कहां गए वे जिला गजेटियर

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अंग्रेज कलेक्टर जब तक रहे वे किसी जिले को जानने के लिए उसका पूरा गजेटियर तैयार करवाते। उसका इतिहास, भूगोल से लेकर उस जिले की पूरी आबादी मय जातियों और धर्मों के वर्णन होता। वहां के उद्योग और बनिज का भी ब्योरा रहता। लेकिन आजादी के बाद हिंदुस्तानी कलेक्टरों ने जिला गजेटियर को पूर्व की भांति कभी नहीं तैयार करवाया। अब वे सिर्फ खानपूरी के लिए बनाए जाते हैं। जिसमें जिला कलेक्टर की कुछ कागजी योजनाओं और भू राजस्व के वे रिकार्ड होते हैं जिन्हें एक भ्रष्ट व्यवस्था तैयार करती है। लेखपाल, कानूनगो, नायब तहसीलदार, तहसीलदार, डिप्टी कलेक्टर से होता हुआ यह रिकार्ड तथाकथित जिला मजिस्ट्रेट कहे जाने वाले कलेक्टर तक पहुंचता है। वह जब तक इसे समझता है मुख्यमंत्री उसके तबादले का आदेश भेज देता है। एक कलेक्टर को पूरे जिले की दौलत एकत्र कर इसका सफेद हिस्सा तो जिला खजाने में जमा कराना पड़ता है और काला हिस्सा सीधे मुख्यमंत्री आवास में। तब उसे कहां फुरसत है जिला गजेटियर बनवाने में। लेकिन अंग्रेजों द्वारा बनवाए गए जिला गजेटियर हर जिले में यथावत रखे हुए हैं। संयोग है कि जहां-जहां मैं रहा मैने सारे गजेटियर मंगवा लिए और उनकी कॉपी करवा ली। इसका फायदा यह हुआ कि हर छोटे-बड़े जिले की जानकारी मुझे मिल गई। और यह जानकारी पूरे जिले की सामुदायिक और सांप्रदायिक गणना का सटीक आकलन है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर रह चुके डॉ रमाप्रसाद त्रिपाठी ने जनपदीय इतिहास लेखन की परंपरा शुरू कराई थी और यह एक बहुत बड़ा काम था क्योंकि अंग्रेजों ने अपने गजेटियर में 1857 के स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लेने वाले हिंदुस्तानियों का वर्णन बहुत गंदे तरीके से किया है, पर जनपदीय इतिहास लेखन के जरिए इसे बहुत हद तक सुधारा गया था। कानपुर का इतिहास लिखने में प्रसिद्घ कांग्रेसी नेता नारायण प्रसाद अरोड़ा, लक्ष्मीकांत त्रिपाठी और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव रह चुके नरेशचंद्र चतुर्वेदी ने बड़ा काम किया। मगर देखिए कि कांग्रेसी राज को हटाकर बनी समाजवादियों, लोहियावादियों और संघियों की सरकारें गाना तो प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति के उत्थान का गाती रहीं पर जनपदीय इतिहास लेखन की इस पहल को उन्होंने रद्दी के टोकरे में डाल दिया क्योंकि इस पहल को शुरू करने वाले कांग्रेसी थे।

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यह वह जमाना था जब पत्रकारिता ब्राह्मणों और कायस्थों के लिए रिजर्ब थी बाकी में से कुछ ठाकुर थे और कुछ बनिये, कुछ मुसलमान भी थे लेकिन तब तक उत्तर प्रदेश में मध्यवर्ती जातियों या दलित जातियों का पत्रकारिता में प्रवेश नहीं हुआ था। । मेरा मानना था कि अगर किसी विधा को फलने-फूलने देना है तो उसमें वैविध्यता लानी ही पड़ेगी। पर सोचने से तो कुछ होता नहीं जबकि उसके लिए अवसर नहीं मिले। संयोग से साल 1986 में जनसत्ता ने एक राज्य डेस्क बनाई और मुझे एडिट पेज से उतार कर वहां प्रभारी बनाकर भेज दिया गया। मेरे साथ आठ लोगों की डेस्क थी। जिसमें आज की पत्रकारिता के सारे धूमकेतु मौजूद थे। प्रदीप पंडित, सुनील शाह, अजय शर्मा, संजय सिन्हा, संजय कुमार सिंह, अरिहन जैन और अमरेंद्र राय। इनके अलावा अन्य प्रशिक्षु लड़कियां जिन्हें संजय सिन्हा अपने आईआईएमसी से ले आते थे। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान व मध्यप्रदेश में कहीं भी स्ट्रिंगंर रखने की पूरी आजादी। अब इसमें दो पेच थे। एक मध्य प्रदेश संपादक श्री प्रभाष जोशी का गृह राज्य था और भोपाल के जनसत्ता संवाददाता महेश पांडे से तकरार अक्सर लेनी पड़ती थी। वे हद दर्जे के नकचढ़े और हर मामले में प्रभाष जी तक पहुंच जाने की धमकी दिया करते। राजस्थान में हरिशंकर व्यास का दखल रहता लेकिन यूपी व बिहार में कोई दखल नहीं। न लखनऊ से हेमंत शर्मा कोई दखल करते न पटना से साधु पत्रकार सुरेंद्र किशोर। सो मैने एक काम किया जिस किसी भी स्थान से किसी मध्यवर्ती जाति के अभ्यर्थी अथवा दलित जाति के अभ्यर्थी या मुस्लिम ने आवेदन किया वहां पर मैने कम नंबर पर भी उसे तरजीह दी। इस तरह इटावा में राजेंद्र यादव, झांसी में मूलचंद्र यादव, गया में शिवशंकर प्रसाद या बहराइच में जगदंबा प्रसाद का चयन हो गया। बुलंदशहर में सलीम सुल्तान को रखे जाने से एक न्यूज एडिटर बहुत खफा हो गए और जब मैं उस पद से हटा तो एक दिन सलीम भाई के  मैनेजर कामेश्वर झा एक खत लेकर मेरे पास आए और बोले यह न्यूज एडिटर साहब को देना है। मैने कहा क्या है तो वे बोले- पढ़ लीजिए। खत में सलीम भाई ने लिखा था- जनाब न्यूज एडिटर साहब या लेव आपनु लकुटि कमरिया बहुतै नाच नचावै। साथ में जनसत्ता का परिचय पत्र और टेलीग्राफिक अथारिटी भी संलग्न थे। कहना नहीं होगा कि जब वे न्यूज एडिटर साहब विदा हुए तो सबसे पहले मैने जो काम यिा वह  सलीम सुल्तान की बहाली थी।  ये सब जबर्दस्त लिक्खाड़ थे और एक हद तक मुलायम सिंह के प्रति कुछ पक्षपाती भी। लेकिन उस समय उनकी यह सापेक्षता बुरी नहीं लगती थी क्योंकि एक तो वे ऐसा अगर अपने जातीय उत्थान के लिए कर भी रहे थे तो गलत कुछ नहीं था। ऋषिकेश में डालचंद्र छांछर को रखा जो पत्रकारिता के साथ-साथ सुअर भी पालते थे। उनका कहना था कि वह मेरा पुश्तैनी धंधा है। इन सारे संवाददाताओं में मूलचंद्र यादव प्रताप की परंपरा वाले पत्रकार थे। उनकी लेखनी में इतना एग्रेसन था कि झांसी के तमाम सवर्ण नेताओं ने उसे हटवाने के लिए अभियान ही चला दिया। पर मेरे साथ उनकी दाल नहीं गली तो आलोक तोमर तक गए। एकाध बार आलोक तोमर ने मुझसे कहा भी पर मैने हटाने से मना कर दिया। अब बेचारे करें तो क्या करें सो एक दिन  वहां के एक सांसद जो जाति से ठाकुर थे, सीधे संपादक प्रभाष जोशी तक पहुंच गए। प्रभाष जी ने मुझे बुलाया और कहा कि देखो सुकल जी ये आपके मूलचंद्र यादव के बारे में क्या कह रहे हैं? मैने कहा कि भाई साहब मगर मूलचंद्र यादव तो इन सांसद महोदय के बारे में भी बहुत कुछ कह रहे हैं। प्रभाष जी ने पूरा किस्सा सुना और बोले- सांसद को ब्लैक आउट कर दो।

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