Deoband Kavisammelan

Standard

मुझे लगता है कि इन तनातनी के दिनों में यह लेख जरूर साया किया जाए। इसे पढ़कर आप वेस्टर्न यूपी की सांप्रदायिक मानसिकता को अच्छी तरह समझ सकते हैं- 
“बात 1995 की है। उस समय मेरठ के कमिश्नर श्री हरभजन लाल विरदी साहब हुआ करते थे। बहन मायावती का राज था और विरदी साहब मान्यवर कांशीराम जी के निकट के रिश्तेदार थे और यूपी की ब्यूरोक्रेसी में एक ईमानदार और सज्जन तथा धर्मभीरु स्वभाव के अफसर। देवबंद नगरपालिका हर साल एक मुशायरा व कवि सम्मेलन का आयोजन करती थी। विरदी साहब ने मुझे कहा कि आप कवि सम्मेलन की बागडोर संभालो और कवियों को बुला लो। मेरे लिए यह बड़ी चुनौती थी। मैं मंचीय कवियों के नखरों से अनजान था। फिर भी अपने कुछ मित्रों से बातचीत कर मंच के लिए उपयुक्त कवियों को बुलवाया। मुझे खुशी है कि पद्म भूषण गोपालदास नीरज तो मेरे सामान्य अनुरोध पर ही आ गए और श्री सोम ठाकुर भी। इस कवि सम्मेलन में राजस्थान की व्यास नाम की एक कवयित्री भी थीं। उन्होंने पिछले दिन मुशायरे में भी शिरकत की थी और उनकी कविताएं खूब सराही गई थीं। खैर निर्धारित समय पर मैं देवबंद पहुंचा। हमारी व्यवस्था देवबंद की चीनी मिल के गेस्ट हाउस में थी। वहां मच्छरों की भरमार थी। इसलिए वहां बैठना तक मुश्किल। उसी समय वहां के एक नगरसेठ के युवराज पधारे। और कवियों से आग्रह किया कि उनके घर चलकर जलपान कर लें। सब राजी हो गए। वे बहुत इसरार कर के उन कवयित्री व्यास को भी ले गए। बीच शहर में उनका महल जैसा घर। कवियों की व्यवस्था उन्होंने भव्य की थी। उस जमाने में कई बोतलें प्रीमियम व्हिस्की की तथा स्टार्टर। कवि गण टूट पड़े। मगर वे कवयित्री चुपचाप बैठी रहीं और उन्होंने कह दिया कि वे शराब नहीं पीतीं। यह बात उन सेठपुत्र को नागवार लगी और बोले- यह कैसे हो सकता है आप कल उन मुल्लों के बीच तो पी रही थीं। उन्होंने कहा कि नहीं उन मुल्लों ने मेरे साथ बहुत ही बेहतर सलूक किया था। किसी ने मुझे न तो शराब पीने को कहा और न ही मांसाहार को। पर वे सेठपुत्र मानें ही नहीं। मैने कहा कि क्यों आप उन भद्र महिला के पीछे पड़े हैं? उनकी जो इच्छा हो खायें-पियें। पर वे और बदतमीजी पर उतारू। अंत में मैने धमकी दी कि देखिए यह कवि सम्मेलन मेरा है। अगर किसी ने भी इन कवयित्री से बदतमीजी की तो मैं रिपोर्ट लिखाऊँगा। मैं अभी सहारनपुर के एसएसपी श्री जवाहर लाल त्रिपाठी और डीएम श्री हरभजन सिंह से बात करता हूं। मेरी धमकी काम कर गई और तत्काल एक कार द्वारा हमें कवि सम्मेलन स्थल में भेज दिया गया। रास्ते में उन कवयित्री ने मुझे धन्यवाद देते हुए कहा- शुक्ला जी ऐसे जाहिल लोग हैं ये हिंदी वाले हिंदू। कल मुझे मुशायरे वालों ने कितनी अधिक इज्जत दी और पूरे समय मुझे बेटी-बेटी कहते रहे। लेकिन हिंदी वालों के यहां तो किसी महिला का मंच पर आकर कविता पढऩा एक निकृष्ट पेशा समझा जाता है। मुशायरे और कवि सम्मेलन में यह फर्क साफ देखा जा सकता है। जहां मुशायरे में आज भी साहित्य की गरिमा रहती है वहीं हिंदी कवि सम्मेलन में एक तरह की लूट खसोट। दोनों के बीच शायद इस फर्क की वजह यह भी है कि हिंदी शुरू से ही हिंदुओं की सवर्ण कही जाने वाली जातियों के हाथ में आ गई इसलिए इसमें जातीय नफरत भी फैली और विधर्मियों के प्रति विद्वेष भी। शायद इसीलिए हिंदी हिंदुस्तान में हिंदू हो गई।“

Advertisements

Comment

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s