जिसकी गांव में ही एक गरीब परिवार में शादी हो गई। दूसरे परबाबा मनीराम ने शादी नहीं की और अपने छोटे भाई के साथ रहने लगे। छोटे भाई रामचरन बाबा की शादी बिनौर के तिवारी परिवार में करवा दी। रामचरन बाबा अपने बड़े  भाई के साथ मिलकर सुकुल जमींदार के यहां नौकर हो गई। पर अब परिवार बढ़ गया था और जमींदार की नौकरी न तो समाज में प्रतिष्ठा दिलाती थी न जमींदार बाबू समय पर पैसा देते थे। इसलिए पहले तो मनीराम बाबा ने गोरू यानी ढोर चराने शुरू किए। पशुपालन का काम करते हुए मनीराम बाबा ने पैसा तो मजे का इकट्ठा कर लिया पर सामाजिक प्रतिष्ठा में यह परिवार शून्य था। इसलिए दोनों भाईयो ने एक जोड़ी बूढ़े बैल खरीदे और बटाई पर कुछ खेत लेकर जोतने बोने लगे। पर तब खाद पानी तो मिलता नहीं था। इसलिए उपज का बड़ा हिस्सा लगान, आबपाशी या अन्य खर्चों में ही निकल जाता। गांव में धनीमानी किसान कम ही थे और जमींदार अपनी जमीन कम देता और बेगारी ज्यादा करवाता। इसलिए मनीराम बाबा जमींदारों की सेवा करते रहते ताकि कोई खुश होकर उन्हें नौतोड़ की जमीन दे दे। रामचरन बाबा बस मनीराम बाबा जो कहते वही करते रहते।  रामचरन बाबा की तीन संतानें हुईं पहले एक बेटी मूला बुआ फिर बेटा जिसका नाम रखा ठाकुरदीन उर्फ पहलवान और तीसरी फिर एक बेटी रज्जो बुआ। ठाकुरदीन हमारे बाबा थे।
अकबर पुर के कुर्मी जमींदारों का कुछ जंगल हमारे गांव में था। उन्होंने सलामी लेकर करीब दस बीघे का महुए का जंगल मनीराम बाबा को दे दिया। मनीराम और रामचरन बाबा दोनों वहीं ढोर चराने जाते और इसके बाद जंगल तोड़ते। एक दिन रामचरन बाबा को सांप ने डस लिया और खूब झाड़ फूंक करवाए जाने के बाद भी उनके प्राण बचाए न जा सके। मनीराम बाबा पर दोहरी आफत आन पड़ी अब वे निपट अकेले थे और उन्हें अपने छोटे भाई  के परिवार को भी पालना था। रामचरन बाबा के मरने के दसवें रोज उनकी पत्नी का भी निधन हो गया। शायद भविष्य का डर उन्हेें ले डूबा। अब मनीराम बाबा के सामने छोटे भाई के तीन अबोध बच्चों को पालना भी था। मूला बुआ की उम्र करीब सात साल की थी और बाबा ठाकुरदीन तब चार साल के थे तथा रज्जो बुआ डेढ़ साल की। घर में मनीराम बाबा के बाद मूला बुआ ही मालकिन थीं लेकिन वे नाक पर मक्खी तक न बैठने देतीं। रज्जो रोतीं तो उन्हें खूब मारतीं अलबत्ता भाई से उन्हें बेपनाह मुहब्बत थी। मनीराम बाबा दिन में जंगल तोड़ते ढोरों की भी रखवाली करते अब उनके पास बटाई के खेत जोतने की कूवत नहीं थी इसलिए किसानों ने उन्हें बटाईदारी से बेदखल कर दिया। पर ढोरोंं से इतनी आमदनी हो जाती कि घर का खर्च चलने लगा। कुछ पैसा जुड़ा तो बाबा ने गांव के ही एक तिवारी परिवार के मुनीम लड़के से मूला बुआ की शादी कर दी। मूला बुआ तब नौ साल की हो गई थीं। शादी अब टाली नहीं जा सकती थी। लेकिन १९ वर्ष की उम्र में ही मूला बुआ विधवा हो गईं तो मनीराम बाबा उन्हें अपने घर ले आए। मूला बुआ की एक लड़की भी थी जो भी अपने ननिहाल आ गई। दस बीघे की खेती भी होने लगी और घर में बूढ़े मनीराम बाबा और उनके पालित पुत्र ठाकुरदीन बाबा। कमाई भी ठीकठाक होने लगी तो बिलहा का जंगल लिया गया और उसे तोडऩे की योजना बनाई गई। पर यहां मनीराम बाबा अकेले पड़ गए क्योंकि अकेले होने के कारण ठाकुरदीन बाबा पर उनकी लगाम ढीली पड़ गई थी। उन्हें पूरा पांच बीघे का चक अकेले ही तोडऩा पड़ा। पर पटिया के नाम से जाना जाने वाला यह चक हमारे परिवार में खुशहाली लेकर आया। रज्जो बुआ की शादी फतेहपुर जिले के बसफरा गांव में एक मिश्र परिवार में कर दी गई।
कामधाम तो ठाकुरदीन बाबा पहले से नहीं करते थे और अब उन्हें जुआ खेलने का चस्का पड़ गया लिखत-पढ़त में जमीन ठाकुरदीन बाबा के ही नाम थी। वे अक्सर कोई न कोई ढोर जुए में हार जाते। यह १९२१ का साल था जब मनीराम बाबा ने पटिया तोड़ ली। यानी अब ठाकुर दीन बाबा के नाम करीब १५ बीघे की खेती थी। इसी साल ठाकुर दीन बाबा की शादी डेरापुर तहसील के गांव डुबकी के एक दुबे परिवार की कन्या से कर दी गई। हमारी दादी यानी कौशिल्या जब अपनी ससुराल आईं तो उनकी अगवानी के लिए कोई सास नहीं बल्कि ननद के रूप में एक ऐसी स्त्री थी जो दादी से कहीं ज्यादा सुंदर और अभिमानिनी थी। मूला बुआ का खूब लंबा चौड़ा कद, दूध की तरह गोरा रंग, सुतवां नाक और ठेठ उर्दू बोलने की उनकी शैली किसी को भी उनके समक्ष बौना बना देती थी। दादी अपेक्षाकृत गरीब परिवार से आई थीं और हमारा परिवार पशुपालन के कारण एक सामान्य किसान की तुलना में संपन्न था बस सामाजिक प्रतिष्ठा के मामले में कमजोर था। मनीराम बाबा मूला बुआ के अहंकार से नाराज भी रहते और अपने भतीजे तथा पालित पुत्र ठाकुरदीन बाबा की हरकतों के चलते भी। ठाकुर दीन बाबा की शादी हो गई थी पर वे रात-रात भर घर से गायब रहते और बीवी के जेवरों से जुआ खेलते। उनके ताऊ उन्हें डांटते तो वे अब आंखें दिखाते क्योंकि जमीन उनके नाम थी। अब हम सिर्फ पशुपालक ही नहीं गांव की मर्यादा के अनुरूप किसान थे। पर भले हमारे पास १५ बीघा यानी १२ एकड़ जमीन रही हो पर पटिया छोड़कर बाकी की जमीन खाखी ही थी जिसमें चना और अरहर के अलावा और कुछ न पैदा होता। तब कैश क्रॉप्स यानी नगदी फसलों का जमाना नहीं था। अरहर की कोई खास कीमत नहीं होती थी। उड़द दलहन में  राजा था और धान अन्य खाद्यान्नों में। पर धान सिर्फ पटिया में ही होता। बड़े हार यानी दस बीघे की जमीन सिंचित नहीं थी भले ऊसर नहीं था पर पानी नहीं मिलता। इसलिए मनीराम बाबा को और पैसे कमाने के लिए कुछ और जमीन तोडऩी पड़ी। वे घर की कलह से खिन्न भी रहते। उन्हें पता था कि उनका पुत्र किसी काम का नहीं और उनकी बेटी बहू से खामखां में जूझती रहती है। दूसरे प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए मूला बुआ पर अंकुश जरूरी था। पढ़े लिखे थे नहीं कि मूला विवाह के दूसरे विवाह की कल्पना भी कर लेते। तब तक ब्राह्मण परिवारों में ऐसा सोचा जाना तक नामुमकिन था। इसलिए वे मूला बुआ को अपने साथ खेतों पर काम के लिए ले जाने लगे। ठाकुरदीन बाबा को इससे कोई मतलब नहीं था कि बुढऊ कैसे कमाते हैं। उन्हें तो बस जुआ खेलने को पैसे चाहिए थे न मिलते तो वे दादी के जेवर तक भेंट चढ़ा आते। हालांकि तब तक वे एक पुत्र के पिता बन चुके थे। ठाकुर दीन बाबा के यही बड़े पुत्र यानी मेरे  पिता ने आगे चलकर अपने घर में वो क्रांति कर दी जिसकी कल्पना तक मनीराम बाबा नहीं कर सकते थे।
पर इस बीच कुछ ऐसी घटनाएं हो गईं जिससे मनीराम बाबा टूट गए। एक तो बेटी मूला की बेटी की शादी। मूला बुआ जिद पकड़े थीं कि उनकी बेटी की शादी खूब संपन्न परिवार में हो, लड़का सुंदर हो तथा कुल में सर्वश्रेष्ठ हो। विधवा बेटी की जिद। मनीराम बाबा ने हमीर पुर के पहाड़पुर के एक बड़े जमींदार के कुलदीपक को ढूंढ़ निकाला। युवा, सुंदर, गौरवर्णी तथा पोतड़ों के रईस। वह भी खोर के पांडेय यानी कनौजियों में सबसे ऊपर। मनीराम बाबा ने अपनी हैसियत से ज्यादा दहेज दिया और इसके लिए सारे ढोर बेच दिए गए। बारात आई और पांच दिन ठहरी। एक दिन पक्की यानी पूरी सब्जी, दूसरे दिन कच्ची और तीसरे रोज उन्होंने कलिया की मांग कर दी। कलिया यानी बकरा। अब काटो तो खून नहीं। गांव मेंं सिर्फ ब्राह्मण, कुर्मी या एकाध अहीर और कुछ चमार। सब के सब पक्के वैष्णव। दो परिवार बलाहियरों के थे और तीन खटिकों के। पर वे सुअर खाते थे। चमार परिवार स्वामी अछूतानंद के शिष्य थे वह भी कंठीधारी। अब इन कनौजियों के लिए कलिया कहां से लाया जाए? मालूम हो कि कनौजिया ब्राह्मणों में बीसों बिस्वा वाले श्रेष्ठ और कुलीन ब्राह्मण परिवारों में मांसाहार जायज था। ऊपर से बड़े जमींदार जिनकी उठक बैठक अंग्रेजों के साथ होती रहती थी। मनीराम बाबा को कुछ समझ ही नहीं आया कि क्या करें? भागे-भागे दोनों जमींदारों के पास गए। वे भी भौंचक्के रह गए। पांडेय जी के बुजुर्गों को बुलाकर बात की गई। सहमति यह बनी कि मनीराम बाबा २०० रुपये देंं बाकी कलिया और दारू व भांग का इंतजाम पांडेय जी कर लेंगे। १९३९ में २०० रुपये कोई साधारण बात नहीं थी। मनीराम बाबा और ठाकुरदीन बाबा ने पटिया की जमीन रेहन रख दी और रुपयों का इंतजाम हो गया। ठाकुरदीन बाबा को भी अपनी बहन से असीम प्यार था इसलिए जमीन रेहन रखने को वो भी राजी हो गए। लेकिन मूला बुआ की बेटी जमींदारनी तो बन गई पर हमारा परिवार किसान से मजूर बन गया। जानवर भी गए और जमीन भी।
पिताजी यानी ठाकुरदीन बाबा के बड़े बेटे रामकिशोर ने इस बरबादी और पांडेय जमींदार की इन हरकतों को करीब से देखा। उनकी उम्र तब तक १२ साल की हो गई थी। पंाचवें दरजे की पढा़ई के लिए दूसरे गांव जाना पड़ता और घर में खाने के लाले। उनके पिता यानी ठाकुरदीन बाबा ने उनकी पढ़ाई छुड़वा दी और कहा कि गोबरधन बनिया के यहां रहकर कुछ मुडिय़ा सीख लो कहीं न कहीं मुनीम तो लग ही जाओगे। यह अप्रत्याशित था और पिताजी ने परिवार से दूर रहकर स्वतंत्रता आंदोलनों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मनीराम बाबा के लिए दोहरी मुसीबत थी। पुत्र जुआरी और पोता अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोले था। यही वह दौर था जब इलाहाबाद के आसपास बाबा रामचंदर किसान आंदोलन को सुलगा रहे थे। पर कानपुर के गांवों में इस किसान आंदोलन का असर नहीं पड़ा क्योंकि अंगे्रजों ने पूरब तथा अवध में रैयतवारी की दूसरा कानून बना रखा था लेकिन दोआबे में अलग इसलिए यहां के किसान अवध के किसानों की तरह जमींदारों के चंगुल में नहीं थे तथा यहां पट्टीदारी व्यवस्था न होने से औरतों के भी कानूनी हक थे और जमीन में हिस्सा भी। पर किसान आंदोलन चला तो गंाधी जी का अंादोलन भी यहां पहुंचा। पिताजी स्कूल जाने के बहाने गांवों में चल रही चरखा क्रांति में भी शरीक होने लगे। गांव के ही सुकुल जमींदार के लाड़ले स्वामीदीन सुकुल, कुर्मियों में पराग नाना और मन्ना चमार को मिलाकर गांव में भी कांग्रेस की एक ईकाई खोली गई और रोज सुबह प्रभात फेरी व चर्खा गान होने लगा। इसमें दुर्गा मुंशी, मैकू दरजी, भगवान दीन और गांव के ही एक दूकानदार गोबरधन साहू के साहबजादे भी शामिल थे। पर हिरावल दस्ते में पिताजी व मन्ना चमार तथा पराग नाना व स्वामी दीन  सुकुल थे। स्वामी दीन सुकुल जमींदारों के अत्याचारों के खिलाफ कुछ नहीं बोलते थे।
पिताजी को इस तरह की खुराफातों से दूर करने के लिए दादी ने एक तरीका निकाला। उनकी छोटी बहन अंगदपुर में टंडन जमींदार के एक कारिंदा जी को ब्याही थीं। यह एक बेमेल विवाह था। दादी के मायके वाले गरीब थे इसलिए दादी के पिता ने अपनी तीनों कन्याएं ऐसे परिवारों में ब्याहीं जिन्हेंं लड़की चााहिए थी। दादी की बड़ी बहन जिस परिवार में ब्याही थी वह परिवार कुछ वजहों से अपने समाज से च्युत था। और उनकी छोटी बहन कैलाशी जिन कारिंदा जी को ब्याही थीं वे थे तो राजसी ठाठबाट वाले पर उनकी पहली पत्नी को मरे अरसा हो चुका था। काङ्क्षरदा जी यानी अग्रिहोत्री जी करीब ५० साल के थे और कैलाशी दादी मात्र १५ साल की। उनके  कोई संतान नहीं हुई इसलिए हमारी दादी जिनके तब तक तीन पुत्र हो चुके थे अपने बड़े बेटे को कैलाशी बहन के यहां अंगदपुर भेज दिया। अंगदपुर में खाने पीने की कमी नहीं थी। पिताजी के मौसा अमरौधा के टंडन परिवार के कारिंदा थे। टंडन परिवार की ही अंगदपुर में जमींदारी थी। इसलिए कारिंदाजी यानी पिताजी के मौसा के पास अपने गांव में करीब बीस एकड़ सिंचित भूमि, आम और अमरूद व केले के बगीचे, एक तालाब तथा गांव में दो विशालकाय घर थे। गांव में दोमंजिले घर तब दुर्लभ थे लेकिन अग्निहोत्रीजी का घर दोमंजिला था। यही अग्निहोत्रीजी पिताजी के मौसा थे। जब तक अग्निहोत्रीजी जिंदा थे पिताजी को वे पसंद करते थे लेकिन पिताजी की मौसी अपने इस भतीजे को पसंद नहीं करती थीं। वे अपने भाई को पसंद करती थीं। इस मामले में मेरी दादी और उनके भाइयों के बीच एक प्रतिद्वंदिता चलती थी। हालांकि ऊपर से रिश्ते मधुर दिखते थे लेकिन अंदर ही अंदर भारी मारकाट थी। पिताजी के मौसा के मरते ही पिताजी के बड़े मामा आ धमके और उन्होंने राजनीति करके पिताजी का पत्ता वहां से साफ करवा दिया। हालांकि इसे अंजाम देने में उन्हें दस साल लगे। इसमें पिताजी की कुछ गलती थी दूसरे अपने परिवार से मां के अलावा इसमें उन्हें किसी का सपोर्ट नहीं मिला। ठाकुरदीन बाबा  को अंगदपुर में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वे अंगदपुर की अपनी साली को कतई पसंद नहीं करते थे। मूला बुआ को भी अपने इस बड़े भतीजे से बहुत सनेह था। वे नहीं चाहतीं थीं कि रामकिशोर दूसरों के यहां पड़ा रहे। उन्होंने वे शानदार दिन देखे थे जब हमारे यहां दूध दही की कमी नहीं था और भले गेहूं न हो पर खाद्यान्न कोठारों में भरा ही रहता था। इसिलए उन्हें भी दादी की यह तरकीब पसंद नहीं आई। उधर पिताजी के मौसा यानी कारिंदा जी की मृत्यु हो गई और कैलाशी दादी को अपनी जमीन बचाए रखने के लिए पड़ोस के त्रिवेदी परिवार के बराबर ताकत जरूरी थी। पिताजी अकेले पड़ जाते और त्रिवेदी का कुनबा बड़ा था और वे येन केन प्रकारेण काङ्क्षरदा जी की विधवा से जमीन हड़पना चाहते थे। ठाकुरदीन बाबा अंगद पुर आते नहीं थे हालांकि वे अपने गांव के आसपास पहलवान के रूप में जाने जाते थे लेकिन अंगदपुर की जमीन में उनकी दिलचस्पी कतई नहंी थी। इसलिए पिताजी को अंगदपुर से बेदखल होना ही पड़ा। और उनके मामा लोग वहां काबिज हो गए। बस शुक्र यह रहा कि बेदखल होने के बावजूद पिताजी के  अपनी मौसी व मामाओं से ताल्लुकात मधुर रहे।
लेकिन इसका खामियाजा यह भुगतना पड़ा कि पंाडेय जी की कलिया की खातिर रेहन रखी जमीन हम छुड़ाई नहीं जा सकी। और पिताजी को गांव आकर जमींदार के यहां मजूरी करनी पड़ी। कभी ईंट पाथो तो कभी पानी लगाओ या खेतों की रखवाली करो। मनीराम बाबा तब तक आंखें गंवा चुके थे और पहलवान यानी ठाकुरदीन बाबा के रूटीन में कोई फर्क नहीं आया था। पर पिताजी इस सबके बावजूद कांग्रेस के आंदोलन से जुड़े रहे और कुछ साहित्यिक मिजाज का होने के कारण गांव में ही स्वामीदीन सुकुल, पराग नाना और मन्ना चमार से कहकर माया व माधुरी तथा चांद व हंस जैसी पत्रिकाएं व प्रताप जैसा अखबार मंगाते रहे। १९४५ में उनकी शादी हो गई और १९५० में वे कानपुर शहर आ गए। यहां उन्हें स्वदेशी काटन मिल में मजदूरी का काम मिल गया। यहीं वे कामरेड सुदर्शन चक्र के संपर्क में आए तथा सीपीआई से जुड़े। १९५६ में जब स्वदेशी मिल में ८० दिनों की स्ट्राइक हुई तो वे मजदूरों में अलख जगाए रखने के लिए उनके बीच जाकर कविताएं सुनाते तथा परचा निकालते। राहुल संाकृत्यायन ने पिताजी की इस निष्ठा की सराहना की थी। पर हम किसानी प्रतिष्ठा खो चुके थे और हमारा परिवार शहरी सर्वहारा बन चुका था।

मदारी पासी के जरिए किसानों का एका

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मदारी पासी के जरिए किसानों का एका

 
मदारी पासी के जरिए किसानों का एका
शंभूनाथ शुक्ल
स्वतंत्रता की पहली लड़ाई १८५७, जिसे अंग्रेजों ने गदर कहा है को दबा देने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसरों ने अवध के किसानों का सबसे ज्यादा दमन किया। जमीनें उनसे छीनकर अंग्रेजों के दलाल जमींदारों के अधीन कर दी गईं और वे जमींदार अंग्रेजों के एजेंट के तौर पर काम करते थे। एक मई १८७६ को महारानी विक्टोरिया ने इंडिया को ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन कर लिया। लेकिन इससे न तो भारत का भाग्य बदला न किसानों की पीड़ा। उल्टे अब दो-दो स्तर पर उनका दमन होता था। अंग्रेज सरकार अपने स्तर पर उनका दमन तो करती ही थी स्थानीय महाजनों, साहूकारों और जमींदारों ने कभी बेगार के बदले तो कभी सूद के बदले उनके खेत व जेवर छीनने शुरू कर दिए। किसानों की बहुएं बेटियां भी इन जमींदारों की क्रूरता के चलते सुरक्षित नहीं थीं। ऊपर से नगदी लगान के कारण वे साहूकारों व महाजनों के आगे पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी जमीन जायदाद ही गिरवी नहंी रखते गए वरन् खुद को भी गिरवी रखते गए। बीसवीं सदी शुरू होते ही बंगाल सूबे का बटवारा हो गया और नई रैयतवारी व्यवस्था तथा बंदोबस्त प्रणाली लागू हुई। अवध के किसानों पर इसका और भी बुरा असर पड़ा। जमीनें बढ़ाने के लिए जंगलों को तोड़ा जाने लगा और नौतोड़ की इस व्यवस्था में किसानों ने मेहनत तो खूब की पर उन्हें उसका अपेक्षित लाभ नहंी मिला। उपजाऊ नई जमीनें समतल तो किसान करते लेकिन जैसे ही उनमें फसल उगाने का क्रम शुरू होता उन पर लगान की नई दरें लागू हो जातीं। किसान सपरिवार मेहनत कर जमीनें तोड़ते लेकिन इसका लाभ उन्हें नहीं मिलता। यह वह दौर था जब पूरे अवध के इलाके में किसान बुरी तरह पीडि़त था। कांग्रेस के आंदोलन का लाभ शहरी व्यापारियों को तो मिला लेकिन किसान उससे वंचित रहे। कौंसिलों में शहरी मध्यवर्ग की चिंताओं को लेकर तो हुक्मरान चिंता करते पर किसानों का वहां जिक्र तक नहंी होता।
ऐसे समय में मोहनदास कर्मचंद गांधी फलक पर प्रकट होते हैं और निलहे गोरों के जुल्मों को उघाड़ कर किसानों की पीड़ा को उन्होंने धार दी। चंपारन में राजकुमार शुक्ल के साथ मोतिहारी जाकर उन्होंने किसानों की पीड़ा को महसूस किया। उन्होंने अपनी लिखा पढ़ी और अपनी वकालत की ताकत से किसानों को निलहे गोरों के जुल्म से आजाद कराया। लेकिन गांधी जी  इसके बाद कांग्रेस के बड़े नेता हो गए। कांग्रेस ने उन्हें हाथों हाथ लिया और वे धीरे-धीरे किसान आंदोलन से दूर होते गए। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से किसानों का गांधी से मोहभंग हो गया। अब किसान आंदोलन में कांग्रेस की भूमिका सिर्फ जमींदारों और सेठ साहूकारों के हितों के पोषक भर की रह गई। पूरे अवध के इलाके में किसान तबका बुरी तरह परेशान था। शहरी क्षेत्रों में नई मिलें खुल जाने तथा रेलवे, कचेहरी और व्यापार के चलते गांवों का पढ़ा लिखा तबका शहर आ बसा। और शहरों की इस कमाई से उसने गांवों में जमींदारी खरीदनी शुरू कर दीं। ये नए कुलक किसी और गांव में जाकर जमींदारी खरीदते और अपनी रैयत से गुलामों जैसा सलूक करते। इन नए शहरी जमींदारों को कांग्रेस का परोक्ष समर्थन भी रहता। इसीलिए किसानों की गांधीबाबा से दूरी बढऩे लगी। यह वह दौर था जब अवध में किसानों के संगठन बाबा रामचंदर या मदारी पासी के नेतृत्व में बनने लगे। बिहार में त्रिवेणी संघ और अवध में तीसा आंदोलन इसी दौर में पनपे। इनको परोक्ष रूप से क्रांतिकारी संगठन हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी और साम्यवादी संगठनों का भी समर्थन था। सत्यभक्त, राधा मोहन गोकुल जी, राहुल संाकृत्यायन, स्वामी सहजानंद भी किसानों को संगठित करने में लगे थे। यह तीसा आंदोलन काफी व्यापक रूप से फैला लेकिन गांधी जी के असहयोग और जवाहर लाल नेहरू की उदासीनता के चलते यह आंदोलन अंग्रेजों द्वारा कुचल दिया गया पर इससे यह समाप्त नहंी हुआ। अंग्रेजों को किसानों को तमाम सहूलियतें देर सबेर देनी पड़ीं और एक निश्चित अवधि के बाद किसानों को जमीन पट्टे पर लिखनी पड़ीं।
इस किसान आंदोलन ने पत्रकारिता के साथ-साथ उस दौर के कथा साहित्य पर भी व्यापक असर डाला। प्रेमचंद का गोदान गुलाम बनते किसानों की पीड़ा को दर्शाता है कि कैसे होरी बाद में किसान से मजूर बन गया। किस तरह किसान पीडि़त था और कैसे उसे सेठ साहूकार और महाजन तथा जमींदार कभी-कभी लगान के नाम पर तो कभी बेगार के नाम पर और कभी धर्म के नाम पर परेशान कर रहे थे। मशहूर अंग्रेजी उपन्यासकार मुल्कराज आनंद ने १९४२ में अपना मशहूर उपन्यास द स्वोर्ड एंड द सिकल ( ञ्जद्धद्ग स्2शह्म्स्र ड्डठ्ठस्र ञ्जद्धद्ग स्द्बष्द्मद्यद्ग) रायबरेली के किसान आंदोलन पर ही लिखा है। असंख्य कविताएं भी इस दौर में लिखी गईं। पर हिंदी में इस आंदोलन को केंद्र में रखकर कोई भी उपन्यास नहीं लिखा गया। हालंाकि कमला प्रसाद त्रिपाठी ने पाहीघर, अमृतलाल नागर ने गदर के फूल और अमरकांत ने १८५७ को आधार बनाकर किसानों पर कुछ अच्छे उपन्यास लिखे। लेकिन मदारी पासी और बाबा रामचंदर के आंदोलन पर कुल जमा दो ही उपन्यास उल्लेखनीय हैं। एक तो कमला प्रसाद त्रिपाठी का बेदखल और दूसरा कामतानाथ का काल कथा। बेदखल बाबा रामचंदर के तीसा आंदोलन पर लिखा गया है। जबकि काल कथा के केंद्र में मदारी पासी है। इसके अलावा वीरेंद्र यादव का शोध इस आंदोलन की सर्वाधिक प्रामाणिक जानकारी देता है। कामतानाथ का उपन्यास काल कथा के केंद्र में दूसरे विश्व युद्ध के बाद का दौर है जब देश में हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी कांग्रेस के समानांतर एक संगठन बन गया था और लोगों में गांधी से मोहभंग होने लगा था। काल कथा में हालांकि कामता जी ने शहरी आंदोलन पर ज्यादा फोकस किया है लेकिन अवध के गांवों की मानसिकता तथा वहां पर हो रही सुगबुगाहट को उन्होंने अनदेखा नहीं किया है।
दरअसल कामतानाथ समानांतर कथा अंादोलन की उपज थे इसलिए उन्होंने वही लिखा जिसे करीब से देखा, महसूस किया और सुना। निजी जीवन में वे एक शहरी थे। पूरा जीवन उनका लखनऊ व कानपुर में कटा। रिजर्ब बैंक में स्टाफ अफसर थे लेकिन गांव और गंवई परिवेश की इतनी समझ कम लोगों के पास रही होगी। उनका सपना था बीसवीं सदी के शुरुआती तौर के अवध के गांवों की एक तस्वीर अपनी कलम से उतार देने की। इसीलिए उन्होंने काल कथा को चार खंडों में लिखने की योजना बनाई थी पर दो लिखने के बाद ही काल ने उन्हें हमसे छीन लिया। लेकिन इन दो खंडों में ही वे अपनी पूरी बात कहते हुए प्रतीत होते हैं। एक कानून गो कायस्थ परिवार के सहारे उन्होंने इस उपन्यास का ताना बाना बुना और उसमें एकदम खरे उतरे। उस समय उन्नाव और लखनऊ के गांवों में किसान कैसी समस्याओं से जूझ रहे थे और ताल्लुकेदार अपनी ऐयाशियों मेें डूबे हुए थे। लेकिन अंदर ही अंदर किसानों के अंदर ताल्लुकेदारों के खिलाफ, अंग्रेज निजाम के खिलाफ और गंाव के अंदर परंपरागत ढांचे के खिलाफ एक गुस्सा फूट रहा था इसका अच्छा विवरण काल कथा में मिलता है। वे किसान जो अंगे्रजों की नई बंदोबस्त प्रणाली के कारण किसान से मजदूर बनते जा रहे थे और खेती का दायरा सिमटता जा रहा था, लगातार सुलग रहे थे। भले कांग्रेस किसानों के मामले में एक रहस्यमयी चुप्पी साधे हो पर तमाम ऐसे लोग थे जो इस आंदोलन को हवा दे रहे थे। इसमें किसान सभा से लेकर मदारी पासी का आंदोलन तक था। कामतानाथ ने इन सब आंदोलनों को बखूबी मुखर किया है कालकथा में।
पहले विश्वयुद्ध के कुछ पहले जब निलहे गोरों से किसानों को मुक्ति मिल गई थी तो देसी निलहों ने उन जमीनों पर कब्जा कर लिया और अपने कारकुनों के सहारे किसानों पर जुल्म करने लगे। लगान नगद देने की व्यवस्था के कारण किसान के पास कुछ हो या न हो लगान भरना ही पड़ता था। एक ऐसे समय जब फसलों के नगदीकरण की कोई व्यवस्था न थी लगान नगद देने के कारण अवध के किसान बेहाल थे। किसानी सिर्फ उनकी मर्यादा के लिए जरूरी रह गई थी। उन्नाव के एक  गांव चंदन पुर में कानून गो मुंशी रामप्रसाद रहा करते थे। जिनके पास खेती के साथ-साथ कानून गो जैसी नौकरी के कारण गांव में काफी रसूख था और गाजी खेड़ा के ताल्लुकेदार अब्दुल गनी जैसे लोग भी उन्हें बराबरी का मान देते हैं। मुंशी जी के तीन बेटे हैं। जिसमें से बड़े लक्ष्मी गांव में रहते हैं और मझले लखनऊ कचहरी में पेशकार हैं तथा तीसरा दसवीं में कई बार बैठता है पर हर बार फेल हो जाने के कारण लखनऊ चला जाता है नौकरी के लिए। बड़े बेटे लक्ष्मी का बेटा बच्चन भी चाचा के  पास चला जाता है लेकिन जल्दी ही वह लखनऊ में चल रहे राजनीतिक आंदोलनों के प्रभाव में आ जाता है। बस इसी बच्चन के सहारे पूरे उपन्यास का तानाबाना बुना गया है। बच्चन कांग्रेस के विदेशी वस्त्रों की होली जलाए जाने के आंदोलन से शुरू कर खुद को क्रांतिकारियों के बीच जल्द ही पाता है और तब उसे पकड़ कर लाहौर ले जाया जाता है जहां उसे फांसी दे दी जाती है। लेकिन इसके बीच उस समय अवध के गांवों में चल रहे आंदोलन को भी बखूबी उघाड़ा गया है। सबसे ज्यादा अपील करता है मदारी पासी का आंदोलन, जो एक मिथकीय चरित्र जैसा लगता है लेकिन उसके आंदोलन ने न सिर्फ सांप्रदायिक सद्भाव पैदा किया वरन् गांवों में नीची कही जाने वाली जातियों में ऐसा रोमांच पैदा किया कि गांवों के बड़े बड़े रसूख वाले लोगों को उनसे बेगार लेना या उनकी औरतों के साथ बदतमीजी महंगी पडऩे लगी। लेकिन इसके लिए मदारी ने उन्हें तैयार किया।
मदारी के पहले चंदन पुर के पास की अछूत बस्ती दुर्जन खेड़ा में मुंशी जी के बेटे के रिश्ते के साले तेज शंकर, जो कांग्रेस के समर्पित सिपाही हैं, एक चेतना पैदा करते हैं। बूढ़े खूंटी की पुत्रवधू टिकुली के रूप में वहां तेजशंकर को ऐसी साहसी महिला मिलती है जो उस पूरे इलाके में गांधी जी के आंदोलन को हवा देती है। टिकुली का ही साहस था कि वहां मदारी पासी अपनी सभा कर पाते हैं वर्ना अब्दुल गनी और ठाकुर ताल्लुकेदार उस पूरी बस्ती को तहस-नहस कर डालने पर तुले थे। उन्नाव, लखनऊ और सीतापुर व हरदोई में मदारी पासी की लोकप्रियता बिल्कुल गांधी जी की तर्ज पर कुछ अलौकिक किस्म की थी। मसलन उनके बारे में कहा जाता था कि वो हनुमान जी की तरह उड़कर कहीं भी पहुंच जाते हैं। गंाधी जी के साथ उनका चरखा जाता था और मदारी पासी के साथ उनकी चारपाई और छोटी कही जाने वाली अछूत जातियां उन्हें भगवान की तरह मानती थी। पासी जातियां उन्हें अपना गांधी ही मानती थीं और उनके बारे मेें वे गर्व से कहती थीं कि उईं हमार पंचन के गांधी आंय। कामतानाथ ने इसका वर्णन करते हुए लिखा है कि दुर्जन खेड़ा में जब मदारी पासी के आगमन की बात सुनी गई तो मानों सारी छोटी जातियां- चमार, पासी, काछी, नाई, धोबी, डोम, बेहना, कहार, मनिहार और तमाम गरीब किसान जातियों में उत्साह की लहर दौड़ गई और उन सबका एका सम्मेलन आयोजित किया गया। तब तक इन जातियों का इस बात का अहसास होने लगा था कि अगर गांधी जी व कांग्रेस के प्रयास से आजादी मिल भी गई तो गोरे तो चले जाएंगे लेकिन गांवों में ठाकुरों व बांभनों का ही राज चलेगा और ये उसी तरह अत्याचार करते रहेंगे जैसा कि आज हो रहा है।
मदारी पासी के किसी गांव में जाने के पहले उनके लोग उस गांव में जाते और इन नीची जातियों को एक पोटली को छुआकर कसम दिलाते कि वे एक रहेंगे। इस पोटली में एक ज्वार की रोटी और एक टुकड़ा मांस का होता। इसमें रोटी का मतलब होता- ईका मतलब है कि हमार पंचन की लड़ाई रोटी की है या समझ लेव कि पेट की आय अउर मांस का मतलब कि इस लड़ाई में अपने सरीर का मांस तक देंय पड़ सकत है। कामतानाथ लिखते  हैं कि गांव के लोग इसकी व्याख्या यूं करते- मेहनत हमार, धरती की छाती मां हल चलाई हम, फसल काटी हम अउर फल खाएँ सेठ-साहूकार, कि ठाकुर-जमींदार, सो यू अब न चली। जान भले चली जाए मुदा अपन हक हम अब लइके रहब।
इन जातियों को लगता था कि शायद खून खराबा भी होएगा इसलिए जब दुर्जन खेड़ा के कुछ उत्साही युवकों ने पूछा कि का हम कांता-बल्लम लइके आई? तो बुजुर्गों ने समझाया- नहीं कांता-बल्लम अबै न लाओ। जब उइकी जरूरत परी तब वहौ कीन जाई। मदारी पासी अपने साथ सत्यनारायण की कथा की एक किताब और कुरान शरीफ की प्रति लेकर चलते थे। उनके साथ एक पंडित और एक मौलवी भी रहता था जो उन्हें सुनने वाले श्रोताओं को शपथ दिलाते थे कि तुम अपने धर्म की इन किताबों की कसम खाकर कहो कि मदारी पासी की इस लड़ाई में तुम बराबर के साथी रहोगे। मदारी पासी के आगमन पर उसका चित्रण करते हुए कामतानाथ ने लिखा है- “आखिर कोई चार बजे मदारी पासी का आगमन हुआ। भरा हुआ गठीला शरीर, गोल चेहरा, पक्का सांवला रंग, घनी काली गलमुच्छें, सिर के बालों पर मशीन चली हुई, कुर्ता और धोती, कमर में अंगोछे का फेंटा तथा पैर में चमरौधे का जूता। हाथ में लंबा सा बल्लम तथा कमर के फेंटे में तलवार, साथ में लगभग इसी वेशभूषा में चार अंगरक्षक। उनके पीछे एक झोले में सत्यनारायण कथा का सामान और एक गुटका रामायण तथा दूसरे में पीतल के एक पात्र में गंगाजल लिए हुए एक पंडित तथा हरे रंग के कपड़े के बस्ते में कुरान लपेटे हुए एक मौलवी। उनके अतिरिक्त सिर पर उल्टी चारपाई रखे उस पर एक गठरी में खाने पीने का कुछ सामान, गुड़, सत्तू आदि, हुक्का, तंबाकू, लोटा डोर, चारपाई पर बिछाने के लिए एक कथरी और चादर तथा मदारी के दो-एक वस्त्र लिए हुए दो और लोग।”                                                                                                         
मदारी पासी अपने भाषण में साफ कहते थे कि “उन्हें बाबा भले कहा जाए पर न तो हम गांधी बाबा हैं और न गांधी बाबा के आदमी हैं। वैसे हमारा उनसे कोई बैर नहीं है। हम भी चाहते हैं कि अंग्रेज इस मुल्क से चले जाएं। मगर हमारी समस्या दूसरी है। अंग्रेज जाएंगे तो अच्छा ही होगा लेकिन हमको तो हमारे हिंदुस्तानी भाई ही चूसे हैं। खेत हम जोतें और फसल ले जाएं सेठ साहूकार और जमींदार। बेगार भरें सो अलग। उस पर हमारी बहू बेटियों की कोई इज्जत नहीं। इस सबकी एक ही वजह है कि हम एक नहंी हैं। इसी लिए हम गांव-गांव घूम कर एका सम्मेलन कर रहे हैं।” मदारी कुछ प्रतिज्ञाएं भी अपने श्रोताओं से कराते थे। जैसे “हम आज से बेगार नहीं भरेंगे। अगर हमारे एक भाई का खेत साहूकार या जमींदार छीनता है तो हमारा दूसरा भाई उससे बटाई पर खेत नहीं लेगा तथा न ही नीलामी में बोली बोलेगा। साहूकार या महाजन को मुनासिब सूद से ज्यादा पैसा नहीं देंगे। सूद के बदले आनाज तो देंगे ही नहीं। काहे कि आनाज दिन-ब-दिन मंहगा होता जा रहा है और साहूकार हमसे कम पैसों में ज्यादा आनाज ले लेता है। साथ ही हमारी बहू बेटियों पर किसी ने बुरी नजर डाली तो हम उसकी आँख निकाल लेंगे।”
मदारी पासी के इस ओजपूर्ण भाषणों को सुनने के लिए अवध के किसान बाट जोहते थे कि कब मदारी बाबा उनके यहां आएंगे। और मदारी भी गांव-गांव जाकर अपने आंदोलन की जमीन तैयार कर रहे थे। यह अलग बात है कि चाहे वह कांग्रेस हो या मुस्लिम लीग किसान आंदोलन से बराबर की दूरी रखते थे। भले वे आपस में एक मंच पर आकर बात करने को तैयार रहें लेकिन मदारी पासी के आंदोलन को दबाने के लिए वे सरकार को पूर्ण सहयोग करते थे। बाबा रामचंदर के आंदोलन में पिछड़ी जाति के किसान थे लेकिन मदारी पासी ने अछूत कही जाने वाली जातियों में आत्म सम्मान का भाव पैदा किया। मदारी पासी अपनी माटी की ही उपज थे और वे कोई चतुर सुजान नेता नहीं थे लेकिन अनवरत संघर्ष से जो जज्बा पैदा होता है वह मदारी पासी में खूब था। इसके उलट बाबा रामचंदर महाराष्ट्र से भटकते हुए दक्षिण अफ्रीका गए वहां उन्होंने मजदूर आंदोलन में हिस्सा लिया और जब वहां से उन्हें देशनिकाला दे दिया गया तो भारत आकर इलाहाबाद में बस गए। वे महाराष्ट्रियन ब्राह्मण थे इसलिए न चाहते हुए भी उनके अंदर बाल गंगाधर तिलक के प्रति सम्मान का भाव था और वे कांग्रेस से उतनी दूरी नहीं रखते थे जितनी कि मदारी पासी। बाबा रामचंदर के आंदोलन का आधार वे पिछड़ी जातियां थीं जो समाज में सम्मान की लड़ाई लड़ रही थीं और उनके पास कुछ बहुत जमीनें भी थीं पर जमींदार उन पर जबरन कब्जा कर लेते थे। इन पिछड़ी जातियों की बहू बेटियों पर ठाकुर जमींदार उतनी आसानी से नजर नहीं डाल पाते थे जितनी सहजता से वे मदारी पासी के साथ जुड़ी जातियों की बहू बेटियों पर। इसलिए दोनों आंदोलनों को जोडऩा फिजूल है। मदारी पासी एक हथियारबंद लड़ाई लड़ रहे थे जिसकी तुलना आज के नक्सली आंदोलन से की जा सकती है।
कामतानाथ ने दुर्जन खेड़ा की जिस टिकुली का जिक्र किया है वह महिला गांधीवादी तेज शंकर के प्रभाव में आकर चरखा कातने लगती है और यह चरखा उसके लिए मंदिर है, आस्था का केंद्र है। उधर जब मदारी पासी उसके गांव में आते हैं तो वह उनकी हर बात पर गांठ बांध लेती है और बड़कऊ ङ्क्षसह जमींदार, रामप्रसाद कानून गो तथा अब्दुल गनी जैसे ताल्लुकेदारों द्वारा पुलिस से पिटवाए जाने के बावजूद वह अपनी आस्था से नहीं डिगती। यह था उस आंदोलन का असर जो एक तरफ तो गांधी जी शुरू कर रहे थे दूसरी तरफ मदारी पासी।
कामता जी काल कथा को चार खंडों में लिखना चाहते थे। १९९८ में जब ये दोनों खंड छप कर आए तो उन्होंने मुझसे कहा था कि देखो शंभू बाकी के दो खंड भी जल्दी ही छप जाएंगे। लेकिन वे अपनी बीमारी और व्यस्तताओं में ऐसे उलझे कि काल कथा के बाकी दो खंड लिखने के पूर्व ही क्रूर काल ने उन्हें हमसे छीन लिया।

 

औरों की औरय्या

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cropped-cropped-sns.jpgऔरय्या औरों की!
शंभूनाथ शुक्ल
कभी एनएच-2 से कानपुर जाइए। जाने को तो आप इस एनएच से इलाहाबाद, वाराणसी और कोलकाता भी पहुंच सकते हैं लेकिन यहां कानपुर ही लिखने का मेरा आशय वह दूरी जो आप दिल्ली से अपने गंतव्य तक सहजता से तय कर सकते हैं। बाकी के लिए ट्रेन ज्याद सूट करेगी। नोएडा से यमुना एक्सप्रेस वे पकड़कर सीधे आगरा के आगे एतमादपुर निकलिए आकर और उसके बाद टूंडला, फिरोजाबाद, शिकोहाबाद और इटावा क्रास कर लेते हैं तो एक सहजता की सांस ले सकते हैं। वजह यह कि आप वह दूरी पार कर गए जहां हर एक आदमी उस हाईवे को आड़ा-तिरछा इस तरह पार करता है जैसे यह सड़क उसके लिए तफरीहन बनी है और हो भी क्यों ना जब अपने नेताजी अथवा उनके बेटे की सरकार हो तो इस इलाके के लोग इस पूरे इलाके को अपनी ससुराल ही समझते हैं। इटावा के बाद इकदिल, बकेवर, अजीतमल पार करते ही आप पहुंचते हैं मुरादगंज। ये सारे कस्बे आप बाई पास के जरिए पार हो जाते हैं इसलिए अब पता नहीं चलता कि कब बाबरपुर गया और कब महेवा निकला और कब अनंतराम। खैर दिलीप नगर पहुंचते ही आप पठानों के उस राज्य में पहुंचते हैं जो एक जमाने में पैसा लेकर मर्सनरीज यानी भाड़े के टट्टू मुहैया कराता था। इसके बाद एक नहर और फिर एक बाईपास। इससे बाई पास पर नहीं चढ़ेंगे तो पहुंच जाएंगे औरय्या कस्बा जिसमें कुछ नहीं मिलेगा सिवाय वहां की नगर पालिका के गेस्ट हाउस के। यह गेस्ट हाउस एक जमाने में नगर पालिका के चेयरमैन रामजी शुक्ला बनवा गए थे। बाकी करीब एक किलोमीटर लंबे इस जिला मुख्यालय में न तो पुलिस कप्तान का दफ्तर है न कलेक्टर का। अलबत्ता डिग्री कालेज जरूर मशहूर है। बस अड्डे से अगर गुजरे तो वैसी ही तीखी दुर्गन्ध आपके नथुनों में भर जाएगी जिससे आपको महसूस होगा कि यह दुर्गन्ध दिल्ली के सारे आईएसबीटी, चेन्नई, तिरुअनंतपुरम से लेकर कोलकाता तक आम है। सुगन्ध अलग-अलग हो सकती है पर दुनिया भर में मानव की स्वाभाविक शारीरिक विकारों के उच्छिष्ट की गंध समान है।
आप छोड़ए यह कस्बा और बाईपास पर चढ़ जाएं। चूंकि जिला मुख्यालय है इसलिए पुलिस को यहां अपनी मुस्तैदी दिखानी पड़ती है लेकिन किसी भी चौराहे पर पुलिस का एक भी बंदा नहीं मिलेगा। पर हर चौराहे पर बैरियर यूं लगाए गए हैं कि आप जरा सा भी चूके तो भिड़ंत को रोका नहीं जा सकता। अब आप पहला बैरियर छोड़कर अगले बैरियर से दाएं मुड़ जाइए। बस जैसे ही आप दाएं मुड़ेंगे तत्काल कोई न कोई होमगार्ड वाला सिपाही आ जाएगा। कहां जा रहे हैं? क्यों जा रहे हैं? कहां रुकेंगे? आदि तमाम ऊलजुलूल सवाल पूछने लगेगा। अब दो ही रास्ते हैं। एक या तो आप उस सिपाही को पचास का नोट दें दे और बताएं कि बस देवकली होकर आते हैं। अथवा इसे इस तरह घूर दें कि उसे लगा कि कप्तान साहब या आईजी साहब अथवा डीआईजी के दामाद जा रहे हैं। यकीन मानिए कि अपना मुल्क दामादों के मामले में अति संवेदनशील है। फौरन बिछ जाएगा कि अरे कुंवर साहब आप पधारें। आप आगे निकलिए। चार किमी पर है खानपुर, पठानों का गांव। वहां से चुपचाप निकल जाइए हालांकि कई जोड़ी आँखें आपको घूरते नजर आएंगी पर आप आँख कतई नहीं मिलाएं। ये कोई चोर-लुटेरे नहीं हैं। ये दरअसल वे लोग हैं जो पकड़ छुड़वाते हैं और बदले में डकैत, पुलिस और पकड़ के परिवार वालों से पैसा लेते हैं। बस खानपुर से कुछ ही आगे निकलने पर आप पहुंचते हैं देवकली मंदिर। मराठों का बनवाया यह विशाल मंदिर देखकर आपकी आँखें फटी की फटी रह जाएंगी। बस कुछ दिन तक बसेरा किया था मराठों ने किया था और इतने ही दिनों में इस छावनी में इतना भव्य व आकर्षक मंदिर वे बनवा गए। मायावती द्वारा बनवाए गए प्रस्तर प्रतिमाओं से कहीं अधिक सुंदर और भव्य व रहस्यमयी। इस मंदिर का शिवलिंग इतना चौड़ा है कि आप उसे बाहों में नहीं भर सकते। पहले तो यहां बीजमंत्र भी था और तब यहां एक मराठा साधु डेरा डाले रहते थे। वे बताते थे कि मराठा सरदार अपना खजाना यहां गाड़ गए थे और उसके लिए एक बीज मंत्र भी बनवा गए थे। वह बीज मंत्र मैने 1975 में देखा था। तब इस मंदिर के पिछवाड़े एक सुरंग थी जिसका एक सिरा मंदिर के पिछवाड़े था और दूसरा सिरा जमना नदी में निकलता था। वह सुरंग तब तो थी अब शायद भर दी गई है। मुलायम सिंह जब सीएम थे तब इस मंदिर का जीर्णोद्घार उन्होंने कराया था लेकिन जिस बाबा को वे लाए वह लाल लंगोट पहने रहता था और दिन भर एक सिलबट्टे में कुछ हरा पदार्थ घोंटा करता था। उसकी आँखें सदैव लाल रहतीं और लोग बताते थे कि इसका लिंक यमुना के कगारों पर डेरा डाले दस्युओं से रहता है। मंदिर अब पहले जैसा भव्य तो नहीं रहा पर मंदिर की छत पर जाकर आप चारों ओर यमुना नदी की भयावहता और भव्यता दोनों के दर्शन कर सकते हैं। सामने दीखता है शेरगढ़ घाट जो औरय्या को जालौन से जोड़ता है। इस पुल को पार कर आप उस जगह जा सकते हैं जैसा आप कभी न्यूयार्क और कनाडा के बीच नियाग्रा प्रपात जाकर नहीं महसूस करेंगे। यह जगह है पचनदा। शायद पूरे विश्व में पचनदा जैसा सुंदर और विहंगम दृश्य आप कभी नहीं देख पाएंगे। पचनदा वह जगह है जहां चंबल, क्वारी, पहुज और यमुना नदी में परस्पर मिलती हैं। अब आप पूछेंगे कि पांचवीं नदी तो भैया अपने हिंदुस्तान में विषम अंक ही शुभ माने गए हैं सो यह पांचवी नदी है सरस्वती जिसे देखा आज तक किसी ने भी नहीं पर अपनी पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मौजूद वह सब जगह रहती है। बहरहाल पचनदा एक बुंदेले ठाकुर दिलीप सिंह की जागीर था जो पिंडारियों से लूट की लेवी लेता था। अगर आप पचनदा जाकर जीवित लौट आएं तो सौभाग्य मानिए और मानकर चलिए कि अब आपकी जिंदगी में इतने वर्ष और जुड़ गए हैं जितने कोई भी चिकित्सकीय संस्थान नहीं दे सकता।
(बाकी का कल)

 

Why not Bijnore

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पड़ोस के बिजनौर भी तो जाइए!
शंभूनाथ शुक्ल

यह एक कथा है जो किसी किताब में तो नहीं मिलती पर बिजनौर जिले का हर आदमी इस कथा को सुना देगा। किस्सा कुछ यूं है कि हस्तिनापुर में तो महाराज धृतराष्ट्र रहते थे जबकि उनके छोटे भाई नीतिनिपुण विदुर बिजनौर जिले में। विदुर हस्तिनापुर तब ही आते थे जब उनकी भाभियां महारानी गांधारी अथवा कुंती उन्हें बुलावा भेजतीं। वर्ना विदुर महाराज अपनी कुटिया छोड़कर कहीं नहीं जाते अलबत्ता महाराज धृतराष्ट्र या पांडवों के बड़े युधिष्ठिर विदुर से मिलने विदुर की कुटिया अवश्य जाते। महाराज धृतराष्ट्र जब बिजनौर जाते तो रास्ते में गंगा नदी पार करते। आधे रास्ते वे यही सोचते कि विदुर  दरअसल पांडवों के प्रति कुछ ज्यादा ही झुके हुए हैं इसीलिए वे युधिष्ठिर के हित की और दुर्योधन के खिलाफ बात ही करते हैं। वह हरदम मुझे ही दुर्योधन को दबाने को कहता है पर कभी भी पांडवों के खिलाफ कुछ नहीं बोलता। अब भला अपने बेटे को छोड़कर कोई भतीजों को राजपाट सौंपता है! पर जैसे ही महाराज धृतराष्ट्र गंगा का आधा हिस्सा पार कर लेते उन्हें भी लगता कि वे गलत कर रहे हैं। विदुर ठीक ही तो समझाता है। आखिर हस्तिनापुर का राजपाट तो छोटे भाई पांडु को ही मिला था वह तो अपना सिंहासन मुझे सौंप कर वानप्रस्थ पर चला गया था। इसलिए सिंहासन पर हक तो युधिष्ठिर का ही बनता है। विदुर मुझे ठीक ही समझाता है। महाराज विदुर से मिलते और विदुर की बातों से सहमति जताते हुए कहते कि मैं अब हस्तिनापुर जाकर युधिष्ठिर को बुलाकर उसका हक उसको दे दूंगा। पर लौटते ही वे जैसे ही फिर गंगा के इस पार आते तो उनका दिमाग कुलबुलाने लगता कि नहीं यह गलत होगा। अगर वे नेत्रहीन नहीं होते तो हस्तिनापुर का सिंहासन उन्हें ही मिलता। अब नेत्रहीन पैदा होने में उनकी क्या गलती? यह अन्याय तो विधाता ने उनके साथ किया है। वाकई दुर्योधन ठीक ही कहता है कि सिंहासन पर हक हम कौरवों का पहले पांडवों का नहीं। दुर्योधन ठीक कहता है कि पांडु पुत्रों को सुई की नोक बराबर जमीन नहीं देनी चाहिए। और वे बुझे मन से हस्तिनापुर लौट आते।

यह एक कथा भर है। पर मेरी मानिए तो कभी बिजनौर अवश्य जाएं। छोटा सा गंगा पार का कस्बा। मेरठ और मुजफ्फर नगर की तुलना में एकदम शांत। हालांकि यहां भी उन्हीं जातियों का वर्चस्व है जिनका मेरठ और मुजफ्फर नगर में है लेकिन इसके उलट न तो यहां चोरी न डकैती न लूट न बलात्कार न दंगा न फसाद। यद्यपि अब सपा सरकार में हालात उतने शांत इस जिले में भी नहीं रह गए हैं किन्तु ये सारे बदमाश यहां बाहर से आ जाते हैं। वर्ना जब मेरठ और मुजफ्फर नगर जल रहा था तो भी यहां शांति थी और मुजफ्फर नगर के जो लोग राहत शिविरों में नहीं जा पाए वे यहां आकर बस गए थे। मेरठ से मवाना, बहसूमा होते हुए आप घनी अमराइयों के बीच से गुजरते ही रामराज पहुंचते हैं तो पाते हैं कि आधा कस्बा तो मेरठ पुलिस के अंतर्गत है और आधा मुजफ्फर नगर पुलिस के तहत। मुजफ्फर नगर जिला पुलिस का थाना भी रामराज में है तो गुरद्वारे के समीप बनी हुुई पुलिस चौकी मेरठ जिले के बहसूमा थाने की है। रामराज में हिंदू व्यापारी हैं, मुस्लिम कारीगर हैं और सिख किसान। गुरद्वारा, मंदिर और मस्जिद भी। रामराज से मीरापुर के बीच कुल छह किमी की दूरी है। पठानों और रांगड़ मुसलमानों की खूब तादाद है मीरापुर में। यहां आपको तोमर, चौहान और त्यागी मुसलमान मिल जाएंगे और राजस्थान से बनिज हेतु आए माहेश्वरी सेठ। यहां के रांगड़ मुसलमानों के  परिवारों में आधी रस्में वही हैं जो उनके हिंदू जात भाइयों के यहां हैं। मीरापुर कस्बे को पार कर एक किमी पर एक तिराहा है जिस से आप दाएं मुड़ जाएं। यहां रुककर आप कुछ खा-पी सकते हैं। भोजन भी और अल्पाहार भी। सबसे खास बात यह है कि यहां आप निपट भी सकते हैं। यहां पर जो दो ढाबे बने हैं उनमें से एक तो एसी है और दूसरा एसी न होते हुए भी साफ सुथरा है। कुछ दूर जाने पर आप सड़क की ही दिशा में बाएं मुड़ जाएंगे और गंगा बैराज पर पहुंच जाएंगे जहां से बिजनौर जिला शुरू होता है। गंगा बैराज तक की सड़क सकरी है और एक्सीडेंट प्रोन हैै। साथ ही यहां रोडवेज की बसों से अपनी गाड़ी बचानी भी होगी। क्योंकि अन्य प्रांतों की तरह भी यूपी रोडवेज की बसें सड़क को अपनी दासी समझती हैं। बिजनौर में गंगा बैराज पार करते ही एक टोल टैक्स पड़ेगा जो लीगल और अनलीगल के बीच का है। आप गाड़ी निकाल लें और उसे कस कर घूर दें तो वह खुद भाग जाएगा अन्यथा एक डांट पिला दें। यहां रुककर आप मीठे तरबूज, मतीरे खरीद सकते हैं। अब आप बिजनौर में हैं। कस्बा यहां से कुल 11 किमी है। पर कस्बा पहुंचने तक आपको जिन घने वृक्षों की छाया के बीच निकलना पड़ता है उससे ऐसा लगता है कि यूपी में कहीं अगर स्वर्ग है तो इसी क्षेत्र में। अब आप मुस्कराइए कि आप बिजनौर में हैं। कस्बा कुल मिलाकर दो या तीन किलोमीटर लंबा और आधा किमी चौड़ा होगाा। कस्बे में मुसलमानों और हिंदुओं की व्यापारी जाति की संख्या करीब-करीब बराबर है। पर तनाव दूर-दूर तक नहीं। आधी रात को भी निकल जाएं कहीं कोई घटना-दुर्घटना नहीं। आप बिजनौर से धामपुर, शेरकोट और अफजलगढ़ होते हुए कालागढ़ जा सकते हैं। मालूम हो कि कालागढ़ अपने बांधों के लिए तो जाना ही जाता है और यहां एक सैडिलर डैम भी है जो एशिया का सबसे पुराना डैम है। कालागढ़ मशहूर टाइगर रिजर्ब जिम कार्बेट का एक गेट भी है। आप अफजलगढ़ से यूपी के टाइगर रिजर्ब अमानगढ़ जा सकते हैं और अफजलगढ़ की द्वारिकेश चीनी मिल के गेस्ट हाउस में रुक सकते हैं। द्वारिकेश चीनी मिल राजस्थान के उद्यमियों की है इसलिए यहां की मेहमाननवाजी में आपको राजस्थानी लुक भी मिलेगा। बिजनौर खुद में हिंदी पत्रकारिता का गढ़ भी है। आजादी के पहले से यहां दैनिक प्रकाशित होने शुरू हो गए थे। आज यहां पर मेरठ और दिल्ली से छपने वाले सारे अखबार पहुंचते हैं। अमर उजाला यहां नंबर वन पर है। अमर उजाला के यहां के ब्यूरो चीफ श्री अशोक मधुप अच्छे कवि भी हैं। बिजनौर से आप नजीबाबाद होते हुए कोटद्वार, दुगड्डा लैंसडाउन भी जा सकते हैं। नजीबुल्लाह नामके एक पठान सरदार द्वारा बसाया गया बिजनौर जिले का सबसे बड़ा कस्बा है। नजीबुल्लाह के किले के अवशेष अभी भी हैं। यूं नजीबाबाद आकाशवाणी का एक केंद्र भी है और बहुत पुराना केंद्र है। अमृतसर-हावड़ा रेल लाइन का यह एक मशहूर जंक्शन है। दिल्ली वाले यूपी में एक तो घूमने जाते नहीं और जाएंगे तो बस मथुरा, आगरा या बनारस जाएंगे पर कभी घर से निकलिए और बिजनौर आइए। तब पता चलेगा कि आप घूम तो चारों तरफ आए पर अपना ही घर नहीं देखा। बस दिल्ली से कुल ढाई घंटे की दूरी पर है बिजनौर। यहां से आप ला सकते हैं आम की एक से एक बेहतरीन किस्में और आर्गेनिक गुड़ और पीली सरसों का तेल। यकीन मानिए कि जिन चीजों के लिए आप बड़े-बड़े डिपार्टमेंटल स्टोरों के चक्कर काटते हैं और बाबा जी का ठुल्लू लेकर वापस आ जाते हैं वे सब चीजें अपने मूल रूप में बिजनौर में मौजूद हैं।