मदरसों में छिपा है भारतीय ज्ञान-विज्ञान का रहस्य

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मदरसों में छिपा है भारतीय ज्ञान-विज्ञान का रहस्य शंभूनाथ शुक्ल भारत के प्राचीन इतिहास को जानना कोई गलत बात नहीं है। अगर मौजूदा सरकार के नुमाइंदे ऐसा प्रयास कर रहे हैं तो सराहनीय है। मगर प्रॉब्लम यह है कि इनके आईसीएचआर के कर्णधार जिस मिथ को इतिहास साबित करने पर तुले हैं उसमें गल्प अधिक है प्रामाणिकता कम। अगर श्रीमान वाई सुदर्शन राव गल्प को इतिहास का दर्जा देने की बजाय अरबी-फारसी के लुप्तप्राय ग्रन्थों से भारतीय प्राचीन इतिहास की प्रामाणिकता को नापने का प्रयास करें तो वाकई एक क्रांतिकारी कदम होगा। ऐसा मैं कोई सेकुलरिज्म के प्रति आग्रही होने के कारण नहीं कह रहा बल्कि सत्य यही है। दरअसल अलाउद्दीन खिलजी से लेकर अकबर के काल तक भारत की सातवीं से बारहवीं शताब्दी तक का सारा श्रुति व लिखित साहित्य अरबी व फारसी में अनुवादित हो चुका था। मगर वह साहित्य अब करीने से उपलब्ध नहीं है। अगर उसी साहित्य को फिर से पढ़ा जाए तो काफी कुछ चीजें मिल जाएंगी। अल बरूनी के पहले भी कई अरब भारत आए और यहां का काफी साहित्य का उन्होंने अरबी में उल्था किया। अब अगर उसे तलाशा जाए तो बेहतर रहे। यहां के मुसलमान जो अरबी पढ़ते हैं वे या तो धार्मिक चीजें पढऩा पसंद करते हैं अथवा आधुनिक अरबी साहित्य। बहुत कम लोग हैं जो अरबी में लिखी गई विश्व इतिहास आदि की पुस्तकें पढ़ते हैं। अगर हिंदू गंभीरता पूर्वक अरबी को पढ़ें तो वे प्राचीन हिंदू धर्म और प्राचीन हिंदुस्तान के ज्ञान- विज्ञान की खोज सकारात्मक तरीके से कर सकते हैं। प्राचीन भारत की खोज में लगे लोग मिथ को यूं समझने की कोशिश करें- 1 सबसे पहले जो आर्य भारत आए वे भी दरअसल लुटेरे ही थे और अश्वमेधी घोड़ा छोड़कर उसी तरह राज्य व संपत्ति तथा लोगों को लूटते थे जैसे कि बाद में आए शक-हूण-आभीर व तुर्क लुटेरे। 2 इसके बाद इस बर्बर सभ्यता का नाश हुआ और महाभारत काल से लेकर बुद्घ तक आते-आते दासप्रथा लगभग समाप्त हो गई। 3 इसके बाद सामंतकाल आया और बड़े-बड़े भारतीय साम्राज्य बने। पहला ज्ञात साम्राज्य नंद का था और आखिरी हर्ष का। 4 इसके बाद मुस्लिम व विदेशी साम्राज्य बने। जो मुहम्मद गोरी से लेकर अकबर तक चले। 5 अकबर से लेकर औरंगजेब तक ये विदेशी साम्राज्य उसी तरह हिंदू साम्राज्य हो गए जैसे कि राजपुताने व बुंदेलखंड के सामंत। 6 औरंगजेब के बाद भारतीय जातीय साम्राज्य बने। जैसे मराठा, पंजाबी आदि। 7 फिर आया औपनिवेशिक शासन। सत्य तो यह है कि औपनिवेशिक शासन के दौरान यूरोपीय लोगों ने भारतीय व एशियाई ज्ञान-विज्ञान का भारत में समूल नाश कर दिया। इसिलए अगर वाकई इतिहास अनुसंधान परिषद की भारतीय ज्ञान-विज्ञान को जानने की रुचि है तो इसमें अरबी-फारसी तथा इस्लामी मदरसे मददगार हो सकते हैं।

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Deoband Kavisammelan

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मुझे लगता है कि इन तनातनी के दिनों में यह लेख जरूर साया किया जाए। इसे पढ़कर आप वेस्टर्न यूपी की सांप्रदायिक मानसिकता को अच्छी तरह समझ सकते हैं- 
“बात 1995 की है। उस समय मेरठ के कमिश्नर श्री हरभजन लाल विरदी साहब हुआ करते थे। बहन मायावती का राज था और विरदी साहब मान्यवर कांशीराम जी के निकट के रिश्तेदार थे और यूपी की ब्यूरोक्रेसी में एक ईमानदार और सज्जन तथा धर्मभीरु स्वभाव के अफसर। देवबंद नगरपालिका हर साल एक मुशायरा व कवि सम्मेलन का आयोजन करती थी। विरदी साहब ने मुझे कहा कि आप कवि सम्मेलन की बागडोर संभालो और कवियों को बुला लो। मेरे लिए यह बड़ी चुनौती थी। मैं मंचीय कवियों के नखरों से अनजान था। फिर भी अपने कुछ मित्रों से बातचीत कर मंच के लिए उपयुक्त कवियों को बुलवाया। मुझे खुशी है कि पद्म भूषण गोपालदास नीरज तो मेरे सामान्य अनुरोध पर ही आ गए और श्री सोम ठाकुर भी। इस कवि सम्मेलन में राजस्थान की व्यास नाम की एक कवयित्री भी थीं। उन्होंने पिछले दिन मुशायरे में भी शिरकत की थी और उनकी कविताएं खूब सराही गई थीं। खैर निर्धारित समय पर मैं देवबंद पहुंचा। हमारी व्यवस्था देवबंद की चीनी मिल के गेस्ट हाउस में थी। वहां मच्छरों की भरमार थी। इसलिए वहां बैठना तक मुश्किल। उसी समय वहां के एक नगरसेठ के युवराज पधारे। और कवियों से आग्रह किया कि उनके घर चलकर जलपान कर लें। सब राजी हो गए। वे बहुत इसरार कर के उन कवयित्री व्यास को भी ले गए। बीच शहर में उनका महल जैसा घर। कवियों की व्यवस्था उन्होंने भव्य की थी। उस जमाने में कई बोतलें प्रीमियम व्हिस्की की तथा स्टार्टर। कवि गण टूट पड़े। मगर वे कवयित्री चुपचाप बैठी रहीं और उन्होंने कह दिया कि वे शराब नहीं पीतीं। यह बात उन सेठपुत्र को नागवार लगी और बोले- यह कैसे हो सकता है आप कल उन मुल्लों के बीच तो पी रही थीं। उन्होंने कहा कि नहीं उन मुल्लों ने मेरे साथ बहुत ही बेहतर सलूक किया था। किसी ने मुझे न तो शराब पीने को कहा और न ही मांसाहार को। पर वे सेठपुत्र मानें ही नहीं। मैने कहा कि क्यों आप उन भद्र महिला के पीछे पड़े हैं? उनकी जो इच्छा हो खायें-पियें। पर वे और बदतमीजी पर उतारू। अंत में मैने धमकी दी कि देखिए यह कवि सम्मेलन मेरा है। अगर किसी ने भी इन कवयित्री से बदतमीजी की तो मैं रिपोर्ट लिखाऊँगा। मैं अभी सहारनपुर के एसएसपी श्री जवाहर लाल त्रिपाठी और डीएम श्री हरभजन सिंह से बात करता हूं। मेरी धमकी काम कर गई और तत्काल एक कार द्वारा हमें कवि सम्मेलन स्थल में भेज दिया गया। रास्ते में उन कवयित्री ने मुझे धन्यवाद देते हुए कहा- शुक्ला जी ऐसे जाहिल लोग हैं ये हिंदी वाले हिंदू। कल मुझे मुशायरे वालों ने कितनी अधिक इज्जत दी और पूरे समय मुझे बेटी-बेटी कहते रहे। लेकिन हिंदी वालों के यहां तो किसी महिला का मंच पर आकर कविता पढऩा एक निकृष्ट पेशा समझा जाता है। मुशायरे और कवि सम्मेलन में यह फर्क साफ देखा जा सकता है। जहां मुशायरे में आज भी साहित्य की गरिमा रहती है वहीं हिंदी कवि सम्मेलन में एक तरह की लूट खसोट। दोनों के बीच शायद इस फर्क की वजह यह भी है कि हिंदी शुरू से ही हिंदुओं की सवर्ण कही जाने वाली जातियों के हाथ में आ गई इसलिए इसमें जातीय नफरत भी फैली और विधर्मियों के प्रति विद्वेष भी। शायद इसीलिए हिंदी हिंदुस्तान में हिंदू हो गई।“

घर जैसा लगता है अपना यूके!

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घर जैसा लगता है अपना यूके!

शंभूनाथ शुक्ल

उत्तराखंड तो लगता है अपना दूसरा घर बन गया है। गाजियाबाद स्थित अपने घर से हम दोपहर एक बजे निकले। हम यानी कि मित्र सुभाष बंसल उनके पुत्र राहुल बंसल और सार्थक बंसल। सुरेंद्र बिष्ट तथा राजेश झा। रास्ते भर हमारी फोर्ड एंडीवर गाड़ी बिष्ट जी ने चलाई। एक जमाने में बिष्ट जी ब्रिटिश हाई कमीशन में हाई कमिश्नर की गाड़ी चलाते थे। दिल्ली से निकलते ही पहला पड़ाव हरिद्वार रखा गया। वहां पर स्वामी सत्यमित्रानंद के भारत माता आश्रम, गीता आश्रम और माता आनंदमयी आश्रम में रुकने की व्यवस्था तो थी ही मित्र सुनीति मिश्र ने अपने होटल भज गोविंदम में भी इंतजाम कर रखा था। मगर रुकना कहीं संभव नहीं हो सका और सीधे ऋषिकेश होते हुए पहाड़ पर चढ़ गए। वहां नरेंद्र नगर का महाराजा पैलेस भी छोड़ा और आगराखाल, फकोट होते हुए सीधे नागनी जाकर रुके। वहां एक रेस्त्रां में चाय पी। शाम ढलने लगी थी इसलिए आम पहाडिय़ों की तरह यह रेस्त्रां भी बंद हो रहा था पर मुझे देखकर उसने तत्काल चाय बनाई और गरम चाय पीकर चले तो चंबा चढ़कर कंडीसोड पहुंचे। इसके पूर्व जैसे ही कमान्द पार किया कि एक तेंदुआ बीच रास्ते में आ गया। उसकी फोटो लेने की तमन्ना थी मगर वह भाग निकला। फिर चिन्यालीसोड आया। तब तक रात के 11 बज चुके थे। इसके बाद शुरू हुआ धरासू के धसकते पहाड़ों का सिलसिला। रात को थक भी चुके थे सो एक बार सोचा कि ऊपर चढ़कर वन विभाग के रेस्ट हाउस में रुका जाए पर लगा कि सीधे उत्तरकाशी ही ठीक रहेगा। चल पड़े अचानक बीच सड़क पर एक औरत लालटेन लिए प्रकट हुई। थोड़ा अजीब लगा। आधी रात को यह कैसा दृश्य! पर वह औरत जिस तरह प्रकट हुई उसी तरह विलुप्त हो गई। फिर आया डुण्डा। एवरेस्ट विजेता बछेन्द्री पाल का गांव। यहां तिब्बती बसे हैं। इसके बाद मातली और फिर सीधे उत्तरकाशी रात 12 बजे पहुंचे। वहां हमारे पंडित जी श्री जितेंद्र सैमवाल मिले और हम चल पड़े वहां से आठ किमी दूर नैताला की तरफ जहां पर हमारे रुकने की व्यवस्था थी। गंगोत्री जाते समय उत्तरकाशी रुकना ही पड़ता है। मगर मुझे लगता है कि बजाय उत्तरकाशी रुकने के नैताला रुका जाए। वहां पर शुरू में ही गुजरात गेस्ट हाउस है। शांत और सुंदर। भोजन भी लाजवाब और रुकने की व्यवस्था उत्तम। किसी भी स्टार होटल से कम नहीं पर टैरिफ निम्र मध्यवित्त वर्ग के सैलानियों की हैसियत के भीतर। नीचे बहती गंगा और ऊपर चौरस जगह पर नैताला एक छोटा-सा सुंदर गांव। नीचे गंगा तट पर शिवानंद योग केंद्र भी है तथा अन्य तमाम आश्रम भी। मगर मैं गुजरात गेस्ट हाउस में ही रुकना पसंद करता हूं। फिर वहां रुककर आप गंगोत्री अथवा हर्षिल के लिए निकल सकते हैं। वाया मनेरी, भटवारी, गंगनानी व सुक्की टॉप होते हुए सीधे हर्षिल। शांत और सुंदर आर्मी बेस कैंप तथा तिब्बती जाड़ा लोगों का गांव। यहां पर विल्सन ने सेबों के बाग लगाए थे। विल्सन नामक यह अंग्रेज एक फौजी भगोड़ा था जो मेरठ छावनी में एक मर्डर कर अंग्रेज पुलिस की नजर से बच कर भागा या हो सकता है कि अंग्रेज पुलिस ने उसे भगा दिया हो। यहां टिहरी नरेश ने उसे शरण दी बदले में विल्सन ने टिहरी नरेश के जंगलों को काट-काट कर लकड़ी विलायत भिजवाया करता और वहां से जो रेवेन्यू आता वह राजा को देता। विल्सन ने ही गंगोत्री से कलकत्ता तक गंगा का परिवहन रूट तय किया और हाथियों को लकड़ी निकालने के काम में लगाकर उनका व्यावसायिक इस्तेमाल करना टिहरी के राजा को सिखाया। इसीलिए लोग विल्सन को राजा कहने लगे थे। यह हर्षिल गांव ऊपर बसे भारत के अंतिम गांव मुकबा का ही रकबा है। मुकबा में गंगोत्री के पुरोहित सैमवाल लोग आबाद हैं और वे हर साल दीवाली में गंगोत्री से गंगा का कलेवर यहां मुकबा ले आते हैं। मुकबा में रात काटना बहुत मुश्किल होता है। सांय-सांय करते बर्फीले तूफान चलते हैं जिनसे बदन पलट जाने का खतरा बना रहता है और हिम तेंदुआ कभी भी आपको दबोच सकता है। मगर मैं 31 दिसंबर को मुकबा पहुंच ही गया पर पिछले साल के विपरीत इस साल मैं हर्षिल में आर्मी के गेस्ट हाउस तिरपानी काटेज में रुका। वहां हर तरह की सुविधा थी। अटैच्ड बाथरूम, उम्दा भोजन और पेय तथा टीवी व निर्बाध बिजली। मगर एक गड़बड़ हो गई। रात को मैं गीजर की टोटी खोलना भूल गया और सुबह उठा तो गीजर को जोडऩे वाली पाइप लाइन जाम हो चुकी थी। और मैं नहाने के लिए सिर पर शैंपू लगा चुका था। अब न तो बटमैन से गरम पानी मंगाया जा सकता था न तौलिया से बदन पोंछ कर बाहर आया जा सकता था इसीलिए उस माइनस पांच में गंगा जल के शीतल जल से ही स्नान करना पड़ा।