रसोई में है स्वस्थ रहने का नुस्खा!

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मानव सभ्यता का बड़ा लंबा इतिहास है। आदिम जांगल युग से लेकर बर्बर दासप्रथा का युग और फिर यह मौजूदा युुग। एक-एक युग हजारों साल चला। आदमी ने इंसानियत के क्रमश: नए-नए सिद्घांत बनाए और उन पर अमल भी शुरू किया। पर बर्बर सामंती युग में ही धर्मों का प्रादुर्भाव हुआ और टाटम युग के अंधविश्वासों की जगह सुगठित और संगठित धर्मों ने मानव को बाट दिया। राजनीति की शुरुआत भी यहीं से हुई पर इस बीच मनुष्य समाज अपने साथ कुछ परंपराए अनुभव से लाया और वह थी कृषि कला और आयुर्वेद। अनुभवों पर आधारित आयुर्वेद में कुछ तो एकदम सटीक बैठते हैं बशर्ते आप उनका पालन करें। यथा प्राचीन चिकित्सा पद्घतियां चाहे वे यूनानी तिब्बिया हों या भारतीय आयुर्वेदिक पद्घति अथवा चीनी एक्यूप्रेशर सब में पेट को सारी बीमारियों का जड़ माना गया है। स्वस्थ रहना है तो पेट के धर्म का पालन करो यानी खान-पान-अनुपान। पर धीरे-धीरे ये चिकित्सा पद्घतियां विलुप्त होती जा रही हैं। आधुनिक एलोपैथी ने जिस तरह की लालची चिकित्सा पद्घति को जन्म दिया है उसमें मानवीय मूल्यों वाली सभ्य चिकित्सा पद्घतियां समाप्त होती जा रही हैं। हम अपनी किचेन को भूल गए हैं जहां हर तरह का इलाज मौजूद है। हर मसाला और हर खाद्यान्न अपने साथ भेषज गुणों की खान है। लेकिन इन्हें याद रखना जरूरी है। आजकल कुछ नीम हकीम लोग फेसबुक पर प्रचारित करते रहते हैं कि डायबिटीज से लेकर हृदय रोग तक सबका रामबाण इलाज लहशुन है या अदरक अथवा अन्य कोई। लेकिन ऐसा नहीं है। प्राचीन मान्यताओं में घाघ की कुछ औषधीय कहावतों पर नजर डालनी चाहिए-
चैते गुड़ बैसाखे तेल, जेठ को पंथ असाढ़ को बेल।
सावन सुकसा न भादों दही, क्वार करेला न कातिक मही॥
अगहन जीरा न पूष धना, माघ मा मिसरी न फागुन चना॥
(घाघ ने इन महीनों में इन मसालों और सब्जियों का निषेध किया है। और इन बारह महीनों- चैत, बैसाख, जेठ, असाढ़, सावन, भादों, क्वार, कातिक, अगहन, पूष, माघ और फागुन में ऊपर लिखी चीजों का निषेध किया जाए तो कई बीमारियों से तो आप दूर रहेंगे साथ ही उन चिकित्सकों से भी जिनके लिए हर मरीज सोने की खान होता है।)

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इतिहास की यह एक जनवादी दृष्टि!

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इतिहास की यह एक जनवादी दृष्टि!

राणा अलीहसन चौहान पाकिस्तान के मशहूर इतिहासकार थे। जाति के गुर्जर थे। उन्होंने गुर्जर जाति का इतिहास ‘ए शार्ट हिस्ट्री आफ द गुर्जर्स’ लिखी है। इस पुस्तक को हिंदी में गुर्जर एकता परिषद, देवधर, हरियाणा ने छापा है। श्री ओमप्रकाश गुर्जर, चौधरी शफकत जंग गुर्जर, चौधरी जमशेद जंग गुर्जर और डॉ ओम सिंह चौहान ने मिलकर इसका अनुवाद किया है। राणा अलीहसन चौहान, जो हिंदी और संस्कृत भी बहुत अच्छी तरह लिख और समझ लेते थे, ने इसके अनुवाद का जो अधिकार पत्र गुर्जर एकता परिषद को दिया है उसमें राणा साहेब की नागरी लिपि में लिखावट और वाक्य विन्यास संस्कृत के ज्यादा करीब है। राणा अलीहसन चौहान ने इस पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा है- “अंग्रेजी में यह पुस्तक मैने डॉ गुलाम सरवर अध्यक्ष फारसी विभाग कराची विश्वविद्यालय के आग्रह पर लिखी है।” उन्होंने बताया है- “गुलाम सरवर साहब गूजरों के कालस गोत्र से हैं और झेलम जिले के रहने वाले हैं। उनके कालस गांव वाले पुराने घर में लकड़ी का एक बहुत बड़ा स्तंभ है। जो छत के अत्यंत भारी शहतीर को थामे हुए है। इस स्तंभ में उनके परिवार का नाम राजा की पदवी के साथ खुदा है। उन्हें ईरान का सर्वश्रेष्ठï बौद्घिक पदक निशाने सियास भी मिल चुका है।” पाकिस्तान के शिक्षा विभाग में इस पुस्तक को लगवाने के लिए उन्होंने पाक शिक्षा अधिकारी डा सफदर महमूद का आभार जताते हुए बताया है- “सफदर महमूद गुजरात जिले के रहने वाले तथा गूजरों की खटाना खाप के हैं और पाकिस्तान के शिक्षा विभाग में सचिव हैं।” राणा अलीहसन चौहान ने भारतीय लेखक और राजनीतिक केएम मुंशी का भी आभार जताया है जिनकी पुस्तक ‘द ग्लोरी दैट वाज गुर्जर देश’ से उन्हें बड़ी मदद मिली। इस पुस्तक के शुरुआती पेजों पर ही जिन गुर्जर महानात्माओं का काल्पनिक और वास्तविक चित्र अंकित है, वे हैं- प्रथम गुर्जर सम्राट महाराज दशरथ, गुर्जरी माता यशोदा, वीरांगना पन्ना धाय, क्रांतिकारी विजय सिंह पथिक गुर्जर, सरदार बल्लभ भाई पटेल (लेवा गुर्जर), श्री फखरुद्दीन अली अहमद (कसाना गुर्जर), पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति श्री फजल इलाही (विजाड़ गुर्जर) और श्री राजेश पायलट (विधूड़ी गुर्जर)। पुस्तक में शुक्राचार्य को असुर गुरु बताते हुए लिखा है कि वे महान ऋषि भृगु के पुत्र थे और ये यही भृगु हैं जिन्होंने विष्णु की छाती पर लात से प्रहार किया था। तथा शुक्राचार्य की पुत्री राजा ययाति से ब्याही थी जिसके यदु नाम का पुत्र था और जिसके वंशज यादव कहलाते हैं। देव असुरों के परस्पर संपर्कों का वर्णन करते हुए राणा अली हसन ने श्रीराम को गुर्जर प्रतिहार क्षत्रिय बताया है तथा राजा जनक को सांवर असुर का पुत्र। राणा अली हसन ने तमाम आर्य और असुर नायकों का वर्णन करते हुए गुर्जरों को मूल रूप से आर्य और क्षत्रिय बताया है। इस पुस्तक में कश्मीर का प्रामाणिक इतिहास कल्हण की राजतरंगिणी के हवाले से दिया गया है।

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अमरनाथ यात्रा प्रसंग

कश्मीर घाटी के कई दूसरे रूप भी हैं

शंभूनाथ शुक्ल

25 जुलाई को जुमा था वह भी रमजान का आखिरी जुमा। सोफियान जिले के हर मस्जिद में सुबह से भीड़ जुटी थी। लोगबाग सफेद धवल वस्त्र पहने मस्जिदों पर डटे थे। आज मौलवी साहब को अपनी तकरीर में कुछ कहना था। हमारा ड्राइवर भलपुरा का मोहम्मद बिलाल आज चलने के मूड में नहीं था। पर हमें निकलने की जल्दी थी क्योंकि अमरनाथ के शिवलिंग दर्शन का हमारा आज का ही समय था। अगर एक दिन देर से पहुंचे तो हमें रोका जा सकता था। अमरनाथ की पवित्र गुफा में हम भले एक दिन विलंब से पहुंचे पर बालटाल के बेसकैंप में हमें आज ही अपनी एंट्री दर्ज करा देनी थी इसलिए हम जल्दी में थे। करीब दस बजे ड्राइवर आया तो रोता हुआ। उसका कहना था कि उसकी मां ने कहा है कि आज बड़ा दिन को उसको अपने घर ही रहना चाहिए। हमने कहा कि अच्छा चलो ठीक है हम तुम्हारी मां से मिलने चलते हैं। वह सहर्ष राजी हो गया। भलपुरा गांव के एक बड़े से बंगले पर उसने गाड़ी रोकी और बताया कि उसका घर यही है। कुछ ही देर में उसके पिता आए जो करीब 45 साल के खुशगवार इंसान थे। नीले रंग की एक जीन्स और लाल रंग की टीशर्ट पहने उस इंसान को देखकर लगता ही नहीं था कि उसका बेटा टैक्सी चलाता है। कुछ देर में उसकी मां भी आ गई। जो कानों पर हिजाब लपेटे थी और गाढ़े कत्थई रंग का फिरन पहने थी। पहले तो वे हमें घर ले गए और कहवा पेश किया। और ढेर सारे बादाम व काजू प्लेट में खाने के लिए रखे। फिर कुछ ही देर में खीर आ गई। हमारे लाख मना करने के बावजूद हमें उन लोगों ने एक-एक प्लेट गाढ़ी और खूब मीठी खीर खिला ही दी। हमने उन्हें बताया कि हम अगर आज बालटाल नहीं पहुंचे तो हमारा रजिस्टे्रशन रद्द कर दिया जाएगा और सारी यात्रा पर पानी फिर जाएगा। तब बिलाल की माँ राजी हो गईं। पर उन्होंने बिलाल को हिदायत दी कि श्रीनगर में लालचौक नहीं जाना। हमने पूछा कि लालचौक में ऐसा क्या है जो आप परेशान हैं तो वे बोलीं कि लाल चौक का कोई ठिकाना नहीं कब वहां पत्थर चलने लगें। यूं भी आज आखिरी जुमा है पता नहीं कौन पागल हो जाए। साथ में यह हिदायत भी दी कि हर हाल में आप बिलाल को बड़ा दिन यानी ईद के एक रोज पहले भिजवा देें। हमने कहा कि ठीक हम बिलाल को हर हाल में 27 की रात को फ्री कर देंगे यानी ईद के दो रोज पहले। यह सुनकर उन्हें संतोष हुआ।

भालपुर के मिलिट्री बेस कैम्प से निकलते-निकलते हमें 11 बज गए। यहां राजपूताना रेजीमेंट का राषट्रीय राइफल्स का कैंप था। मोर्चे पर रहने वाले हर सैनिक व अधिकारी को अपने सेवाकाल में ढाई साल राषट्रीय राइफल्स यानी आरआर कैंप में रहना ही पड़ता है। आरआर में ही उसकी असली परीक्षा होती है। चौबीसों घंटे सैनिकों को अपनी फुल ड्रेस में तैयार रहना पड़ता है। पता नहीं कब किसी अभियान या कांबिंग में उन्हें भेज दिया जाए। चूंकि कश्मीर घाटी के ये जिले डिस्टर्ब इलाकों में आते हैं इसलिए कुछ भी हो सकता है। फुल ड्रेस यानी कि कम से कम 15 किलो का बोझ। सिर पर लोहे की कैप, पीठ और पेट पर लोहेे का बख्तरबंद और भारी-भरकम एके-47, पर्याप्त मात्रा में कारतूस व खाने-पीने का सामान। रात बिरात कभी भी अभियान पर निकलना पड़ता है। यहां पर रहने वाले सैनिकों की मानसिक स्थिति डांवाडोल होने लगती है। इसलिए हर तीन महीने में एक महीने की निर्धारित छुट्टी पाने के लिए यहां मारामारी मची रहती है। सोफियान, सोपोर और पुलवामा में आरआर में रहना एक सजा से कम नहीं है। हमें अब पुलवामा होते हुए श्रीनगर जाना था। हम जल्द ही पुलवामा पहुंच गए। चिनार के घने पेड़ों के जंगल चारों तरफ थे। पुलवामा एक खुशहाल जिला है पर उतना ही अधिक डिस्टर्ब भी इसलिए यहां न सिर्फ आरआर का कैम्प है बल्कि केंद्रीय रिजर्ब पुलिस का भी कैंप यहां है। इसके अलावा कश्मीर आम्र्ड पुलिस और सिविल पुलिस की कड़ी पहरेदारी यहां है। दरअसल पुलवामा ही वह जिला है जहां से 1988 में सबसे ज्यादा कश्मीरी पंडितों का पलायन हुुआ था। हर गांव में वहां लावारिस पड़े कश्मीरी पंडितों के घर और उनके सूने बाग देखकर लगता है कि पंडित जब यहां से गए होंगे तो वे बहुत दुखी होकर। उनके प्रतिमालय नष्टप्राय हैं। और घरों में ताले टूट चुके हैं। उनके दरवाजे खिड़कियां गायब हैं। उनके घरों को देखकर लगता है कि पलायन किस तरह एक पूरे इलाके को सूनसान और मृत कर देता है। कई लोगों ने वहां बताया कि एक जमाना था जब पंडित यहां आबाद थे तब यह इलाका बहुत खुशहाल था। कमीज और पाजामा पहने पंडित यहां लोगों की चिट्ठी-पतरी बांचते और सुबह शाम मंदिरों में शिवतांडव गाते तो ऐसा लगता मानों ये चिनार के पेड़ नृत्य करने लगे हैं। पुलवामा पार करते ही एक गांव में एक उजाड़ मंदिर दिखा। उसकी ईंटें निकल रही थीं और मंदिर के कंगूरे घास से घिरे थे। उस उजाड़ और भूतिया से दिखने वाले मंदिर में एक स्त्री कुछ बुदबुदाती दिखी। ड्राइवर ने बताया कि यह पंडतानी है। हमने गाड़ी रुकवाई और उस पंडतानी के पास गए। उससे बात की तो उसने बताया कि वह पास की रिसेटलमेंट कालोनी में रहती है। यहां सुरक्षा गारद इतनी तगड़ी है कि वहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता। हमारे कालोनी पहुंचने के समय भी एंट्री होगी और वहां से निकलते समय भी। हमारे बच्चे स्कूल जाएं या बाजार सीआरपी का एक जवान उनके साथ जाएगा। पंडतानी कुछ निराश स्वरों में बोली- यह भी कोई जिंदगी है हम पड़ोसी से मिल नहीं सकते। उनके यहां आ-जा नहीं सकते। हम इंसान हैं हमारा भी मन करता है कि हम अपने पुराने पड़ोसियों से मिलें पर हम ऐसा नहीं कर सकते। अब वे हमारे साथ क्या सलूक करेंगे हमें नहीं पता। हमें तो सीआरपी और पुलिस वाले कहते हैं कि वे तुम्हें मार देंगे। ऐसे में यहां से निकल जाने का मन करता है। उस पंडतानी ने सुदूर फैले सेबों और अखरोट के बगीचों को देखकर बताया कि ये सब हमारे हैं पर अब पुलिस हमें हमारे ही बाग में नहीं जाने देती। जो कुछ हमारा बटाईदार दे देता है हम चुपचाप ले लेते हैं। कभी वह पचास हजार देगा तो कभी कह देगा कि सेब खराब हो गए पैसे नहीं मिले तो यूं ही संतोष करना पड़ेगा।

पंडतानी से जब हमने पूछा कि नई सरकार कह रही है कि कश्मीरी पंडितों को वापस कश्मीर घाटी भेजेंगे तो वह बोली कि जो पंडित यहां रह रहे हैं वे भी यहां से जाना चाहते हैं। अब उन्हें लगता है कि अगर वे भी अपने साथियों की तरह 1988 में यहां से चले जाते तो जम्मू के रिफ्यूजी कैंप में जगह तो मिल जाती। अब वहां भी जगह नहीं बची और सरकार अब हमें शरणार्थी नहीं मानती। यहां कोई नहीं आता। आप लोग तो अमरनाथ के तीर्थयात्री हो, आए हो चले जाओगे। कभी घूमने भी आए तो बस श्रीनगर या सोनमर्ग अथवा अनंतनाग या पहलगाम होकर निकल जाओगे। कभी सोफियान या पुलवामा आओ तो पता चले। यहां हम किस तरह जिंदगी जी रहे हैं। पंडतानी की यह बात सुनकर लगा कि वाकई सैलानी यहां को नहीं समझ सकता। घाटी के लोग शेष भारत से आने वाले सैलानियों को तो सम्मान देते हैं क्योंकि उनसे कमाई होती है पर बाकी के कश्मीर में या तो आप आतंकवादी हो अथवा आजाद कश्मीर की बात करने वाले यासीन मलिक टाइप के लोग या घुट-घुट कर जीने वाले ये पंडित। कश्मीर घाटी का असली रूप यही है और शायद इसीलिए ड्राइवर मोहम्मद बिलाल की माँ उसे मना कर रही थी कि अपने यात्रियों को लालचौक नहीं ले जाना। यहां पंडित भी परेशान है और मुसलमान भी। पर हुक्मरान तो बस अपनी चलाते हैं। मोहम्मद बिलाल कह रहा था जब तक अब्दुल्ला परिवार यहां रहेगा तब तक कश्मीर को इसी तरह जीना पड़ेगा।

दरअसल हमने जब अमरनाथ यात्रा की योजना बनाई थी तब ही हमारे मन में था कि हम कश्मीर घाटी का वह चेहरा भी देख कर आएं जो अक्सर हमें यात्रा की आस्था और सैलानीपने के बीच नहीं दिखता। इसलिए हमने सीधे एनएच-1 के जरिए श्रीनगर पहुंचने की बजाय वाया सोफियान और पुलवामा तथा सोपोर का रास्ता अपनाया। हमारे लिए यह आसान यूं हो गया कि हमारे एक साथी का बेटा सोफियान के मिलिट्री बेस राजपूताना रेजीमेंट के आरआर में सिपाही था। इसलिए हम वाया कुलगाम, सोफियान और पुलवामा होते हुए श्रीनगर तथा बालटाल पहुंचे। अमरनाथ यात्रा की योजना हमने मई में बनाई थी और आनलाइन रजिस्ट्रेशन तथा उसके लिए जरूरी खानापूरी में इतना वक्त गुजर गया कि यात्रा की तिथि आते-आते दो महीने गुजर गए और हमारा नंबर जुलाई के आखिरी सप्ताह में आ पाया। 25 जुलाई को हमें दर्शनों की अनुमति मिली पर वह भी लाख हड़बड़ी करने के बाद हम अमरनाथ एक दिन विलंब से पहुंचे। पर हमारी गुजारिश स्वीकार कर ली गई और हमें अनुमति मिल गई। जुलाई जब दिल्ली में उमस और मौसम की आर्दता का आलम यह था कि बस दो कदम चलते ही पसीने से सराबोर हो जाते, ऐसे में 23 जुलाई को हम जब जम्मू पहुंचने के लिए राजधानी एक्सप्रेस में सवार हुए तो लगा कि बस अब हिमालय के हिमाच्छादित दृश्यों को देखने के लिए बस कुछ ही घंटे बाकी हैं। रात भर की यात्रा के बाद जब हम जम्मू पहुंचे तो मौसम वाकई खुशगवार दिखा। रिमझिम बारिश के बीच हम स्टेशन से बाहर आए और अपनी निर्धारित टैक्सी में सवार हुए। टैक्सी वाला कश्मीरी मुसलमान था और सोफियान जिले के भालपुरा गांव का रहने वाला था। जम्मू के बाद पहला पड़ाव ऊधमपुर था। यह शहर अपनी छावनी के कारण ही जाना जाता है। करीब दस किमी के पहाड़ी इलाके में बसी ऊधमपुर छावनी राहत देती है। एक तो इसलिए कि छावनी में अपना एक अनुशासन होता है और वहां सिविलियन को भी उसी अनुशासन का पालन करना होता है। दूसरा यहां तक का सफर इसलिए भी मजे में कटा क्योंकि शिवालिक की पहाडिय़ों के गड्ड-मड्ड रास्तों के बावजूद यहां तक एनएच1 करीब-करीब फोर लेन है इसलिए टैक्सी अपनी फुल स्पीड में भागकर चली आई। ऊधमपुर में अब रेलवे स्टेशन भी बन चुका है और जो लोग रेलमार्ग से कटरा स्थित माता वैष्णो देवी के मंदिर में जाना चाहें उनके लिए यहां का रेलमार्ग बड़े सुभीते का तो है ही साथ ही अत्यंत रोमांचक यात्रा भी। हजारों फुट की ऊँचाई से जब ट्रेन गुजरती है तो पर्यटक यहां की पहाडिय़ों का नैसर्गिक सौंदर्य देखकर अभिभूत रह जाता है। इसी रेल मार्ग पर करीब साढ़े तीन किमी लंबी सुरंग भी है जिसे पार करना भी रोमांच का अनुभव होता है। ऊधमपुर के बाद पटनी टॉप पहुंचकर आप पाते हैं कि जैसे मसूरी के गनहिल प्वाइंट पर आ गए हैं। मेघ अठखेलियां करते हुए आपकी गाड़ी के अंदर आ जाते हैं और पूरी तरह सराबोर कर चले जाते हैं। पटनी टॉप में लगभग हर क्षण बारिश होती है।

पटनी टॉप से आगे बढ़ते ही आप पाते हैं कि अब धीरे-धीरे लोगों की बोली-बानी में एक बदलाव आ रहा है। पंजाबी से मिलती-जुलती डोगरी लुप्त हो रही है और उसकी जगह ले रही है संस्कृत और फारसी मिलीजुली एक शीरीं जुबान कश्मीरी। शब्दों मे ‘श’ का प्रयोग बढऩे लगता है और ठीक इसी के साथ-साथ लोगों के पहरावे और चेहरे-मोहरे तथा सांस्क्ृतिक अंतर का भी भान होने लगता है। रामबन आते-आते यह अंतर और साफ हो जाता है तथा आप सड़क किनारे ढाबों में जय माता दी वैष्णो होटलों की बजाय हलीम वैष्णो होटल और सलीम चिकेन शॉप के होर्डिंग लिखे पाते हैं। रामबन में तो इक्का-दुक्का मंदिर दिख भी जाते हैं लेकिन बनिहाल तक आते-आते मंदिर गायब और मस्जिदों की ठसक निराली। सड़कों पर खूब भीड़ तथा बीस से चालीस रुपये किलो सेब मिल जाएगा। आम छोड़कर बाकी फल यहां खूब मिलेंगे। रंगबिरंगे शाल, फिरन और जैकेट भी। हर दूकान ड्राई फ्रूट्स से पटी हुई जैसे कि हमारे यहां पान की दूकानें मिलती हैं उसी तरह यहां हर चौथी दूकान ड्राई फ्रूट्स की दिख जाती है। बनिहाल से वह इलाका शुरू हो जाता है जिसकी वजह से हर कश्मीरी परेशान है। धूल-धक्कड़ और गर्दा का। दरअसल इस इलाके में आबादी तो घनी है लेकिन ऊँचाई पर होने तथा पेड़ों द्वारा कम मात्रा में आक्सीजन छोड़े जाने के कारण धूल ऊपर नहीं उड़ पाती और वह आपके नथुनों से टकराया करती है। लगभग हर आदमी यहां मुंह पर मास्क रखता है तथा औरतें सिर के चारों तरफ हिजाब लपेटे हुए। बनिहाल से पहाड़ी और दुर्गम रास्ता कम होने लगता है और आप यह महसूस करेंगे कि आप धीरे-धीरे मैदानी इलाके में पहुंच रहे हैं। एक ऐसा मैदानी इलाका जो समुद्र तल से पांच से सात हजार फिट तक ऊँचा है। बनिहाल से श्रीनगर तक रेल सेवा है। सुबह शाम एक ईएमयू टाइप की टे्रेन यहां से चलती है। बनिहाल से करीब दस किमी आगे बढऩे पर आप जवाहर टनल पहुंचते हैं। पौने तीन किमी लंबी यह सुरंग भी एक अचरज है। जिसे पार करते ही आप एक दूसरे कश्मीर में दाखिल होते हैं जो हर मायने में पिछले कश्मीर से भिन्न है।

जवाहर टनल वन वे है। पहले तो यह एक ही थी और तब एक तरफ के वाहन जब निकल जाते थे तब दूसरी तरफ के वाहन छोड़े जाते थे। पर अब अगल-बगल दो टनल बन जाने से रास्ता सुगम हो गया है। बहरहाल इस सुरंग को पार करते ही आप पाते हैं कि एक नई दुनिया में आप आ गए हैं जो शेष भारत से काफी हद तक भिन्न है। चारो तरफ सिक्योरिटी फोर्सेज का कड़ा पहरा। खासकर हर मोड़ पर सीआरपी के जवान और उनकी बैरकें। इन्हें देखते ही लगने लगता है कि डैंजरस जोन शुरू हो गया है अब पता नहीं क्या होगा? निराकार मुद्रा में खड़े ये जवान न तो किसी से कुछ बोलते-बतियाते हैं न स्थानीय लोगों से इनके कोई लाइव संपर्क हैं। पर जवाहर टनल से कुछ किलोमीटर आगे बढ़ते ही गाड़ी सपाट मैदानी इलाके मे भागने लगी। दूर-दूर तक हरे-भरे खेत और न कहीं खाई न खंदक। हमें लग ही नहीं रहा था कि हम किसी हिमालयी इलाके से गुजर रहे हैं। लेकिन जब ड्राइवर बिलाल ने यह बताया कि दिसंबर के आखिरी तक यह पूरा इलाका सफेद चादर से ढक जाएगा तो अचंभा हुआ कि क्या मैदान में भी बर्फ गिरती है। पर यह मैदान नहीं कश्मीर घाटी का इलाका है जो आठ से नौ हजार फिट की ऊँचाई पर है। यह मैदान भले हो लेकिन है उतना ही ठंडा जितना कि ािमला या नैनीताल अथवा दार्जिलिंग या मसूरी। इस खूबसूरत इलाके को पार करने के बाद बिलाल ने गाड़ी काजीगुंड में हलीम वैष्णो ढाबे पर रोकी। यहां वैष्णो ढाबे में अंडा करी और आमलेट तो मिल जाएगा पर आप कतई मीट, मटन या चिकेन का नाम नहीं लें। पर मैदे की रोटी गले से उतर नहीं रही थी इसलिए मैने कश्मीरी वेज थाली ली। यानी राजमां-चावल। आप यकीन मानिए कि कश्मीरी राजमां बनाने में उस्ताद होते हैं। इसके बाद कहवा। एकदम फुल ताजगी आ गई।

काजीगुंड से हमने रास्ता बदल दिया और एनएच 1 की बजाय गाड़ी कश्मीर घाटी के डिस्टर्ब जिलों कुलगाम व सोफियान की तरफ मुड़वा दी। इससे दो फायदे थे, एक तो हम कश्मीर को एक टूरिस्ट की नजर से नहीं बल्कि एक शोधपरक नजरों से देख सकेंगे दूसरे हम कश्मीर के गांवों में रह रहे आम लोगों से रूबरू हो सकेंगे। मगर कश्मीरी गांवों को गांव कहना उनका अपमान है। खूबसूरत दुमंजिले और तिमंजिले मकान देखकर लगता ही नहीं था कि हम हिंदुस्तान के ही एक कोने से गुजर रहे हैं। यहां तक कि धान के पुआल रखने के कोठारे भी सिंगल स्टोरी के पक्के और ककई ईंटों से चिने हुए। मस्जिदें तो इतनी आलीशान कि लगता ही नहीं था कि दिल्ली में सात सौ साल राज कर चुके दिल्ली के सुल्तानों ने कोई खूबसूरत मस्जिद तक नहीं बनवाई। कस्बे की दूकानों में मीठी रोटी मिल रही थी तथा हर दूसरी दूकान में भुने मुर्गे टंगे हुए। कुलगाम में एक जगह तो एक बैल और एक भैंसे का चित्र बना था और लिखा था- मटन शॉप। कुलगाम को पार करते हुए जब हम सोफियान पहुंचे तो सूरज ढलने को आ चुका था। और अभी श्रीनगर लगभग 70 किमी दूर था। यानी सुबह सात बजे से हम अभी तक कुल 225 किमी की यात्रा ही कर सके थे। सोफियान शहर खूबसूरत है। मकान, मस्जिदें और बाजार भी। लेकिन उतना ही डिस्टर्ब भी। पाकिस्तान ने जिन इलाकों में आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा दिया है उनमें सोफियान प्रमुख है। लेकिन हर किसी के चेहरे देखकर लगता नहीं था कि ये लोग सरकार विरोधी कारगुजारियों में संलग्न भी होते होंगे। मगर सब तरह के लोग समाज में होते हैं। हमें कुछ ही दूरी पर स्थित भालपुर के आर्मी कैंप में रुकना था क्योंकि हमारे एक मित्र का बेटा वहां राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात था और वे मित्र भी इस यात्रा में हमारे साथ थे। राष्ट्रीय राइफल्स भारतीय सेना की वह कोर है जिसमें हर एक को अपने सेवाकाल में से ढाई साल काटने ही पड़ते हैं। राष्ट्रीय राइफल्स यानी आरआर में किसी भी सैनिक अथवा सैन्य अधिकारी की कड़ी परीक्षा होती है। रात-बिरात, समय-कुसमय हर वक्त बावर्दी उसे तैयार रहना पड़ता र्है। कब उसे निकलना पड़ेगा पता नहीं। उसका यह अभियान इतना कठिन और जोखिम भरा होता है कि जानें तक चली जाती हैं। मगर सैनिकों की जिंदगी में ऐसी घडिय़ां आती ही रहती हैं इसलिए कोई भी इसे अजूबा नहीं मानता। आरआर एक सूनसान जंगली इलाके में आर्मी कैम्प बनाया जाता है। बस्ती से दूर और कुछ अनगढ़ इलाके में। सिर्फ कैम्पों में जिंदगी गुजारनी पड़ती है। परिवार रखने की अनुमति नहीं और एकदम बियाबाँ जिंदगी। पर उनका मेस हर वक्त तैयार रहता है। मेस में हमारी खूब खातिरदारी हुई और वहां के जवानों को लगा जैसे उनके ही परिवार का कोई सदस्य आ गया। हमें वह रात कैंपों में ही काटनी पड़ी तथा आगे की यात्रा की सहूलियतें भी उन्होंने प्रदान करवा दीं ताकि बालटाल पहुंच कर हम वहां तैनाता 27 पंजाब रेजीमेंट के बेस कैंप में ठहर सकें। इस आरआर कैम्प में सेब और अखरोट के बगीचे थे और इस जंगल को रात में भी गुलजार रखने के लिए जेनरेटर लगे थे। हमें बताया गया कि इसी भलपुरा गांव में दो दिन पहले किसी आतंकी के होने की सूचना मिली थी और उसी के आधार पर आरआर का एक जवान और अधिकारी कांबिंग करने गए थे। दो आतंकी मारे भी गए लेकिन हमारी सेना का अफसर शहीद हो गया। वहां मौजूद सैनिकों ने बताया कि वह अफसर जब मृत्यु शैया के निकट था तो डाक्टर से बोला कि डाक्टर साहब बचा लो मुझे, मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं। जब वह इस तरह बोल रहा था तो सारे लोग रोने लगे और उसकी मृत्यु के बाद मेस बंद रहा। न तो किसी के खाने की इच्छा थी और न कुक के बनाने की।

पुलवामा पार कर हम पुन एनएच-1 पर चढ़ गए और दोपहर बारह बजे के करीब हम जम्मू व कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में थे। भारत के किसी भी राज्य की राजधानी इतनी ऊँचाई पर और इतनी सुंदर नहीं होगी जितनी कि श्रीनगर है। कैंट पार करते ही जैसे ही आप डल झील के इलाके में दाखिल होते हैं तो इस झील का अपार विस्तार देखकर लगता है कि यह झील नहीं पूरा एक शहर है। शिकारे और नावों ने पूरी की पूरी डल झील को यूं घेर लिया है कि उसमें पानी कम नावें ज्यादा नजर आती हैं। हम दोपहर में डल के इलाके में पहुंचे थे इसलिए धूप और गर्मी के कारण हमारा बुरा हाल था। पर लोगों ने बताया कि यहां की शाम और सुबह बड़ी सुंदर होती है। रात में तो कड़ाके की ठंड पड़ती है। और गर्मी में ऊनी वस्त्र पहनने पड़ते हैं। डल के सामने स्थित निशात बाग इसकी सुंंदरता को चार चांद लगा देता है। 1633 में मुगल बादशाह जहांगीर की प्यारी बेगम नूरजहां के भाई आसिफ खान ने इसे लगवाया था। इसी के पास एक पहाड़ी पर है शंकराचार्य मंदिर जो सैकड़ों वर्षों से जस का तस बना है। हमारी यात्रा अभी आगे की थी और बालटाल यहां से अभी 105 किमी दूर था इसलिए जल्दी-जल्दी हम यह इलाका पार कर अमरनाथ की तरफ चल पड़े। गांदरबल पहुंचकर हमें राहत मिली। बालटाल के लिए वाया गांदरबल ही जाया जाता है। और गांदरबल ही अमरनाथ का जिला मुख्यालय है।

गांदरबल के पास चिनाब को पार कर हम मनीग्राम इलाके में दाखिल हुए तो वहां हमें रोक दिया गया। उस दिन रमजान का आखिरी जुमा था। पुलिस वालों ने बताया कि आगे कंगन में कुछ लोगों ने अमरनाथ यात्रियों पर पथराव किया है। उन लोगों ने बताया कि डर यहां मनीग्राम में भी है पर यहां सीआरपी कैम्प में आप लोग चले जाइए। सीआरपी कैंप के पास अमरनाथ यात्रियों की सेवा के लिए लगाए गए लंगर भी थे। हम जिस लंगर में रुके वह लखनऊ की किसी संस्था का था। करीब तीन बजे हमें छोड़ा गया। हमारे ड्राइवर ने बताया कि कंगन में कुछ बदमाशी होती है पर उसके बाद का रास्ता साफ और निष्कंटक है। कंगन कस्बा काफी भीड़ भाड़ वाला और अराजक लगा भी। पर कंगन पार करते ही हमें लगा कि बस अब अशांति के दायरे से हम बाहर आ गए। न कहीं गांव न कस्बे। एनएच-1 के एक छोर पर बहती चिनाब और दूसरी तरफ वनाच्छातिदत पर्वतमाला। पर धीरे-धीरे वन कम होते जा रहे थे और गांव व शहर भी। एक जगह तो ऐसा लगा मानों पूरे पर्वत पर नरम-नरम घास बिछा दी गई हो। पता चला कि हम सोन मार्ग पहुंच गए। सोनमार्ग यानी सोना मार्ग। इतना खूबसूरत की आदमी बस खड़ा का खड़ा रह जाए। लगा वाकई धरती में कहीं स्वर्ग है तो बस इसी सोनमार्ग में। पर हमारी मंजिल अभी दूर थी अत: हम कुछ देर बाद वहां रुकने के बाद चल पड़े। अब पहाड़ों से घास भी गायब होने लगी और पहाड़ यकायक नंगे हो गए। कुछ ही दूर चलने के बाद एनएच-1 से दायीं तरफ को एक कच्चा रास्ता जाता था। वहां पुलिस की बैरिकेडिंग थी। पुलिस ने पूछा कि बालटाल? हमारे हां कहने पर उसने हमें दायीं तरफ के रास्ते पर जाने का इशारा किया। वहां से अमरनाथ के लिए हेलीकॉप्टर सेवा उपलब्ध है। यहां से हेलीकॉप्टर पंचतरणी तक जाता है और वहां से अमरनाथ तक पैदल करीब पांच किमी चलना पड़ता है। हेलीकॉप्टर का एक तरफ का किराया 1950 रुपये है। यानी आने-जाने का 3900 रुपये। हेलीकॉप्टर से पंचतरणी तक जाने में कुल दस मिनट लगते हैं। शाम ढल रही थी इसलिए हमने तत्काल बालटाल जाने का फैसला किया। दूसरे हेलीकॉप्टर से आप आराम से अमरनाथ तो हो आएंगे पर कश्मीर का यह इलाका अनदेखा ही रह जाएगा जो एकदम शांत है और लद्दाखी क्षेत्र मेें है। यहां से कारगिल तक कोई कस्बा नहीं और कहीं कोई गड़बड़ नहीं। दूरदराज के जो गुज्जरों के घर हैं वे भी अस्थायी और जाड़ा शुरू होते ही वे नीचे उतर आते हैं।

बस बालटाल यहां से कुल दस किमी है। हम इस पठारी इलाके को पार करते ही सीधे बालटाल के भीड़-भाड़ भरे मैदान में दाखिल हो गए। पीले और नीले तिरपालों से बनाए गए अमरनाथ यात्री कैंप और असंख्य गाडिय़ों की पार्किंग। जबर्दस्त धूल कि हर आदमी मास्क लगाए। घोड़े और खच्चरों का मलमूत्र इधर उधर बिखरा था और उनकी दुर्गन्ध से नथुने फटे जा रहे थे। अब यहां से कुल 14 किमी की दूरी है अमरनाथ की। 9500 फिट की ऊँचाई पर स्थित यह बालटाल सिर्फ जून जुलाई और अगस्त में ही गुलजार रहता है बाकी के नौ महीने यहां सन्नाटा छाया रहता है। हम बालटाल से सीधे दिमोल गए जहां पर 27 पंजाब रेजीमेंट के बेस कैम्प में हमारे ठहरने की व्यवस्था थी। यहां पर हमारे रजिस्ट्रेशन कार्ड देखे गए। और हमारी गाड़ी को अंदर जाने की अनुमति दी गई। यात्रामार्ग इसी आर्मी बेस कैम्प से होकर जाता है। हमारे रुकने के वास्ते एक टेंट के अंदर व्यवस्था थी। बर्फच्छादित नदी के ऊपर ये कैंप लगे थे। उनमें अंदर गद्दे पड़े थे और हर एक के लिए एअर टाइट स्लीपिंग बैग था। बताया गया कि यहां खाने का इंंतजाम नहीं है और खाने के लिए आप लोग यहां के मार्ग पर लगे लंगरों पर जा सकते हैं। इस कैम्प में एक सुविधा थी और वह थी यहां के टायलेट्स जो हमारे तंबुओं से करीब 200 मीटर की दूरी पर थे लेकिन साफ सुथरे और दुर्गन्धरहित। लेकिन आधी रात को यदि जाना पड़ जाए तो सांप या बिच्छू के खतरे तो थे ही किसी गड्ढे में गिर जाने का भी पूरा खतरा था। खैर यात्रा मार्ग में लगे लंगरों में खाना खाया जिस लंगर में हम गए वह दिल्ली के अग्रवालों का था। खाना अच्छा तो था ही लंगरवालों की मेजबानी भी लाजवाब थे। तवे की रोटी, एक दाल, एक सब्जी और खीर तथा ड्राई फ्रूट मिला गरम दूध वाकई यात्रा की पूरी थकान उतार देता था। वहां जो खच्चर अथवा घोड़े वाले और दूकानदार भी इन्हीं लंगरों के भोजन से अपना रोजा खोलते। यहां किसी तरह का भेदभाव नहीं था। हमें बता दिया गया था कि अगर धूल-धक्कड़ और खच्चरों से अपना बचाव करना था तो हर हाल में हमें सुबह चार बजे तक यात्रा पर निकल पडऩा चाहिए। मौसम साफ था और खुशगवार भी। हम पूरी रात सोए ही नहीं और सुबह तीन बजे ही तैयार हो गए। ठीक साढ़े तीन बजे बिना चाय या पानी पिए हम यात्रा मार्ग पर चल दिए। काफी अंधेरा था और नीचे से नदी का शोर निरंतर आ रहा था। आधा किमी चढ़ते ही सांस फूलने लगी और लगा कि 12 किमी की शेष दूरी हम दो दिन में भी नहीं पार कर पाएंगे। तभी नीचे से कुछ घोड़े वाले आ रहे थे हमने घोड़े तय किए और फी घोड़ा 700 रुपये देकर घुड़सवारी की। यह किराया एक तरफ का था। उतराई आसान भले हो पर घोड़े वाला उतरने का ज्यादा पैसा लेते हैं।

चढ़ाई और भयानक चढ़ाई

हमने ठीक ही किया कि घोड़े किराये पर ले लिए क्योंकि दिमोल कैम्प से जो चढ़ाई शुरू होती है वह लगभग अनवरत चलती रहती है और चढ़ाई एकदम सीधी भी है। घोड़ों को आक्सीजन उस मात्रा में नहीं चाहिए होती है जितनी कि एक सामान्य मनुष्य को। दूसरे घोड़ा अपनी चार टांगों के कारण भारी भरकम सामान भी लाद लेता है और मजे से चढ़ जाता है। घोड़े के खुर मिट्टी को ज्यादा तेजी से और पुख्ता तरीके से पकड़ते हैं। मगर घोड़ा डराता बहुत है और उसकी वजह है उसका सदैव खाई की तरफ चलना। हम चूंकि रात को चले थे इसलिए तारों की रोशनी में नीचे बह रही नदी के ऊपर बर्फ की जो सफेद चादर ढकी थी वह बड़ी ही भयावनी और चित्ताकर्षक लग रही थी। आंखें उधर घूम ही जातीं लेकिन गहराई का अंदाजा लगाते ही सिर चकराने लगता। ठंड और आक्सीजन के गिरते स्तर से घबराहट होने लगी थी। ऊपर से रास्ता भी सन्नाटा। बीच में पंजाब रेजीमेंट के जवान पहरा देते अवश्य दिख जाते वे टार्च लिए पहाड़ों पर ऊँचाई वाले स्थानों पर तैनात थे। काफी देर तक इसी तरह सन्नाटे में चलने के बाद जब रोशनी बिखरने लगी तो नीचे देखा कि नदी पूरी तरह बर्फ से ढकी है लेकिन बीच-बीच में जहां बर्फ कुछ निकल गई है पानी की अविरल धारा बह रही है और उसका शोर इतना भयानक था कि पूरे सन्नाटे को चीर रहा था। सुबह छह के करीब हम संगम टॉप पहुंचे। वहां पर कुछ देर रुके। घोड़ों को आराम दिया गया और घोड़े वालों ने भी चाय पी तथा रोटी खाई। इसके बाद से रास्ता पैदल वालों के लिए अलग कट जाता है और घोड़े वालों का अलग। अब एकदम उतराई थी और वह भी इतनी भयानक कि कुछ जगह तो हमें घोड़ों से उतरकर पैदल चलना पड़ा। फिर बर्फ की नदी के ऊपर से सफर शुरू हुआ करीब तीन किमी तक बर्फ में चलने के बाद हम पहुंच गए अमरनाथ। तिरपाल लगाकर सजाई गई दूकानें। हर दूकानवाले अपने यहां सैकड़ों रजाई भी रखी थीं ताकि अगर यात्री रात काटना चाहें तो परेशानी न हो। यहां की सारी दूकाने गांदरबल, कंगन व गुंड के मुसलमानों की थी वही प्रसाद बेचते हैं और पैसे लेकर ठहरने की व्यवस्था भी करते हैं। एक बाल्टी गरम पानी पचास रुपये की तथा एक जग पीने का गरम पानी दस रुपये का। एक कैम्प में डेरा डाला और पचास रुपये फी बाल्टी देकर गरम पानी खरीदा नहाए और सब लोग उस पवित्र गुफा के लिए निकल पड़े जहां बर्फ के शिवलिंग बिराजते हैं। यहां से दो किमी के लगभग है गुफा। चल पड़े बर्फ की नदी से बर्फ पिघल-पिघल कर आ रही थी और पूरे रास्ते को कीचड़ से सान रही थी। धीरे-धीरे छड़ी के सहारे हम चले। कहीं ऊँचा कहीं नीचा कहीं बर्फ वाली फिसलन तो कहीं सपाट और कहीं सीढ़ी।

कुछ देर सुस्ताने के बाद जब चलना शुरू किया तो सीधे गुफा के द्वार पर जाकर रुका। सामने रुकावट के उस पार करीब सात फिट ऊँचा बर्फ की सिल्ली जैसे शिवलिंग पूरे गुफा को रोशनी दे रहे थे। मेरे मुंह से फूट पड़ा- कर्पूरगौरं करुणावतारं…..! बड़ी देर तक मैं उस बर्फ के शिवलिंग को निहारता रहा। लगा कि इस यात्रा से न केवल शिव के इस रूप के दर्शन किए बल्कि उस दुर्गम यात्रा को भी करीब से जाना जिसके बारे में कहा जाता है कि अमरनाथ जाने वाले के लौटने की संभावनाएं पचास फीसदी ही होती हैं। कश्मीर का यह रूप मेरे लिए अनजाना और अनचीन्हा तो था ही अपने मिथ से एकदम उलट भी था। लगा कि अगर अमरनाथ नहीं आता तो कश्मीर के बारे में अर्धसत्य ही जान पाते।

 

 

 

 

Rakhi ka dost

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राखीबंद दोस्त!
पिताजी के एक दोस्त थे रामाश्रय शुक्ल। घनघोर बुद्घिवादी और हद दर्जे के नास्तिक। जीवन में कभी पूजा पाठ नहीं की और न ही किसी मंदिर में मत्था टेका। रामाश्रय जी व्यवहार कुशल तो थे ही मानवतावादी भी परले दरजे के। मेरे पिता से उनकी दोस्ती ऐसी कि कोई नहीं जानता था कि ये दोनों शुक्ल बंधु सगे भाई नहीं है। अब वे पिता जी से छेाटे थे या बड़े किसी को नहीं पता था। पर हम उन्हें चाचा कहते और उनके बच्चे पिता जी को दादा यानी कि ताऊ। हालांकि रंगरूप और व्यवहार में दोनों मित्रों में जमीन आसमान का अंतर। पिताजी भक गोरे और रामाश्रय जी एकदम कृष्णावतार। पिताजी छह फिट से ज्यादा ऊँचे और उनके मित्र साढ़े पांच फिट से बित्ता पर ऊपर। पिताजी कानपुर के स्वदेशी काटन मिल में मजदूर और रामाश्रय जी सरकारी डाकघर में पोस्ट मैन। रामाश्रय जी डाकघर में आने के पहले दूसरे विश्वयुद्घ में बतौर सिपाही जापानियों से लड़ चुके थे सो उन्हें फौजी पेंशन भी मिलती थी साथ में उनकी पत्नी यानी कि हमारी चाची रामश्री एक सरकारी विद्यालय में अध्यापिका। यानी कुल मिलाकर रामाश्रय जी की फैमिली एक लोअर मिडिल क्लास फैमिली थी और पिताजी का परिवार एकदम प्रोलेतेरियत (सर्वहारा परिवार)। दूसरे विश्वयुद्घ के समय गांधी जी के भारत छोड़ो आंदोलन में पिताजी घरबार छोड़कर कानपुर देहात के अपने गांव से कानपुर शहर आ गए थे। पकड़े गए थे पर मुन्ने खाँ दरोगा ने उन्हें नाबालिग बताते हुए छोड़ दिया था। अब साल 1958 में जब राखी पड़ी तो पिताजी की मिल में 80 दिनों की ऐतिहासिक हड़ताल चली और पिता जी कामरेड सुदर्शन चक्र के साथ उस हड़ताल को लीड कर रहे थे। इस हड़ताल में मजदूरों के घर खाने के लाले पड़े थे। गांव की जमीन से जो आता वो सब बांट दिया जाता। ऐसी मुफलिसी में त्योहार सबसे ज्यादा तंग करते हैं। अब राखी कैसे मनाई जाए। पिताजी को चिंता खाए जा रही थी कि रामाश्रय जी की बेटी बेबी जब मेरे बेटे शंभू को राखी बांधने आएगी तो टका कहां से देंगे, घर में तो भूनने को चने तक नहीं। मेरी एक बहन थी आशा। यह माना गया कि चलो उसे दिया अथवा नहीं दिया कोई बात नहीं, घर की ही बात है पर बेबी को तो कुछ देना ही चाहिए। पिताजी अपना दुख किससे व्यक्त करें। सो उन्होंने रामाश्रय जी के समक्ष ही यह चिंता रखी। रामाश्रय जी बोले- अरे किशोर भाई इसमें परेशानी की कोई बात नहीं। मैं बेबी को बातों में अटका लूंगा और उसे आपके घर तब जाने दूंगा जब आपकी बेटी आशा मेरे बेटे अशोक को राखी बांध जाएगी। आशा को मेरी पत्नी एक रुपया तो देंगी ही, वही रुपया आप शंभू को राखी बांधने पर बेबी को दे देना। रामाश्रय जी ने पिताजी की समस्या का इतना आसान समाधान कर दिया कि पिताजी भौंचक रह गए। अब बताएं राखी क्या दोस्ती पर भारी पड़ सकती है?

Haribhoomi 10th August

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कश्मीर घाटी का एक सच और है जिसे सैलानी नहीं जान पाते। इसके लिए आपको उन इलाकों में जाना पड़ेगा जहां प्रकृति उतनी लुभावनी नहीं है जितनी कि डल झील में। बहरहाल मैं वहां गया और उस घाटी की कड़वी कहानी, आज के हरिभूमि में।
http://epaper.haribhoomi.com/Details.aspx?id=37275&boxid=15094850

Jansatta

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तीन अलग-अलग संस्कृतियों और सभ्यताओं को अपने में समाए जम्मू व कश्मीर में जितना प्रकृति की विविधता के दर्शन आपको होते हैं उतना ही जनजीवन के भी। बोली-वाणी अलग, धर्म और पहचान अलग तथा एथेनिक पहचान भी भिन्न। इसलिए आप अमरनाथ की पवित्र गुफा में बिराजे बर्फ के शिवलिंग के दर्शन की कामना से जाएं अथवा भारत के इस सुदूर उत्तरी प्रांत को पूरी तरह देख लेने की तमन्ना से दोनों ही मामलों में यह यात्रा महत्वपूर्ण और जरूरी है। 13500 फिट की ऊँचाई पर स्थित इस गुफा के द्वार पर पहुंच कर आपको प्रतीत होता है कि भले ही यह यात्रा बेहद कष्टकारी और थकाऊ क्यों न हो मगर यहां पहुंचकर आप ने एक रोमांचक यात्रा तो पूरी कर ही ली। यूं भी चढ़ाई जितनी कष्टसाध्य और दिक्कततलब होती है उतराई उतनी ही सहज। इसलिए उतरते वक्त तो आप बगैर सांस उखडऩे के किसी भय से दौड़ते हुए नीचे उतर आएंगे और अपने बेस कैंप तक आते-आते आप थक भले जाएं लेकिन राहत तो मिलती ही है। जीवन में एक बार ही सही लेकिन मेरा मानना है कि हर आदमी को अमरनाथ की यात्रा जरूर करनी चाहिए। भले आप आस्तिक हों या नास्तिक अथवा परम वैष्णव। शिवधाम की यह यात्रा जीवन की यायावरी की जिज्ञासा को तुष्ट तो करती ही है।
आज के जनसत्ता में इसी विषय पर मेरा यह आलेख-
http://epaper.jansatta.com/318935/Jansatta.com/Jansatta-Hindi-10082014#page/15/1