चलो घूम आयें!

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बाहुबली की मेहरारू
चुनाव हमें उत्तेजित जितना करता है वैसा नतीजा नहीं देता। यहा सिर्फ कुछ बाहुबलियों का शगल है जो सुप्रीम कोर्ट के डर से खुद भले न लड़ रहे हों पर अपनी मेहरारू को लड़ा रहे हैं। यानी जेल से वे बाहुबली ही राज करेंगे और हमें न चाहते हुए भी उन्हें माननीय कहना पड़ेगा। हम इन्हें जिताने के चक्कर में अपने शौक क्यों जाम करें। मार्च का आखिरी हफ्ता पलाश के फूलों के लिए जाना जाता है। बिनसर से रानीखेत जाने के पूरे रास्ते पर आपको ये पलाश के जंगल मिल जाएंगे। लाल फूलों की यह माया आपको अपने मोहपाश में बांध लेती है। पलाश के जंगलों में उन्मुक्त विचरण करते समय भालू का ख्याल जरूर रखना पड़ता है पता नहीं कब आप मोहमाया ग्रस्त हों और वह आकर आक्रमण कर दे। दिल्ली से हल्द्वानी जाकर रुकिए फिर अगले रोज वाया अल्मोड़ा आप मजे से बिनसर पहुंच सकते हैं। वहां गढ़वाल मंडल विकास निगम का रेस्ट हाउस है और वन विश्राम भवन भी। पर वन विश्राम गृह जाने पर आपको अपनी गाड़ी दूर खड़ी करनी पड़ेगी और कोई भरोसा नहीं कि अगले दिन कोई भालू उसके शीशे तोड़ जाए या हाथी उसे पलटा जाए या बंदर उसमें खरोंचे मार जाए। वन विश्राम भवन में भोजन की व्यवस्था भी खुद ही करनी पड़ेगी। यानी अगर वहां रुकना है तो आटा, दाल, चावल, सब्जी व मसाले खुद ही ले जाने पड़ेंगे। रात हो या दिन बिजली नहीं आएगी इसलिए न तो मोबाइल काम करेगा न कैमरे की बैटरी चार्ज हो सकेगी। इंटरनेट यहां काम नहीं करता है। वन विश्राम भवन में एक खतरा और भी है। अलस्सुबह बरामदे का दरवाजा खोला तो बघेरा आपका स्वागत करे। अगर इन सारे खतरों और डर पर काबू पा लें तो यकीन मानिए कि जो रुकने का मजा वन विश्राम गृह में है वह गढ़वाल मंडल के होटल में अथवा प्राइवेट रिजॉर्ट में नहीं है। वन विश्राम गृह से सुबह सूर्योदय और शाम को सूर्यास्त देखने का अलग ही आनंद है। पर हर एक को यह मजा नहीं आएगा क्योंकि रस की बात मधुप नीरस सुन रसिक होय सो जाने। यहां कुछ दूर जाने पर एक ऊँचाई वाले स्थान से बर्फीली चोटियां देख सकते हैं और आसपास के घने जंगल में तेंदुआ तो कभी भी दिख सकता है। यहां दिल्ली व मुंबई के तमाम सेठों के फॉर्महाउसेज हैं पर जिस राह जाना नहीं उस बारे में क्या बात करना।
यहां अधिक से अधिक दो दिन रुक सकते हैं। अगले रोज यहां से रानीखेत जाया जा सकता है अथवा जागेश्वर या कौसानी। मुझे रानीखेत बहुत पसंद है। खासकर वहां पर फारेस्ट विभाग के डाक बंगले में ठहरना और वहां पास के बागवानी प्रशिक्षण केंद्र में रात को घूमने जाना। जहां आपको धुंधलके में तेंदुआ तो मिल ही जाएगा वर्ना हिरण और जंगली सुअर तो मिलेंगे ही। अगले रोज आप कालका के रेस्ट हाउस में रुकिए और पास के कालिका मंदिर में भी जाएं। जहां पर पूरब के एक साधु डेरा डाले हैं। साधु विकलांग हैं पर उनका काम अच्छा चल रहा है। हर नवरात्रि में भारी भीड़ जुटती है। और चढ़ावे में आए पैसों से उन्होंने दो तीन गाडिय़ां ले रखी हैं। एक बलेरो और दो जीपें। जो भी आता है उससे कहते हैं आओ राजा बहुत दिन बाद आए। वहां कुछ साध्वियां भी हर समय रहती हैं। आप कह सकते हैं कि कालका में एक सम्मोहन तो है। खासकर कालका के जंगल का। कालका से वापस वाया जिमकार्बेट के धनगढ़ी गेट होते हुए लौटें। रास्ते में कहीं भी आपको द ग्रेट चमेलियन भी दिख जाएगी जो शायद पुराने डायनासौर के बचे खुचे वंशज हैं। सो देर मत करिए और चलिए हो आएं बिनसर तथा देख आएं पलाश के लाल फूलों वाले सम्मोहनकारी जंगल। रानीखेत का गोल्फ कोर्स तथा विघ्नेश्वर महादेव। जहां सन्नाटा ऐसा पसरा होगा कि दूर-दूर तक कोई आवाज नहीं कोई हरकत नहीं और कहीं कोई प्रदूषण नहीं।

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नमो को सलाह!

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स्वारथ, सुकृत न श्रम बृथा देखि विहंग बिचारि,
बाज पराए पानि पे तू पंछी न मारि।।
बाज दफे मुझे लगता है कि नरेंद्र मोदी को बेवकूफ बनाया जा रहा है। वे उस वंचित समुदाय से हैं जिन्हें जो कुछ मिला अपने आका की चापलूसी की वजह से। वे उस समाज से कुछ नहीं पा सकते जिसके लिए बड़े पद अभिजात्यों के लिए रिजर्ब रहते हैं। मसलन न तो वे द्विज ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया हैं, न उस अंग्रेजीदां वर्ग से हैं जो बिना मेहनत के बहुत कुछ पा जाता है। न वे किसी राजा महाराजा की वंश परंपरा से आते हैं। इसीलिए वे ऐसी मांग कर बैठते हैं या ऐसी ओछी हरकतें जो उन्हें हास्यास्पद बनाती हैं। हो सकता है कि कांग्रेस का गठबंधन इस बार बहुत बुरी हालत में पहुंच जाए तो भी क्या मोदी पीएम बन पाएंगे? क्या आरएसएस और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने लिख कर दे दिया है कि पीएम तो वही बनेंगे। कल को संसदीय बोर्ड बगावत कर दे या अध्यक्ष के इशारे पर भाजपा के जीत कर आए सांसद। बाबू राजनाथ सिंह कोई कच्ची गोलियां तो नहीं खेले। मंजे हुए खिलाड़ी हैं। वे अटलबिहारी की नकल भी खूब कर लेते हैं चुप साध कर भी और बोलते हुए भी। देखिए एक जमाने में सारी उछल-कूद लालकृष्ण आडवाणी ने की थी और भाजपा जब सत्ता के करीब पहुंची तो वे अटलबिहारी प्रधानमंत्री हुए जिनकी अगुआई में भाजपा को कुल दो सीटें लोकसभा में मिली थीं। मैं तो नरेंद्र मोदी को राय दूंगा कि
स्वारथ, सुकृत न श्रम बृथा देखि विहंग बिचारि,
बाज पराए पानि पे तू पंछी न मारि।।
(तो भैया नरेंद्र भाई मोदी न ये अंबानी काम आएंगे न टाइम्स ऑफ़ इडिया और इंडिया टुडे ग्रुप के संपादक गण व मालिक। ये सब आपको उछाल रहे हैं। काहे को बेकार में श्रम किए जा रहे हो। अंत में तो भगवान राम के वंशज बताने वाले ठाकुर राजनाथ ही आपको हटाकर पीएम बन जाएंगे। और फिर जैसा कि जयराम रमेश ने कहा है आपको तब जीवन भर कुंठित रह कर जीना पड़ेगा, ठीक आडवाणी जी की तरह। आप तो कभी सूचना प्रसारण मंत्री भी नहीं रहे जो लालकृष्ण आडवाणी की तरह अपने चमचे पत्रकारों की फौज खड़ी कर लेते। उलटे मुसलमान आपको फूटी आँख नहीं देखना चाहते न भाजपा का अभिजात्य वर्ग। इसलिए गुजरात के आगे निकलने का सपना छोडि़ए और मजे से गुजरात पे राज करते रहिए। लोगबाग एक न एक दिन 2002 को भूल ही जाएंगे।)

गढ़ कुंडार की यात्रा

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मौसम गढ़ कुंडार जाने का है
तुर्कों के आने के पहले की भारतीय सभ्यता और शिल्प तथा आर्कीटेक्ट देखना हो तो गढ़ कुंढार जरूर जाना चाहिए। झांसी से कुल 91 किमी दूर यह किला टीकमगढ़ जिले में है। 11 वीं सदी में बने इस पचमहले दुर्ग को खंगार राजाओं ने बनवाया था। इसकी दो मंजिलें जमीन के नीचे और तीन ऊपर हैं। एक पहाड़ी के ऊपर बने इस किले के सबसे ऊँचे टीले पर बैठकर बाहर की तरफ देखा जाए तो ऐसा लगता है यह झील के ऊपर बना है। दरअसल यह एक कुंड पर पडऩे वाली सूर्य की छाया की बिना पर बना था। इसका अर्थ ही है कुंड का अर्क। सन् 1180 में राजा खेतसिंह खंगार ने यह इलाका चंदेल राजाओं से जीता था। और उनके किले जिनगढ़ को अपनी राजधानी बनवाई। बाद में उनके पोते राजा खूब सिंह ने यहां पर गढ़ कुंढार किला बनवाया। जिनगढ़ के अवशेष अभी भी विद्यमान हैं। बाद में जब खंगारों का प्रताप बढ़ा तो चंदेल उनसे डर कर हिमाचल में जाकर बस गए। इस किले में गिद्ध वाहिनी मां गज आनन का मंदिर भी है जो खंगारों की कुलदेवी थीं।
1347 में मुहम्मद तुगलक ने खंगार राजाओं से यह इलाका जीत लिया और उन्होंने बुंदेला नरेशों को यह किला सौंप दिया। राजा मानसिंह की राजकुमारी ने तुगलक के आक्रमण के दौरान जौहर कर लिया। और अब वहां राजकुमारी केसर दे की पूजा की जाती है। हालांकि महल के नीचे मुसलमानों का ही गांव है पर वे केसर दे की पूजा नियमित रूप से करते हैं। खंगारों के पतन के बाद उनका सम्मान घटता चला गया। और वे इधर-उधर फैल गए। हालांकि वे अपने को क्षत्रिय कहते हैं पर चंदेल अथवा बुंदेले क्षत्रिय उनसे शादी विवाह नहीं करते। लेकिन खंगार एक बहादुर और आन-बान-शान वाले क्षत्रिय थे पर पराजय के चलते उनका वंश डूबता चला गया।
मैं हर साल मार्च के पहले हफ्ते में गढ़ कुंढार जरूर जाता हूं। मैं तो कानपुर से वाया कार जाता हूं। पर दिल्ली से शताब्दी के जरिए झांसी पहुंचिए और वहां से किसी भी ट्रांसपोर्ट से ओरछा जाकर रुकिए। ओरछा मध्यप्रदेश सरकार के इकोनामी होटल भी हैं और रिजॉर्ट भी। वहां के राजा महाराज मधुकर शाह का महल भी अब रिजॉर्ट बन गया है। ओरछा से टैक्सी के जरिए आप गढ़ कुंढार जा सकते हैं। पर वहां न तो पीने के पानी की व्यवस्था है न कुछ खाना-पीना मिलेगा। इसलिए बेहतर है कि आप पहाड़ी के ऊपर जाकर किला देखने के पूर्व ही नीचे के गांव में किसी को पैसा दे जाइए। और यकीन मानिए कि अगर आप मांसाहारी हैं तो वे तत्काल कोई खस्सी मार कर पका देंगे तथा गेहूं पीसकर आटा निकालेंगे और उसी आटे की रोटियां मिलेंगी। अगर शाकाहारी हैं तो दाल रोटी और चावल। अगर वाकई अब एक गांव में रहना चाहते हैं तो उस गांव में रह भी सकते हैं

उस टाइग़र के साथ होली का मज़ा!

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इस होली में जिम कार्बेट हो आएं
शंभूनाथ शुक्ल
होली की छुट्टियों में शोर-शराबे और हुड़दंग से दूर रहने का एक उपाय जिम कार्बेट घूम आना है। वाया राम नगर जिम कार्बेट जाने से वैसा ही हुड़दंग मिलेगा जैसा दिल्ली या यूपी के किसी शहर में होगा। बेहतर रास्ता है वाया मेरठ, बहसूमा, बिजनौर, धामपुर, अफजलगढ़ से होते हुए कालागढ़ गेट से एंट्री लेना। कालागढ़ गेट के रास्ते से जिम कार्बेट जाने पर बाघ के मिल जाने की पूरी संभावना रहती है। एक और रास्ता वाया अमानगढ़ होकर जाने का है। दोनों ही रास्ते जनरव से दूर शांत और घने जंगलों से गुजरते हैं। कालागढ़ तक की यात्रा एक ही दिन में पूरी की जा सकती है। रात कालागढ़ में रुक सकते हैं अथवा अमानगढ़ के फारेस्ट रेस्ट हाउस में। अमानगढ़ में यूपी फारेस्ट के पास हैं इसलिए अमूमन खाली मिलता है। पर यूपी गवर्नमेंट की तरह यहां का रखरखाव का तो बस भगवान ही मालिक है। रात को बिजली आती नहीं, बेड हैं पर कंबल शायद ही मिलें और रसोई में गैस नहीं मिलेगी। इसलिए जाएं तो अपने खाने-पीने का सामान लेकर जाएं या फिर रसोई गैस का सिलेंडर और कम से कम २० लीटर डीजल ले जाएं ताकि रात को जेनसेट चला सकें। इसके अलावा दूध, आटा, बे्रड, सब्जियां और दालें भी ले जाएं। वहां का केयरटेकर बस खाना बना देगा। हो सके तो शाम को अमानगढ़ के रेंजर से अनुरोध कर अपने साथ फारेस्ट गार्ड लेकर कांबिंग के लिए निकलें। यहां से आप जिम कार्बेट में प्रवेश कर सकते हैं तथा अपनी गाड़ी भी ले जा सकते हैं। जिम कार्बेट की चौकी से पहले ही बाघ अलस्सुबह या धुंधलके में मिल ही जाते हैं। पर ध्यान रखें कि उन्हें छेड़ा न जाए। फोटोग्राफी नहीं करें और चुपचाप उनका अनुगमन करते रहें। मैने असंख्य दफे यहां बाघों को देखा है। बाकी हाथी, टस्कर या बारासिंघा और हरिण तो बहुत कामन हैं। अमानगढ़ फारेस्ट रेस्ट हाउस के अंदर पुस्तकों का अमूल्य भंडार है। जिम कार्बेट की जीवनी व उसके द्वारा लिखी गई भारतीय जंगलों के तमाम अनजाने किस्सों से भरी किताबें यहां मिल जाएंगी।
कालागढ़ में यूपी और उत्तराखंड दोनों के फारेस्ट डिपार्टमेंट के रेस्ट हाउसेज हैं। चूंकि एशिया का सबसे बड़ा मिट्टी का बांध यहीं हैं इसलिए यह इलाका पूरी तरह सुरक्षा की दृष्टि से चाक चौबंद है। यहां का बांध और हाइडिल का पावर हाउस जरूर देखिए। खासकर ५७४ सीढियां उतर कर बांध के नीचे जाकर हवा के दबाव को महसूस करना। कालागढ़ के इस बांध से करीब आठ किमी ऊपर मिट्टी का एक और सैडलर डैम है। यहां जानने के लिए फारेस्ट विभाग से अनुमति जरूरी है। आमतौर हाथियों के डर के कारण अनुमति मिलती नहीं है। लेकिन यहां जाकर सैडलर डैम देखना एक असीम आनंद प्रदान करता है। दोनों ही जगह मोबाइल के इस्तेमाल पर पाबंदी है। फोटोग्राफ तो कतई नहीं कर सकते और अगर मोबाइल आपने निकाला भी तो सुरक्षा जवान आपका मोबाइल छीनकर उसे बांध के पानी में फेक भी सकते हैं। कालागढ़ के फारेस्ट रेस्ट हाउस में रात रुक सकते हैं। और सुबह जिम कार्बेट के लिए निकल सकते हैं। यहां के फारेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट भी है वहां के हास्टल में आपको भोजन मिल जाएगा।
इसके अलावा अफजलगढ़ में द्वारिकेश की चीनी मिल है और उनका रेस्ट हाउस तो लाजवाब है। यहां के अधिकारी गण अत्यंत उदार और उनका रवैया भी दोस्ताना रहता है। आप यहां भी रुक सकते हैं। यहां पर भोजन की व्यवस्था अति उत्तम है।
होली के मौके पर आपको जिम कार्बेट के अंदर कहीं भी ठहरने की जगह नहीं मिलेगी। पर देहरादून स्थित चीफ फारेस्ट कन्जरवेटर के यहां एक अर्जी डालकर आप मलानी में ठहरने की अनुमति मांगिए। मलानी का फारेस्ट रेस्ट हाउस कोर एरिया में है। वहां न बिजली है न आप अकेले फारेस्ट रेस्ट हाउस के परिसर से बाहर निकल सकते हैं। जब निकलेंगे गार्ड को लेकर जाना होगा। यहां भालू, काकड़, अजगर से लेकर बाघ और हाथी खूब हैं। जब भी काकड़ (बार्किंग डॉग) काल करेे तो समझ जाइए कि आ गया बाघ। हां पानी की घोर कमी है। इसलिए आप पीने का पानी तो साथ लेकर जाइए ही साथ में इस्तेमाल करने हेतु भी पानी ले जाइए। यहां का केयर टेकर आप के लिए किचेन खाना बना देगा पर आटा, दाल, चावल, सब्जी, मसाले आदि सब लेकर जाइए। यहां जेनसेट नहीं चलेगा और न ही रात को रोशनी की व्यवस्था होगी। आप अपने साथ टॉर्च लेकर जाइए ताकि रात को अगर बाथरूम तक जाना हो तो रोशनी तो रहेगी वर्ना कब कौन सा अजगर मुंह फाड़े टायलेट में आ जाए पता नहीं। बिच्छू भी यहां बहुत हैं इसलिए बिस्तर पर जाते समय बिस्तर को एक बार झाड़ जरूर लेें और अगर जूते पहनने हों तो जूते एक बार ठोक लें।
शाम से ही मलानी में आसमान तारों से भर जाता है और इतने तारे गगन में निकल आते हैं जितने पता नहीं होते हैं भी कि नहीं। रात कभी-कभी वराण्डे पर आकर अगर आप अपने गेस्ट हाउस के चारों तरफ लगी बाड़ पर नजर डालेंगे तो असंख्य जलते हुए अंगारे की तरह कुछ दिखेगा। ये वे जानवर होते हैं जो कुछ खाना पाने की उम्मीद से बाड़ की तरफ आ जाते हैं लेकिन खबरदार कभी भी बाड़ के पास जाने की कोशिश न करना वर्ना कोई भी जानवर आपको दबोच तो सकता ही है साथ में करंट का भी खतरा है क्योंकि दिन में यहां जो सोलर एनर्जी एकत्र की जाती है रात को उसे बाड़ के तारों में बहा दिया जाता है। यहां पर गम बूट पहन कर चलें क्योंकि सांप यहां बहुत हैं। अजगर के साथ ही यहां करेैत सांप का भी पूरा खतरा है। सुबह कभी भी उठकर सीधे वराण्डे में नहीं आएं क्योंकि अक्सर कोई न कोई तेंदुआ बाड़ फांदकर अंदर आ जाता है और आपके कमरे की छत पर बैठ जाएगा। वराण्डे में कोई आया नहीं कि झपट्टा मारकर आपके शरीर का कोई भी अंग आपसे झपट ले जाएगा।
खतरे बहुत हैं पर मेरा मानना है कि जाएं जरूर। जिम कार्बेट में इन निर्दोष प्राणियों के साथ होली खेलने का मजा ही अलग है। पर बस उन्हें तंग नहीं करें। ध्यान रखिए कि यह उनका घर है आपका हुड़ंदगी मोहल्ला नहीं। आप जब जिम कार्बेट में जाएं तो एक अतिथि की तरह ही व्यवहार करें तो ये पशु भी आपकी मेहमाननवाजी करेंगे। और अपने करतबों से आपका दिल मोह लेंगे।
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पत्रकारिता के संस्मरण शेष पार्ट

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पत्रकारिता के संस्मरण- चार (तीसरे अंक से आगे)
जैसा मैं बोलूं वैसा तू लिख!
शंभूनाथ शुक्ल
२८ मई सन् १९८३ दिन के ११ बज रहे थे। दिल्ली के बहादुरशाह जफर मार्ग स्थित एक्सप्रेस बिल्डिंग की बेसमेंट में कई लोग एक कड़ी परीक्षा से रूबरू थे। कोई ५० से ऊपर सवालों वाला परचा सामने था। इसी में एक सवाल था कि इस पैरे की सबिंग करिए। पैरे में लिखा था- जयपुर के पास एक ढाणी में ……….। अब हमने कस्बा सुना था, गांव सुना था, पुरवा, खेड़ा और पिंड भी जानते थे पर ढाणी पहली बार सुन रहे थे। अपने आगे बैठे राजीव शुक्ला की कुर्सी को मैने पीछे से धक्का दिया और कहा राजीव ये ढाणी क्या है? राजीव ने जवाब दिया कि प्रभाष जोशी से पूछो। तभी अकस्मात एक सौम्य से सज्जन आँखों पर मोटा चश्मा लगाए प्रकट हुए और पास आकर बोले- मैं प्रभाष जोशी हूं। मैं हड़बड़ा कर अपनी सीट से खड़ा हो गया और कहा- भाई साहब मैं शंभूनाथ कानपुर से आया हूं। वे बोले- पता है। और फिर ढाणी के मायने बताए लेकिन मैं इंडियन एक्सप्रेस के दिल्ली संस्करण के तत्कालीन रेजीडेंट एडिटर प्रभाष जोशी की सादगी को चकित सा देखता रहा। वे चले भी गए लेकिन मैं ढाणी का अर्थ समझ नहीं सका। और जस का तस ढाणी ही लिख के वापस कानपुर आ गया। १५ दिन भी नहीं बीते होंगे कि इंटरव्यू का तार आ गया। अबकी कुछ लोग पिछले वाले दिखे और सब के सब घबराए से थे क्योंकि जो लोग इंटरव्यू लेने आए थे वे सब अंग्रेजी के महारथी पत्रकार थे। जार्ज वर्गीज, लक्ष्मीकांत जैन, राजगोपाल और कोई देसाई तथा खुद प्रभाष जोशी। सब डर रहे थे कि कैसे इनके सामने अपनी बात कह पाएंगे। राजीव का कहना था कि चला जाए, कोई फायदा नहीं हम इस इंटरव्यू को पास नहीं कर पाएंगे। लेकिन प्रभाष जोशी के पीए रामबाबू ने कहा कि आने-जाने का किराया लेना है तो इंटरव्यू तो फेस करना ही पड़ेगा।
अपना नंबर आया। भीतर घुसा तो वहां का माहौल तनिक भी बोझिल या अंग्रेजीदां नहीं लगा। मध्य उत्तर प्रदेश के मेरे शोध पर ही सवाल पूछे गए और सबने हिंदी में ही पूछे। मैने राहत की सांस ली और लौट आया। एक दिन प्रभाष जी का पत्र आया कि आपका चयन हो गया है और २० जुलाई तक इंडियन एक्सप्रेस के शीघ्र निकलने वाले हिंदी अखबार जनसत्ता में उप संपादक के पद पर आकर ज्वाइन कर लें। प्रभाष जी का यह पत्र अविस्मरणीय था और आज भी मेरे पास सुरक्षित है। पत्र की भाषा में इतनी रवानगी और ताजगी थी कि बस उड़कर दिल्ली चला जाऊँ।
१९ जुलाई को दैनिक जागरण के प्रबंध संपादक दिवंगत पूर्णचंद्र गुप्त को त्यागपत्र लिखा और रजिस्टर्ड डाक से भेज दिया। तथा २० की सुबह मैं गोमती एक्सप्रेस पकड़कर दिल्ली आ गया। नई दिल्ली स्टेशन पर ही राजीव शुक्ला मिल गए। वे भी उसी ट्रेन से आए थे। हम वहां से आटो पकड़कर पहुंच गए एक्सप्रेस बिल्डंग। वहां पर प्रभाष जी ने बताया कि अभी आफिस बन नहीं पाया है इसलिए अब एक अगस्त को आना। हम सन्न रह गए। मैं तो बाकायदा इस्तीफा देकर आया था। अजीब संकट था अगर अखबार नहीं निकाला गया तो पुरानी नौकरी भी गई। राजीव शुक्ला ने कहा कि इस्तीफा देना ही नहीं था। मैं तो निगम साहब को बताकर आया हूं कि अगर नहीं आया तो इस्तीफा बाद में भेज दूंगा। तुम तो इस्तीफा दे आए हो और अब १९ दिन के काम का पैसा भी नहीं मिलेगा। अब पछतावा होने लगा लेकिन हो भी क्या सकता था। हम उस रोज सरदार पटेल रोड स्थित यूपी भवन में रुके। वह राजीव ने ही कुछ जुगाड़ कर बुक कराया था। तब यूपी भवन नया-नया बना था। गजब की बिल्डिंग थी। शाम को अपना-अपना सामान संतोष तिवारी के यहां रखा और अगले रोज पुरी एक्सप्रेस पकड़कर कानपुर पहुंच गए। पिता जी ने कह दिया कि अब भुगतो तुम दरअसल कुछ कर ही नहीं सकते। घर में किसी ने भी मेरे पछतावे को नहीं महसूस किया और सब ने मुझसे मुंह फुला लिया।
ये दस दिन किस तरह कटे मुझे ही मालूम है। पहली बार पता चला कि वाकई दस दिन मेंं दुनिया उलट-पुलट हो जाती है। लेकिन इस बार एक अगस्त को नहीं दो अगस्त को मैं आया। इस बार दफ्तर सुसज्जित था। हमारे बैठने की व्यवस्था हो गई थी। पर बैठना निठल्ला ही था क्योंकि अखबार कब निकलेगा, यह किसी को नहीं पता था।
दिल्ली में ठहरना और भी कठिन था। एकाध दिन तो संतोष तिवारी के यहां रुक सकते थे लेकिन राजीव ने मद्रास होटल में रहने की व्यवस्था की और हम पूरा हफ्ता वहीं रुके। पर कनाट प्लेस के इस होटल में तो दूर आसपास भी कहीं अरहर की दाल की व्यवस्था नहीं थी ऊपर से अखबार में दिन भर प्रभाष जी का भाषण सुनना पड़ता था और उनकी अटपटी हिंदी भी। जनसत्ता में जिन लोगों ने ज्वाइन किया था उनमें हम यानी मैं और राजीव ही सबसे बडे और सर्वाधिक प्रसार वाले अखबार से आए थे। ऐसे में प्रभाष जी की चोखी हिंदी सुनना बहुत कष्टकर लगता था। वे हम को अपन बोलते और तमाम ऐसे शब्द भी बोलते जो हमारे लिए असहनीय थे। मसलन वे चौधरी को चोधरी बोलते और ऊपर से तुर्रा यह कि कहते तो वह जिस तरह मैं बोलता हूं उस तरह तू लिख। वे हर बार मालवा की बोली को ही हिंदी का उत्तम नमूना बताते। अब प्रभाष जी की यह अहमन्यता हमें बहुत अखरती। हम जिस बोली वाले इलाके से आए थे वहां हिंदी सबसे अच्छी बोली जाने का हमें गुरूर था और इस बात पर भी कि हमारी बोली भी साहित्यिक रूप से सबसे समृद्ध है। भले उत्तर प्रदेश में भोजपुरी, बुंदेली और बृज भी बोली जाती हो लेकिन रामचरित मानस और पद्मावत जैसे साहित्यिक ग्रंथ हमारी ही बोली में लिखे गए। इसलिए हमने तय कर लिया कि हम प्रभाष जी की इस मालवी बोली के अर्दब में नहीं आने वाले अत अब हम बस शनिवार को कानपुर चले जाएंगे और लौटेंगे नहीं। हम शाम को वहां से निकल लिए और फिर सोमवार को लौटे ही नहीं। एक हफ्ते बाद प्रभाष जी ने अपने किसी परिचित के माध्यम से हम तक सूचना पहुंचाई कि हम क्यों नहीं आ रहे हैं? तब पता चला कि कानपुर में प्रभाष जी की ससुराल है। हम फिर वापस दिल्ली आए और प्रभाष जी से मिले। उन्होंने पूछा कि क्या परेशानी है? हमने कहा कि यहां अरहर की दाल नहीं मिलती। बोले ठीक है मैं इंतजाम करवा दूंगा और कुछ? अब क्या कहते कि भाई साहब हमें आपकी बोली नहीं अच्छी लगती। सो चुप साध गए। शाम को प्रभाष जी ने बुलाया और कहा कि राजघाट के गेस्ट हाउस में चले जाओ। वहीं कमरा मिल जाएगा और खाने में अरहर की दाल भी मिलेगी। यह तो लाजवाब व्यवस्था थी। कमरे के लिए हमें पांच रुपये फी बेड देना पड़ता और साढ़े तीन रुपये में जो भोजन मिलता उसमें अरहर की दाल, रोटी, चावल, सब्जी और एक मीठा भी होता। हम करीब महीने भर वहीं रहे। बल्कि हमारी इच्छा तो वहीं रहने की थी। क्योंकि जो भी नई भरती आती हम उसे वहीं रुकवा लेते। पहले तो सत्यप्रकाश त्रिपाठी आए फिर परमानंद पांडेय। यहां से दफ्तर भी इतना करीब था कि हम टहलते हुए चले जाते। लेकिन एक दिन हमें कह दिया गया कि अब खाली करना पड़ेगा। सत्यप्रकाश और परमानंद चले गए माडल टाउन और मैं व राजीव आ गए लोदी कालोनी। जहां हमारे एक सहभागी कुमार आनंद टिकमाणी भी थे। लेकिन तीन बेड रूम का वह आलीशान फ्लैट धीरे-धीरे धर्मशाला बन गए। उसमें कभी फक्कड़ की तरह आलोक तोमर तो  कभी-कभी उमेश जोशी आ धमकते। एक दिन हमने इस धर्मशाला को छोड़ लेने का मन बना लिया।
(अब आगे का हिस्सा कल के पढि़एगा।)

पत्रकारिता के संस्मरण- पांच (चौथे हिस्से के बाद का भाग)
जिसने भी बाजार को पकड़ा वही मीर हुआ
शंभूनाथ शुक्ल
१९८० के दशक को पत्रकारिता का स्वर्ण काल कहा जा सकता है। दशक की शुरुआत में ही इंदिरा गांधी का पुन: राज्यारोहण हो चुका था और गैर कांग्रेसी सरकारों से लोगों का मोहभंग होने लगा था। लेकिन इस बार सदैव से सोवियत संघ के पाले में रहीं इंदिरा गांधी का झुकाव अमेरिका की तरफ बढ़ चला था और संजय गांधी राजनीति में सबसे ताकतवर इंसान थे। संजय के चलते दक्षिणपंथी राजनीति अचानक इंदिरा गांधी के प्रति उदार हो उठी थी। लेकिन संजय गांधी भरोसेमंद नहीं थे। वे एक आक्रामक और तत्काल फल चाहने वाले राजनेता थे। तथा हर तरह का जोखिम उठाने को तत्पर। वे कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक ब्राह्मण, तुर्क व दलित के समीकरण को ध्वस्त करते चल रहे थे। इमरजेंसी के दौरान दिल्ली के तुर्कमान गेट की मुस्लिम आबादी को जिस तरह उन्होंने उजाड़ डाला था उससे आरएसएस समर्थक तबका तो खुश था लेकिन उदार और लेफ्ट तबका कन्फ्यूज्ड। संजय ने तेजी दिखाई और राज्यों की सरकारें ताबड़तोड़ गिरानी शुरू कर दीं। उनके पहले निशाने पर हिंदी राज्य रहे। यूपी, एमपी, राजस्थान, बिहार और हरियाणा में सरकारें गिराई गईं और वहां फिर से कांग्रेसी सरकारें फिर आ गईं। पर इस बार मुख्यमंत्री भी कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक से नहीं बने। यूपी में एक पूर्व राजा वीपी सिंह इसी तरह मध्यप्रदेश में अर्जुन सिंह, राजस्थान में पहले जगन्नाथ पहाडिय़ा को बनाया गया लेकिन जल्द ही उन्हें अपदस्थ कर शिवचरण माथुर नए मुख्यमंत्री बने। हरियाणा में भजन लाल को बनाया गया। पर उसी साल २३ जून को एक छोटा प्लेन उड़ाते वक्त दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई।
कांग्रेस के सारे प्रांतों के मुख्यमंत्री नाकारा साबित हुए। वजह यह थी कि हिंदी राज्यों में एक नई राजनीति पग रही थी और वह थी मध्यवर्ती और पिछड़ी कही जाने वाली जातियों को नव उभार। दूसरी तरफ पंजाब और कश्मीर में आतंकवाद पनपने लगा था। पंजाब में सिख आतंकवाद इस तरह चरम पर था कि वहां से हिंदू पलायन करने लगे थे और कश्मीर से पंडित भगाए जाने लगे। इंदिरा गांधी का सोवियत लाबी से अलग होना उन्हें अनवरत कमजोर कर रहा था। देश में पूंजीवाद एक नए रूप में उभर रहा था जो कोटा कंट्रोल पद्धति से भिन्न था और पूंजीपति लगातार बेलगाम होते जा रहे थे। ट्रेड यूनियन्स कमजोर पड़ती जा रही थीं तथा आजादी के बाद से राजनीति व अर्थनीति के बाबत बनाई गई सारी मर्यादाएं तार-तार हो रही थीं। यह वह समय था कि जिसे जो कुछ बेचना हो बाजार में आए और बेचे। मीडिया एक प्रोडक्ट के रूप में सामने आ रहा था। उसकी सारी आक्रामकता और खबरें अब एक प्रोडक्ट को बाजार में लांच करने की हमलावर शैली जैसी थीं। इंडियन एक्सप्रेस में अरुण शौरी ने आकर देश के उस बाजार को पकड़ा जो अभी तक अछूता था। पहली बार भागलपुर आंख फोड़ो कांड को कवर कराया गया जहां कुछ सवर्ण पुलिस अफसरों ने पिछड़ी जाति के अपराधियों की आंखें तेजाब डालकर या सूजा घुसेड़कर फोड़ डाली थीं। इसी तरह उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अंतुले के कारनामों पर हमला बोला। इसी दौरान हुई मीनाक्षीपुरम की वह घटना जिसने सारे हिंदू समाज को स्तब्ध कर दिया। मीनाक्षी पुरम के दलितों के एक बड़े हिस्से ने धर्म  परिवर्तन कर इस्लाम अपना लिया। पर हिंदी के अखबार इन सब खबरों से अनजान थे और अक्सर अरुण शौरी की इंडियन एक्सप्रेस में छपी रपटों को हिंदी में अनुवाद कर छापा करते थे।
ऐसे समय में इंडियन एक्सप्रेस समूह ने हिंदी का नया अखबार निकाला जनसत्ता। तब तक दिल्ली में दो ही हिंदी के अखबार अपनी पैठ बनाए थे। टाइम्स आफ इंडिया समूह का नवभारत टाइम्स और हिंदुस्तान टाइम्स का हिंदी हिंदुस्तान। इसमें से हिंदुस्तान में तो रंचमात्र पत्रकारीय स्पंदन नहीं था। उसके संपादक विनोदकुमार मिश्र की स्थिति तो यह भी नहीं थी कि वे किसी उप संपादक अथवा किसी रिपोर्टर तक को भरती कर सकें। सारी भरतियां उसके कार्यकारी निदेशक नरेश मोहन करते। संपादक महज एक दिखाऊ पोस्ट थी। नवभारत टाइम्स में स्थिति कुछ अलग थी। उसके प्रबंधन ने अस्सी के बदलाव को पहचान लिया था और प्रबंधन के अपने कृपापात्र संपादकों की फौज हटाकर पहली दफे एक तेज तर्राक पत्रकार राजेंद्र माथुर को संपादक बनाया गया। राजेंद्र माथुर मूलत: आगरा के थे और इंदौर जाकर बस गए थे। वे वहां पहले अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे थे और फिर नई दुनिया के स्थानीय संपादक। राजेंद्र माथुर ने आते ही नवभारत टाइम्स का कलेवर बदल दिया और माथुर साहब ने उसे पाठकों से जोड़ा। उनके संपादकीय के लोग इस कदर दीवाने थे कि नवभारत टाइम्स की खबरों की बजाय उसके लेख पढ़े जाने लगे और माथुर साहब के संपादकीय तथा लेख। माथुर साहब की राजनीतिक समझ नेहरू जमाने की थी और उनकी मान्यताएं भी। पत्रकारिता में पुराने पर नवीन दिखने वाली इस मान्यता को खूब स्वीकार्यता मिली। पर जनसत्ता ने तो आते ही तहलका मचा दिया।
जनसत्ता की इस सफलता के दो कारण थे। एक तो इसके संपादक प्रभाष जी ने बाजार को खूब समझा और दूसरे हिंदी पत्रकारिता की सड़ी-गली आर्य समाजी नैतिकता से बोली और भाषा को निकाला। उन्होंने कठिन और आर्यसमाजी हिंदी को दिल्ली और पास के हिंदी राज्यों के अनुरूप सहज और उर्दूनुमा हिंदी को मानक बनाया। बाजार के अनुरूप उन्होंने उस समय पंजाब में लगी आग को मुद्दा बनाया और वहां से भाग रहे हिंदुओं के लिए जनसत्ता संबल बना तथा यूपी और बिहार में हिंदी को संकीर्ण बनाने वाले मानक तोड़ डाले। नतीजा यह हुआ कि हर वह व्यक्ति जनसत्ता का मुरीद हो गया जो अंदर से नए बाजारवाद का समर्थक था तथा उसके अंदर जेपी की समग्र क्रांति को लेकर कहीं न कहीं एक नरम भाव था। बाजार के इस नए लोकप्रिय और तथाकथित जनप्रियता का यह एक नया पैमाना था।
(बाकी का हिस्सा अब कल)

पत्रकारिता के संस्मरण- पार्ट छह
हर सिख क्षोभ और शोक में डूबा था
शंभूनाथ शुक्ल
(छठा पार्ट नियमत: मुझे ११ फरवरी को लिखना था पर मेरे मेसेज बाक्स और मोबाइल पर इन संस्मरणों को पढऩे के लिए इतने काल आ रहे हैं कि कुछ ने कहा कि जितना जल्दी हो आगे का हिस्सा पढ़ाइए। इसी कारण इसे आज ही दे रहा हूं। पर अभी ये संस्मरण चलते ही रहेंगे।)
साल १९८४। वे जून के तपते हुए दिन थे। अमृतसर का मौसम सर्दी में जितना जमा देने वाला होता है गर्मी में उतना ही गरम। लू के थपेड़ों के चलते दूकानें सूनी थीं और पीतल के बड़े-बड़े कलसों में दूध ले जाने वाले दूधिए सिख अपनी साइकिलों से बाघा बार्डर की तरफ बढ़े चले जा रहे थे। रास्ते में सेना, बीएसएफ और सीआरपी का लश्कर पूरी तरह से चाक-चौबंद होकर बढ़ रहा था। सीमा का इलाका, इसे उन्होंने एक सामान्य घटना ही समझा। लेकिन दोपहर १२.४० तक इन सेना के आदेश पर अर्धसैनिक बलों ने गुरु रामदास लंगर पर फायरिंग शुरू कर दी। आठ लोग मारे गए तो पता चला कि यहां हरमंदिर साहब में आपरेशन ब्लू स्टार आपरेशन शुरू हो चुका है। दिल्ली का माहौल भी गर्म हो चला था। किसी की समझ में नहीं आया कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने यह कौन सा कदम उठा लिया। कनाट प्लेस में सिखों की दूकानें धड़ाधड़ बंद हो गईं और राजधानी के गुरद्वारा सीसगंज समेत सभी ऐतिहासिक गुरुद्वारों में मुर्दनी छा गई। हर सिख शोक और क्षोभ में डूबा था। सिखी का इतिहास वीरता और उदारता का रहा है। उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या हो गया।
लगभग एक हफ्ते तक आपरेशन चला और अकाल तख्त पूरी तरह कब्जा हो जाने के बाद ही आपरेशन खत्म हुआ। कुछ लोगों की नजर में प्रधानमंत्री का यह कदम बेहद वीरतापूर्ण था क्योंकि सिख खाड़कुओं पर कब्जा पाने का यही अकेला और अंतिम इलाज था। लेकिन सिख इसे क्रूर सामंंती कार्रवाई मान रहे थे। उन्हें लगता था कि वे मानों एकाएक १७ वीं सदी में भेज दिए गए। इंदिरा गांधी की इस कार्रवाई का चौधरी चरण सिंह समेत सारे आर्य समाजी राजनेताओं ने समर्थन किया था। इतनी बड़ी घटना हो जाने के बाद भी सिखों के अलावा किसी भी धार्मिक समुदाय के नेता अथवा विपक्ष के राजनेता ने कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई ऐसा लग रहा था कि वे सभी भी ऐसे ही किसी कदम की अपेक्षा कर रहे थे। लेकिन अंदर ही अंदर सिख समुदाय इससे बुरी तरह आहत हुआ और देश की आंतरिक सुरक्षा देख रही एजेंसियां इसे समझ नहीं पाईं। हिंदी के सारे अखबार भी इस आग में घी ही डाल रहे थे। एक भी अखबार ने इस घटना का विरोध नहीं किया। ऐसे मौके पर प्रभाष जोशी ने सिखों के मर्म को समझा और उन्होंने इस कांड का विरोध किया तथा सिखों के क्षोभ से भरे लेख छापे गए।
ऐसे में जनसत्ता अचानक सिखों का अखबार कहा जाने लगा और यह माना गया कि व्यवस्था व सरकार का विरोध करने की क्षमता सिर्फ जनसत्ता में ही है। उधर जनसत्ता  सिखोंं का प्रिय अखबार बन गया और जनसत्ता खरीदने के लिए पंजाब के दूर दराज के गांवों में सिखों ने हिंदी सीखी। अपने जन्म के कुल छह महीनों के भीतर ही इस  अखबार की प्रसार संख्या ढाई लाख पार कर चुकी थी। प्रभाष जी के लेख पढऩे के लिए लोग इंतजार करते और दिल्ली के आसपास का सारा इलाका जनसत्ता की बढ़त के बोझ के तले दबा था। दिल्ली से छपने वाला जनसत्ता बीकानेर और जैसलमेर के रेतीले इलाकों में तीसरे दिन पहुंचता और अमृतसर के गांवों में भी लेकिन लोगबाग बस अड्डों पर इंतजार करते या सांडनियों का जिनके जरिए जनसत्ता वहां पहुंचाया जाता।
पर अखबार सिर्फ संपादकीय विभाग के बूते नहीं चलता। वह मार्केट के बूते चलता है और मार्केट जनसत्ता का विरोधी होता चला गया। इसके संपादक प्रभाष जोशी को अखबार को बढ़ाने में तो सफल रहे लेकिन रेवेन्यू उगाहने में नहीं। यह सब १९८४ से ही साफ होने लगा था। इस वजह से इसकी प्रसार संख्या घटाई जाने लगी। यह शायद पहला अखबार था जिसके संपादक प्रभाष जोशी ने पहले पेज पर अपनी बात लिखी जिसमें कहा कि पाठक गण कृपया जनसत्ता मिल बांट कर पढ़ें क्योंकि अब और ज्यादा इसे छाप सकने की हमारे प्रबंधन की क्षमता नहीं है।
(जारी)

पत्रकारिता के संस्मरण (पार्ट सात)
कितनी बार चौरासी!
शंभूनाथ शुक्ल
मैं कई बार सोचता हूं कि हिंसा का जवाब हिंसा नहीं होती। हम किसी को भी प्यार और दुलार से समझा सकते हैं लेकिन इसके लिए धैर्य चाहिए, साहस चाहिए और निडरता भी। १९८४ का जवाब १९८४ और फिर १९८४ नहीं था। लेकिन तीन बार यह दुर्घटना घटी। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके ही दो अंगरक्षकों ने आपरेशन ब्लू स्टार के पांच महीने के भीतर ही मार दिया। उस इंदिरा गांधी को जिनके बारे में हम रोज अखबारों और रेडियो पर प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी उवाच इतनी बार सुन चुके थे कि हमें कभी यह लगा ही नहीं कि इंदिरा गांधी को जाना भी पड़ सकता है। एक सर्वशक्तिशाली महिला जिसने राजाओं के ताज छीन लिए और पूंजीपतियों से उनके बैंक। वह महिला जिसके बारे में कहा जाता था कि इंदिरा बहिन का है राजरानी, प्यासा न पावै हिन कहूं पानी। हम इतनी बार सुन चुके थे कि ३१ अक्टूबर को सुबह ११ बजे जब मैं एक्सप्रेस बिल्डिंग पहुंंचा और यह बताया गया कि इंदिरा गांधी को किसी ने गोली मार दी है तो कुछ समझ ही नहीं आया। ऐसा कैसे हो सकता है? छठे दरजे में पढ़ता था जब इंदिरा जी प्रधानमंत्री बनी थीं और सारी पढ़ाई व आवारगी पूरी कर नौकरी भी करने लगा लेकिन कभी यह लगा ही नहीं कि इंदिरा जी इस देश की मायने नहीं हैं। भले बीच में मोरार जी देसाई तथा चरण सिंह प्रधानमंत्री रहे हों पर हरदम लगा यही कि अरे ये तो पिन्नी टाइप के नेता हैं जिनकी इंदिरा गांधी को देखते ही फूंक सरक जाया करती थी। चरण सिंह जब गृह मंत्री थे तो इंदिरा जी को गिरफ्तार करने की योजना बनाई। इंदिरा जी जाकर एक पुलिया पर धरने पर बैठ गईं तो खुद यही नेता उन्हें मनाने गए कि बहिन जी आप घर जाओ। कोई आपको नहीं पकड़ेगा। एक ऐसी महिला को कोई मार सकता है भला।
लेकिन वह अफवाह नहीं थी और सच था। बाद में पता चला कि उन्हें गोली मारने वाले उनके सिख अंगरक्षक बेअंत सिंह और सतवंत सिंह थे। मजे की बात कि इन्हें इंदिरा जी के अंगरक्षक पद से हटाने का दबाव था पर इंदिरा जी ने ऐसा नहीं होने दिया। कुछ ही देर बाद चारों ओर अंधेरा छा गया। अक्टूबर की धूप के बावजूद सूरज दोपहर में ही ढल गया। बताया गया कि जून में हुए आपरेशन ब्लू स्टार का बदला था लेकिन इसके बाद जो कुछ हुआ वह सोचा तक नहीं गया था। एक पूरी कौम को निशाना बनाकर हमला किया गया। इस खूरेंजी में हिंदू मुसलमान दोनों ही बराबर के शरीक थे। यहां इंदिरा जी की हत्या का बदला कम लूट की बहुतायत थी। सिख एक मेहनतकश संपन्न कौम रही है। उनके पास पैसा था और उस जमाने में ऐसी-ऐसी चीजें लूटी गईं जो आम मध्यवर्ग कल्पना नहीं कर सकता था। पूरी दिल्ली समेत सारे हिंदी भाषी इलाकों मेें सिखों के घरों को लूटा जाने लगा। और बूढ़े व बच्चों समेत सभी मर्दों की हत्या का खूनी खेल शुरू हो गया। यह कोई दंगा नहीं था बल्कि हिंदुओं और मुसलमानों, खासकर हिंदी भाषी इलाकों के, की  कुंठा थी। आलसी और मूर्ख लोगों का हुजूम सिखों को लूट रहा था और जो लोग कुछ कर सकते थे वह इसे निस्सहाय से देख रहे थे। लाशों की सडऩ से दिल्ली गंधा रही थी। अखबार चुप थे लेकिन जनसत्ता नहीं। आलोक तोमर ने ऐसे-ऐसे तमाम घर ढूंढ़ निकाले जहां सिर्फ विधवाएं बची थीं। नौनिहाल शिशु बचे थे या सिर्फ खंडहर। ऐसा लगता था कि राजधानी में सिख कौम खत्म कर दी गई है। एक सभ्य देश की राजधानी का यह आलम दुखद था।
इंदिरा जी के बेटे राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाया गया जो अभी कुछ साल पहले तक  सिर्फ जहाज उड़ाया करते थे। इंदिरा गांधी ने अपने छोटे बेटे संजय की आकस्मिक मौत के बाद उन्हें सहारे के लिए अपने साथ किया हुआ था। तब कैबिनेट में वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी वरिष्ठतम थे लेकिन उन्हें मौका नहीं देकर राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनवा दिया। राजीव घाघ राजनेता नहीं थे। भोलाभाला चेहरा और राजनीति के चौसर में एकदम सिफर। राजीव प्रधानमंत्री बने तो कारपोरेट हाउसेज ने उन्हें हाथोंहाथ लिया था। यहां तक कि इंडियन एक्सप्रेस समूह ने भी। राजीव गांधी के विरुद्ध तब कोई संपादकीय नहीं छप सकता था। और जनसत्ता में जब ऐसा ही एक संपादकीय उस समय के एक सहायक संपादक, जो सर्वोदयी थे, ने लिखा तो उसे रोक लिया गया। यह उन्हें बहुत अपमानजनक लगा और उन्होंने इस्तीफा दे दिया तथा दफ्तर आना बंद कर दिया। लेकिन यह प्रभाष जी का बड़प्पन था कि उन संपादक के घर गए और उनका इस्तीफा वापस करवा कर ही मानें।
(जारी)

पत्रकारिता के संस्मरण (पार्ट आठ)
धर्म कोई अस्मिता नहीं है
शंभूनाथ शुक्ल
धार्मिक आधार पर कोई राष्ट्र नहीं बना करते और बनेंगे तो स्थायी नहीं रह सकते। इसीलिए पाकिस्तान के विपरीत भारत को हमारे नेताओं ने एक सेकुलर, उदार और हर गरीब-अमीर को साथ लेकर चलने वाला लोकतंात्रिक राष्ट्र बनाया। इसके संविधान में धार्मिक आधार पर कोई भेदभाव नहीं करने तथा कमजोर वर्गों को आगे लाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। इसीलिए जब भी कभी धार्मिक आधार पर अलग राष्ट्र बनने की मांग उठी भारत के बहुसंख्य लोगों ने नकार दिया। अगर इस्लाम एक राष्ट्र होता तो पूर्वी पाकिस्तान बांग्ला देश नहीं बनता और न ही पाकिस्तान के अंदर पख्तूनों को अलग-थलग होना पड़ता। पैन इस्लाम का नारा कभी सफल नहीं हो सका। इंडोनेशिया और मलयेशिया का सांस्कृतिक धरातल वह नहीं है जो पाकिस्तान का है अथवा खाड़ी के मुल्कों का। और न ही इनमें परस्पर कोई एकता है। जातीय अस्मिता ही असल अस्मिता है। हम हिंदी भाषी पाकिस्तान को अपना मान लेंगे और पश्चिम बंगाल के लोग बांग्लादेसी लोगों से अपनापा महसूस करते हैं। खुद पाकिस्तान के अंदर सिंध एक अलग अस्मिता है और पख्तून अलग। हालांकि दक्षिणपंथी लोग धार्मिक अस्मिता और धार्मिक पहचान की बात करते हैं लेकिन सिवाय स्थल समान होने के उनमें परस्पर कोई एकता नहीं होती।
इसीलिए अलग सिख राष्ट्र की मांग करने वाले बुरी तरह फेल हुए। कुछ दिन जरूर यह नारा चला लेकिन पूरा देश क्या खुद पंजाब में ही इस नारे को कोई खास सपोर्ट नहीं मिला। सिख खाड़कुओं ने १९८४ के बाद आतंकवाद के नाम पर खूब उत्पात मचाया। लेकिन जन समर्थन नहीं मिलने के कारण वे अलग-थलग पड़ गए। सिखों ने भारतीय मुख्य धारा में ही रहना पसंद किया। किसी कौम के साथ दोयम दरजे का व्यवहार हो तो वह कुछ दिनों के लिए भकुर सकता है लेकिन अपने मुख्य समाज से अलग नहीं होगा। यही हुआ। पंजाब में पंजाबी एक पहचान है लेकिन उसे सिख और हिंदू में बाटना सभी को नागवार लगा और जल्द ही यह लड़ाई दम तोड़ गई।
लेकिन दक्षिणपंथी ताकतें धर्म को ही अपनी अस्मिता का आधार बनाकर परस्पर लड़ाया करती हैं। और शासक जब-जब अपनी जनप्रियता खोता है वह कट्टर और धर्म का पाबंद बन जाता है। हम इतिहास में ऐसे नमूने देख सकते हैं। अकबर और औरंगजेब में यही फर्क था। वर्ना दोनों ही मुगल थे और बाबरवंशी थे। मगर एक ने उदारता की परंपरा रखी और दूसरा गद्दी पाने के लिए आक्रामक हो उठा। नतीजा यह हुआ कि कट्टर मुसलमानों की निगाह में वो आलमगीर औरंगजेब हो गया और हिंदुओं की निगाह में वह क्रूर शासक। भरतपुर के गोकुल जाट ने औरंगजेब की कट्टर धार्मिक नीतियों को ही अपने विद्रोह का आधार बनाया था। एक तरीके से दोनों ही धर्म का इस्तेमाल कर रहे थे पर जनता बागी के साथ होती है और गोकुल जाट पूरे बृज क्षेत्र की जनता का हीरो बन गया।
राजीव गांधी के शासनकाल में भी धार्मिक कट्टरपंथी सिर उठा रहे थे। चूंकि राजीव गांधी पेशेवर राजनेता नहीं थे और न वे राजनय समझते थे न कूटनीति इसलिए उन सारे लोगों ने उन्हें घेर लिया जो येन केन प्रकारेण अपना एजंडा पूरा करना चाहते थे। इसमें कट्टर हिंदू भी थे, मुस्लिम और सिख भी। यहां तक कि खुद उनके ही दल में ऐसे लोग भरे हुए थे और राजीव गांधी उन्हें छांट नहीं पा रहे थे। यहां कहा जा सकता है कि राजीव गांधी को अपनी मां या नाना के राजनीतिक गुण परंपरा से नहीं मिले। उनके लिए बेहतर यही होता कि वे जहाज ही उड़ाते। नतीजा जल्द ही आया। शाहबानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला रोकने संबंधी कानून बनाने तथा अयोध्या में राम जन्म भूमि का ताला खोले जाने के रूप में।
(जारी)

पत्रकारिता के संस्मरण- पार्ट ९
सरदी की गरमी
शंभूनाथ शुक्ल
१९८४ की सरदी भी भारी ठिठुरन लेकर आई। लेकिन शीतलहर के बावजूद गर्म था। विश्व हिंदू परिषद के नारों से दीवालें पटी पड़ी थीं। जहां हिंदू घटा, वहां देश कटा। जाहिर है यह नारा कश्मीर की घटनाओं को लेकर था। कश्मीर घाटी से पंडित भगाए जा रहे थे। दूसरा नारा था आओ हिंदुओं बढ़कर बोलो, राम जन्मभूमि का ताला खोलो। इन दोनों ही नारों में एक आतंक था। एक में घटत का आतंक और दूसरे में बढ़त का। मजा यह था कि एक ही संगठन इन दोनों ही नारों को अपने पक्ष में कर रहा था। यह वह दौर था जब एक तरफ सिख अपनी पहचान की बात कर रहे थे और मुसलमान अपनी तथा हिंदू भी विहिप के कारण अपनी। बाकी तो ठीक पर हिंदुओं की अपनी पहचान क्या है, यह किसी को नहीं पता था। राम जन्मभूमि को लेकर न तो सारे हिंदू एक थे न बाबरी मस्जिद के वजूद को लेकर सारे मुसलमान। इस बीच सिख पीछे हो गए थे।
शायद १९८५ के पहले अधिकतर लोगों को यह नहीं पता था कि रामजन्म भूमि किसी ताले में बंद है क्योंकि सबै भूमि गोपाल की तर्ज पर औसत हिंदू यह मानकर चलता था कि रामजी की मर्जी कहां पैदा होंगे यह कोई विहिप थोड़े ही तय करेगा। लेकिन कुछ लोग कटुता भर रहे थे। इनमें से कुछ वे थे जो किसी कारण से राजीव गांधी से नाराज थे और कुछ वे थे जो उन्हीं कारणों से राजीव गांधी से अथाह खुश थे और वे चाहते थे कि इस समय जो चाहो वह करवा लो। यह वही दौर था जब शिव सेना और विहिप का मकसद बस किसी तरह अयोध्या में राम जन्म भूमि का ताला खुलवाना था। अयोध्या एक नया पर्यटन स्थल विकसित हो रहा था। सरयू के घाट, आलीशान धर्मशालाएं और फैजाबाद में होटल तथा उसी लिहाज से प्रशासन अपने वास्ते सरकिट हाउस का नवीकरण भी करवा रहा था।
सब का टारगेट अयोध्या की वह इमारत थी जो अपनी बुलंदी व स्थापत्य शैली का बेजोड़ नमूना थी। उसका नाम था बाबरी मस्जिद जिसे कुछ दिनों पहले तक मस्जिदे जन्म स्थान कहा जाता था और १८५३ तक जिसके निर्माण और जिस पर अधिपत्य को लेकर कभी कोई विवाद नहीं हुआ। इस मस्जिद पर हिंदू दावेदारी अवध के शासक वाजिदअली शाह के वक्त में १८५३ में शुरू हुई जब निर्मोही अखाड़े ने इस मस्जिद में पूजा अर्चना करने तथा मंदिर बनाने की अनुमति मांगी। करीब दो साल तक यहां इसे लेकर झगड़े चलते रहे बाद में प्रशासन ने मंदिर बनाने या पूजा अर्चना करने की अनुमति देने से मना कर दिया। लेकिन फैजाबाद के गजेटियर में लिखा है कि गदर के बाद १८५९ में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों ने मस्जिद के बाहरी प्रांगण को मुसलमानों के लिए प्रतिबंधित कर दिया तथा हिंदुओं को यहां चबूतरा बनाकर पूजा करने की अनुमति दे दी। अलबत्ता मस्जिद का भीतरी प्रांगण मुसलमानों के लिए खुला रहा और कह दिया गया कि वे अंदर नमाज अता कर सकते हैं। हिंदुओं ने मस्जिद के बाहरी प्रांगण में १७ बाई २१ फिट का एक चबूतरा बनवा लिया। इसके बाद १८८३ में निर्मोही अखाड़े के बाबा राघोदास ने फैजाबाद के सब जज पंडित हरीकिशन के यहां एक सूट दाखिल कर कहा कि  उन्हें इस चबूतरे में मंदिर बनाने की अनुमति दी जाए। पर यह सूट खारिज हो गया। फैजाबाद के डिस्ट्रिक्ट जज कर्नल जेईए चेंबर के यहां एक दूसरी अपील दायर हुई लेकिन चेंबर ने १७ मार्च १८८६ को इस स्थान का दौरा किया और अपील यह कहते हुए खारिज कर दी कि मस्जिद निर्माण को अब ३५८ साल हो चुके हैं इसलिए अब इस मुकदमे का कोई मतलब नहीं है। २५ मई १८८६ को फिर एक अपील अवध के न्यायिक आयुक्त डब्लू यंग के यहां दाखिल हुई लेकिन वह भी रद्द हो गई। बैरागियों की पहली कोशिश का इस तरह पटाक्षेप हो गया।
१९३४ के दंगों के दौरान मस्जिद के परकोटे और एक गुंबद को दंगाइयों ने तोड़ डाला जिसे बाद में ब्रिटिश सरकार ने बनवा दिया। २२ दिसंबर १९४९ को आधी रात के वक्त जब मस्जिद में तैनात गार्ड सो रहे थे तभी उसके भीतर राम सीता की मूर्तियां रखवा दी गईं। सिपाही माता प्रसाद ने मस्जिद में अचानक मूर्तियां प्रकट होने की सूचना थाने भिजवाई। २३ दिसंबर को  अयोध्या थाने के एक सब इंस्पेक्टर राम दुबे ने एफआईआर लिखवाई कि ५०-६० लोग मस्जिद के गेट पर लगे ताले को तोड़कर अंदर दाखिल हुए और वहां श्री भगवान को स्थापित कर दिया तथा अंदर व बाहर गेरुए रंग से सीताराम सीताराम लिख दिया। इसके बाद ५-६००० लोगों की भीड़ भजन-कीर्तन करते हुए मस्जिद के भीतर घुसने की कोशिश कर रही थी पर उन्हें भगा दिया गया लेकिन अगले दिन फिर हिंदुओं की भारी भीड़ ने मस्जिद के भीतर घुसने की कोशिश की। फैजाबाद के डीएम केके नैयर ने शासन को लिखा कि हिंदुओं की भारी भीड़ ने पुलिस वालों को खदेड़ दिया और मस्जिद का ताला तोड़कर अंदर घुस गए। हम सब अफसरों और पुलिस वालों ने किसी तरह उन्हें बाहर निकाला। पर अंदर घुसे हथियारबंद साधुओं से निपटने में हमें भारी मुश्किल आ रही है। अलबत्ता गेट महफूज है और हमने उसमें बाहर से ताला लगा दिया है तथा  वहां फोर्स भी बढ़ा दी है। प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के पास जैसे ही यह सूचना पहुंची उन्होंने यूपी के मुख्यमंत्री गोबिंदवल्लभ पंत को अयोध्या में फौरन कार्रवाई करने तथा साधुओं को मस्जिद परिसर से बाहर करने का निर्देश दिया। पंत जी के आदेश पर मुख्य सचिव भगवान सहाय और पुलिस महानिरीक्षक वीएन लाहिड़ी मस्जिद से साधुओं को बाहर करने के लिए तत्काल अयोध्या गए। लेकिन डीएम नैयर इस आदेश को मानने के लिए राजी नहीं हुए उन्होंने आशंका जताई कि अगर ऐसा किया गया तो हिंदू उत्तेजित हो जाएंगे।
इसके बाद का किस्सा विश्व हिंदू परिषद का है। हालांकि १९४९ तक अयोध्या के इस विवाद में राजनीतिक दलों की दखलंदाजी नहीं थी और न ही इस प्रकरण में अयोध्या के बाहर के लोगों की कोई रुचि थी। अब विहिप के साथ-साथ अखबार भी इस प्रकरण में एक पक्षकार जैसा ही अभिनय कर रहे थे। बाद में प्रेस कौंसिल की जांच में यह साबित भी हुआ। लेकिन यह अभिनय ज्यादातर क्षेत्रीय अखबारों और इतिहास ज्ञान से अनभिज्ञ उनके तथाकथित संपादकों ने किया।

पत्रकारिता के संस्मरण- पार्ट-१०
और नाम के साथ जुड़ गया शुक्ल
शंभूनाथ शुक्ल
(अपने तमाम मित्रों और शुभचिंतकों के आग्रह पर मैं फिर से यह संस्मरण डायरी शुरू कर रहा हूं। मित्रों का आग्रह है कि नहीं इसे कुछ लोगों की नाराजगी के कारण बंद मत करिए क्योंकि इन संस्मरणों से उस समय का एक इतिहास भी पढऩे को मिल रहा है। ये संस्मरण चूंकि भाई यशवंत सिंह अपने भड़ास पर छाप लेते हैं इसलिए वहीं पर मैने पढ़ा कि कुछ लोगों ने मुझे वामपंथी और कुछ ने छद्म कांग्रेसी बताया है। एक ने तो मुझे कांग्रेस का थिंक टैंक ही बता दिया और कुछ विघ्नसंतोषियों के मुताबिक मैं दिग्विजय सिंह का मित्र हंू। अब उन्हें कैसे बताया जाए कि राजा भोज और गंगू तेली में दोस्ती नहीं हुआ करती। दिग्विजय सिंह राजा हैं और कांग्रेस महाराजा इसलिए मेरा उनसे भला क्या मेल? रह गए वामपंथी तो वे बेचारे आफत के मारे अब बस त्रिपुरा तक सिमट गए हैं। उनके पास अगर इतिहास दृष्टि होती तो वे इस तरह न सिकुड़ जाते। इन्हें बस यह मानते हुए पढि़ए कि यह एक पत्रकार की अपनी इतिहास दृष्टि है। मुझे पता है कि इन्हें पढ़ कर सिवाय निष्पक्ष और आम लोगों के सब मुझे कोसेंगे ही। मगर मैने कहा था कि सब्र से पढ़ें तो अच्छा लगेगा वर्ना गरियाने को आप लोग स्वतंत्र हैं।)
दिल्ली की पत्रकारिता कुछ अलग किस्म की थी और यहां के लोग भी उतने ही भिन्न। जब मैने पत्रकारिता शुरू की तो अपना सरनेम नहीं लिखा करता था। मेरी कहानियां और लेख शंभूनाथ के नाम से ही छपते थे। अप्रैल १९७८ में जब मेरा लेख अर्जक संघ उप्र का डीएमके रविवार साप्ताहिक में छपा तो उस पर खूब पत्र आए। यहां तक कि अर्जक संघ के संस्थापक राम स्वरूप वर्मा तक ने उस पर पत्र  लिखा। लेख के समर्थन और विरोध में कई सप्ताहों तक चिट्ठियां छपती रहीं। तभी एक पत्र आया शंभुनाथ जी का। वे हावड़ा में रहते थे और कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाते थे। उन्होंने लिखा कि आपके और मेरे नाम में सिर्फ छोटी और बड़ी ऊ की मात्रा का फर्क है इसलिए कन्फ्यूजन होता है। अत आप अपना नाम बदल लो। मैने वह पत्र कामतानाथ जी को दिखाया। उन्होंने कहा कि उन्हें लिख दो कि आप अपना नाम बदल लीजिए। मैने आलसवश कोई पत्र नहीं लिखा। पर नाम नहीं बदला। और धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान से लेकर दिनमान तक इसी नाम से छपता रहा। पर दिल्ली आने पर मेरा नाम बदल दिया गया। प्रभाष जी ने कहा कि आप चाहे शुकल ध्यान रहे कि प्रभाषजी की बोलने की अपनी अदा थी किसी को वे पंडित कह कर बुलाते तो किसी को कुछ और, मुझे वे सुकल कहते लिखो अथवा नहीं लिखो लोग जाति तो तलाश ही लेंगे। और न लिखने से एक तरह की मक्कारी दीखती है कि आप हर जगह लाभ उठाने की फिराक में पाए जाओगे। मैने कहा ठीक है और जनसत्ता निकलने के कुछ ही दिनों बाद तेलुगू देशम पार्टी के संस्थापक टी रामराव की भारत देशम की कल्पना की समीक्षा करते हुए जनसत्ता के संपादकीय पेज पर मेरा एक मुख्य लेख छपा। उसमें प्रभाष जी ने शंभूनाथ के साथ शुक्ल भी जोड़ दिया। बस इसके साथ ही शुरू  हो गई शंभनूाथ शुक्ल की यात्रा। मैने दो लोगों से राय ली। एक तो कमलेश्वर जी से दूसरे गोरख पांडेय से। कमलेश्वर जी ने कहा कि जाने दो। पहले दुष्यंत कुमार भी दुष्यंत कुमार लिखते थे फिर परदेशी उपनाम रख लिया और मृत्यु के कुछ समय पहले दुष्यंत कुमार त्यागी हो गए। शायद यही उनका सही फैसला था। साथी गोरख पांडेय ने कहा कि शुक्ल लिखने या नहीं लिखने से आपके प्रगतिशील विचार न तो मरते हैं न पनपते हैं इसलिए कुछ फर्क नहीं पड़ता। पर जब सुरेंद्र प्रताप सिंह नवभारत टाइम्स के कार्यकारी संपादक बनकर दिल्ली आए तो पहली ही मुलाकात में उन्होंने कहा कि अच्छा शंभूनाथ जी अब दिल्ली आकर शंभूनाथ शुक्ल हो गए।
दिल्ली तो अजब शहर था। शनिवार को तेल मांगते सनीचरी लोग और हर चौराहे पर घंटा-घडिय़ाल। मुझे तब लगा कि दिल्ली दरअसल दक्षिणपंथियों का ही गढ़ है। और जो वामपंथी यहां हैं वे वही हैं जो यहां महंतगीरी करने आए हैं। चाहे वे जवाहरलाल नेहरू विवि के महंत हों या दिल्ली विवि के। महंतई एक दक्षिणपंथी शब्द और व्याख्या है इसलिए यहां वामपंथ भी दक्षिणपंथ का ही पर्याय है। अजीब कन्फ्यूजन था दिल्ली में।

पत्रकारिता के संस्मरण पार्ट-११
कट्टरपंथ की प्रतिक्रिया में कट्टरपंथ को बढ़ावा
शंभूनाथ शुक्ल
शाहबानों अधेड़ उम्र की एक मुस्लिम महिला थी। जिसे १९७५ में उसके पति ने उसे घर से निकाल दिया। अब पांच बच्चों को वह कैसे पाले इसलिए उसने अपने पति मोहम्मद अहमद खान के विरुद्ध अप्रैल १९७८ में ५०० रुपये महीने गुजारा भत्ता देने का मुकदमा दायर किया। इसके सात महीने नवंबर १९७८ में उसके पति ने उसे तलाक दे दिया और उलटे सुप्रीम कोर्ट में उसने मुकदमा दाखिल किया और कहा कि वह शाहबानों को गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य नहीं है क्योंकि इस्लामिक कानून के मुताबिक उन्होंने दूसरी शादी कर ली है इसलिए शाहबानों अब उनकी जिम्मेदारी नहीं है। शाहबानों ने कोर्ट से कहा कि उसके पास आय के कोई स्रोत नहीं हैं इसलिए उसके पति की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह उसके व बच्चों के भरण-पोषण के लिए गुजारा भत्ता दे। सात साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा १२५ के तहत फैसला किया कि मोहम्मद अहमद खान को गुजारा भत्ता देना चाहिए।
बस, इसके बाद तो बवाल मच गया। मुसलमान नेताओं का कहना था कि यह मुस्लिम पर्सनल लॉ के मामले में दखल है। ओबेदुल्ला खान आजमी और सैयद काजी ने पूरे देश में हंगामा बरपा कर दिया कि शाहबानों को गुजारा भत्ता नहीं मिलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने चूंकि यह फैसला सीआरपीसी के तहत दिया था इसलिए इसमें मुस्लिम पर्सनल ला बीच में नहीं था पर इन दोनों मुस्लिम नेताओं ने इसे लेकर तनाव का माहौल बना दिया। उस समय लोकसभा में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत था अत: उसने एक नया कानून पास किया- द मुस्लिम वूमेन (प्रोटेक्शन एंड राइट आन डायवोर्स) एक्ट १९८६ और सुप्रीम कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।
पर शाहबानों ने मुस्लिम और हिंदू कट्टरपंथियों के बीच कटुता बढ़ा दी। जिस जनसंघ ने १९५० में हिंदू कानूनों में संशोधन का घोर विरोध किया था अब उसके नए अवतार भाजपा ने शाहबानों के मामले में समान नागरिक कानून के तहत सुनवाई की मांग की और समाना नागरिक आचार संहिता की मांग उसने फिर से उठा दी। शाहबानों के मामले में भाजपा का जुड़ाव दरअसल इस बहाने हिंदू कट्टरवाद को बढ़ावा देने के लिए था। पूरे देश में दोनों कट्टरपंथी तनाव फैला रहे थे। लेकिन लोकसभा में कांग्रेस बहुत बेहतर स्थिति में थी पर प्रधानमंत्री राजीव गांधी अपरिपक्व थे। उनकी समझ में नहीं आया क्या करना चाहिए और वे अपने जिन कश्मीरी पंडित रिश्तेदारों पर भरोसा करते थे वे ज्यादातर मुस्लिम विरोधी थे। उस समय कहा गया था कि यह अरुण नेहरू की राय थी कि भाजपा के इस आंदोलन को दबाने के लिए आरएसएस की वर्षों पुरानी मांग कि राम जन्म भूमि का ताला खोल दिया जाए, को पूरा कर देना चाहिए। इसी साल १९८६ में इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आया कि अयोध्या में रामजन्म भूमि का ताला खोला जाता है।
भाजपा इसी के साथ शाहबानों को भूल गई। और अयोध्या में एक भव्य राममंदिर बनाने की तैयारियों में जुट गई। फिजूल की बहसों में पूरा देश दो समुदायों में बट गया। एक तरफ राम जन्म भूमि पर मंदिर रामलला का भव्य मंदिर बनाने के लिए आतुर आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद थे और दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी। विहिप ने मुसलमानों को बाबर वंशी घोषित कर दिया और वे पसमांडा मुसलमान भी इसकी लपेट में आ गए जिनके पास नाम और पूजा स्थल के सिवाय सारे सामाजिक आचार विचार हिंदुओं जैसे ही थे। वे अपने धर्म में उपेक्षित थे पर अब सब बाबरी मस्जिद के लिए एक हो रहे थे इसी तरह हिंदुओं में अवर्ण हिंदू राम जन्म भूमि पर मंदिर बनाने को आतुर।
(जारी)

पत्रकारिता के संस्मरण पार्ट- १२

वह एक नायक था धीरोदात्त और नायकत्व के सारे गुणों से युक्त। वह राजा भी था और रंक भी। पर उसके हर नायक के जीवन की कटुताओं की भांति उसके भी हहिस्से में कलंकगाथाएं ज्यादा आईं और अलौकिकता कम। अपनी इन कलंकगाथाओं पर उस नायक ने एक बार एक विवाह समारोह में दुखी मन से कहा था कि दरअसल उन्होंने भादों के अंधियारे पाख में चौथ का चाँद देख लिया था इसलिए कलंकगाथाएं उनकी नियति हैं। यह नायक था विश्वनाथ प्रताप सिंह। जब मुख्यमंत्री रहे तब भी और जब प्रधानमंत्री रहे तब भी कलंकगाथाओं ने उनका पीछा नहीं छोड़ा।
प्रधानमंत्री राजीव गांधी से उनके तनाव तब ही शुरू हो गए थे जब बतौर वित्त मंत्री उन्होंने इन्फोर्समेंट डिपार्टमेंट को असीम शक्तियां प्रदान कर दी थीं तथा इस विभाग ने एकदम से धीरूभाई अंबानी के आवास पर छापा मार दिया था और प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बालसखा अमिताभ बच्चन को भी घेर लिया था। नतीजा वही हुआ जिसकी आशंका थी। राजीव ने उनसे वित्त मंत्रालय छीन लिया और रक्षा मंत्री बना दिया। पर वहां वीपी सिंह ने बोफोर्स डील पकड़ ली। उनसे ऊबे राजीव ने उनसे मंत्रीपद ले लिया। वीपी सिंह ने पार्टी छोड़ दी तथा लोकसभा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया और इलाहाबाद सीट से उपचुनाव जीत कर पुन: लोकसभा में आ गए।
राजीव कैबिनेट के अरुण नेहरू तथा आरिफ मोहम्मद खान को लेकर उन्होंने जन मोर्चा बनाया और धीरे-धीरे कांग्रेस से ऊबे लोग वहां आने लगे। ११ अक्टूबर १९८८ को जेपी के जन्मदिन पर जन मोर्चा, जनता पार्टी, लोकदल और कांग्रेस एस ने मिलकर जनता दल बनाया। इसके अध्यक्ष वीपी सिंह चुने गए। राजीव गांधी की सरकार से मिलकर लडऩे के लिए कई क्षेत्रीय दलों जैसे एनटी रामराव की तेलगू देशम, द्रमुक, असम गण परिषद ने वीपी सिंह के साथ हाथ मिलाकर एक राष्ट्रीय मोर्चा तैयार किया। इसके संयोजक वीपी सिंह बने, एनटी रामराव अध्यक्ष और पी उपेंद्र को महासचिव चुना गया। १९८९ के आम चुनाव के समय भारतीय जनता पार्टी और वाम दलों ने मिलकर कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए वीपी सिंह को मदद करने की रणनीति बनाई। बहुत कम बहुमत से ही सही पर राष्ट्रीय मोर्चा सत्ता में आ गया। तब भाजपा और वामदलों ने सरकार में शामिल होने की बजाय बाहर से सपोर्ट करने का वायदा किया।
दो दिसंबर १९८९ से लेकर १० नवंबर १९९० तक वीपी सिंह की सत्ता रही पर इस बीच जनता दल ने यूपी, बिहार, हरियाणा, गुजरात और ओड़ीसा में तो अपनी सरकारें बना लीं तथा राजस्थान में भाजपा की और केरल में वामदलों की सरकार बनवा दी। इसके अलावा राष्ट्रीय मोर्चा की तरफ से असम में प्रफल्ल कुमार महंत की, आंध्र मेंं रामराव की और तमिलनाडु मेंं द्रमुक की सरकार बनी। पर सरकार बनते ही वीपी सिंह का पहला एसिड टेस्ट तो तब हुआ जब केंद्र के गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी को कश्मीरी आतंकवादियों ने अगुआ कर लिया। इसके एवज में उन्हें उन आतंकियों की मांगें माननी पड़ीं। और कुछ खूंखार आतंकियों को रात के अंधेरे में रिहा करना पड़ा। इसके बाद भाजपा के दबाव में उन्होंने जम्मू कश्मीर में पूर्व नौकरशाह जगमोहन को राज्यपाल बनाया। इसी तरह पंजाब से सिद्धार्थशंकर राय जैसे कैड़े राज्यपाल को हटाकर एक अन्य नौकरशाह निर्मल मुखर्जी को राज्यपाल बनाया। वीपी सिंह बगैर किसी सुरक्षा बंदोबस्त के स्वर्ण मंदिर गए और आपरेशन ब्लू स्टार के लिए सिख समुदाय से माफी मांगी। इसी मरहम का नतीजा था कि पंजाब मेंं लोकतांत्रिक प्रक्रिया चालू हुई और वहां विधानसभा चुनाव के आसार बने। इसके अलावा वीपी सिंह ने विवाद की जड़ भारतीय शांति सेना (आईपीकेएफ) को श्रीलंका से वापस बुलवा लिया।
जनता दल बनी ही थी उत्तर भारत के समाज में पिछड़ वर्गों को सामाजिक न्याय दिलाने के वास्ते इसलिए अगस्त १९९० में प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने अन्य पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिलाने हेतु बने मंडल आयोग की सिफारिशोंं को लागू करने का फैसला किया। यह आरक्षण व्यवस्था वर्षों से पिछड़े समुदायों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए उन्हें नौकरियों में आरक्षण की सुविधा देती है। वीपी सिंह ने इसे लागू कर एक तरह से अपने एजंडे पर ही अमल किया था। पर मीडिया और कांग्रेस व भाजपा ने इसे युवा विरोधी बताकर ऐसा खूनी खेल शुरू करवा दिया जिसकी कलह और जलन आज तक नहीं मिट सकी है। यह खेल इतना खतरनाक था कि उसके सामने १९४७, १९८४ और २००२ भी फीके पड़ गए।
(जारी)
पत्रकारिता के संस्मरण पार्ट-१३
पहलू बदलकर मंडलीय अड्डेबाजी
शंभूनाथ शुक्ल
अगस्त, सितंबर और अक्टूबर १९९० के बहुत उमस भरे दिन थे वे। राजधानी में चारों तरफ त्राहि-त्राहि मची थी। हर ओर बेचैनी थी। चाहे वे कांग्रेसी रहे हों अथवा भाजपाई या वामपंथी सब बहस करते समय बार-बार पहलू बदलते। चाय की दूकानों पर, चौराहों पर किसी भी मैदान की बेंचों पर बैठे बुजुर्गों, जवानों और महिलाओं में बस एक ही चर्चा होती कि अब क्या होगा? अखबारों ने अपनी अपनी सुविधा से अपना पाला चुन लिया था। नवभारत टाइम्स ने अपना तो टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपना। जनसत्ता साइलेंट मोड पर था लेकिन इंडियन एक्सप्रेस में अरुण शौरी ने वीपी सिंह के खिलाफ एक मोर्चा खोल लिया था। दिल्ली विश्वविद्यालय और जनेयू में आग लगी हुई थी। रोज कोई न कोई छात्र आत्मदाह करने की कोशिश करता। हर चौराहे, बाजार और सार्वजनिक स्थलों पर प्रदर्शन। इससे निपटने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ता। एक जगह पुलिस आग बुझाती तत्काल उसके पड़ोस में लग जाती। बंद, टांसपोर्ट ठप, बाजारों में सन्नाटा पसरा रहता। रोज अखबार से गाड़ी आती, हमें ले जाती और छोड़ जाती। ऐसा पहला मौका था जब अपने ही दफ्तरों की गाड़ी के ड्राइवर से न तो हम बात करते और न ही वे वाचाल ड्राइवर हमसे। यहां तक कि नमस्कार तक नहीं होती थी।
एक वामपंथी संपादक ने मुझसे कहा कि गरीब तो ब्राह्मण ही होता है। हम सदियों से यही पढ़ते आए हैं कि एक गरीब ब्राह्मण था। हम गरीब तो हैं ही साथ में अब लतियाए भी जा रहे हैं। उन दिनों दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारत में लोग जातियों में बटे हुए थे बजाय यह सोचे कि ओबीसी को आरक्षण देने का मतलब अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण है न कि अन्य पिछड़ी जातियों को। मंडल आयोग ने अपनी अनुशंसा में लिखा था कि वे वर्ग और जातियां इस आरक्षण की हकदार हैं जो सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से अपेक्षाकृत पिछड़ गई हैं। मगर खुद पिछड़ी जातियों ने यह सच्चाई छिपा ली और इसे पिछड़ा बनाम अगड़ा बनाकर अपनी पुश्तैनी लड़ाई का हिसाब बराबर करने की कोशिश की। यह अलग बात है कि इस मंडल आयोग ने तमाम ब्राह्मण और ठाकुर व बनिया कही जाने वाली जातियों को भी आरक्षण का फायदा दिया था। पर जरा सी नासमझी और मीडिया, कांग्रेस और भाजपा तथा वामपंथियों व खुद सत्तारूढ़ जनता दल के वीपी सिंह विरोधी और अति उत्साही नेताओं, मंत्रियों द्वारा भड़काए जाने के कारण उस राजीव गोस्वामी ने भी मंडल की सिफारिशें मान लिए जाने के विरोध में आत्मदाह करने का प्रयास किया जो ब्राह्मणों की आरक्षित जाति में से था। और बाद में उसे इसका लाभ भी मिला।
नवभारत टाइम्स के संपादक राजेंद्र माथुर ने चुप साध ली थी और सुरेंद्र प्रताप सिंह की टीम हमलावर मूड में थी। रोज वहां तमाम ऐसे लोगों के लेख ढूंढ़-ढूंढ़कर छापे जाते जिसमें ब्राह्मणों और अन्य सवर्ण जातियों की निंदा की जाती। अथवा कहना चाहिए कि कमर के नीचे हमला किया जाता। तभी रामबिलास पासवान का एक बयान आया कि उनके कलेजे में ठंड तब पहुंचेगी जब उनके घर की महरी ब्राह्मणी होगी। अब वीपी सिंह भी लाचार थे और वे अपनी टीम पर काबू नहीं कर पा रहे थे। वीपी सिंह ने पासवान के ऐसे बयान का विरोध किया मगर खुलकर वे कुछ नहीं कह पा रहे थे। वे घिर गए थे।  अपनी ही बनाई लकीर में और अपने ही लोगों ने उन्हें बंद कर दिया था। वे खुली दुनिया में नहीं आ पा रहे थे। हालांकि वे स्वयं चाहते थे कि ऐसे आग लगाऊ बयान बंद हों पर न तो वीपी सिंह इस पर काबू कर पा रहे थे न उनके टीम के अन्य लोग। दो काम हुए। इंडियन एक्सप्रेस से अरुण शौरी को हटा दिया गया। और सुरेंद्र प्रताप सिंह की पकड़ नवभारत टाइम्स में कमजोर पडऩे लगी। कारपोरेट हाउसेज ने अपना धंधा संभाला। वे जातिगत लड़ाइयों में अपना धंधा नहीं मंदा करना चाहते थे। जनसत्ता में न तो मंडल सिफारिशों के समर्थन में कोई लेख छप रहा था न विरोध में। ऐसे सन्नाटे में मैने एक लेख लिखा आरक्षण की फांस। इसमें मैने लिखा कि नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिलेगा तो उसे ही जो संपन्न होगा तथा पढ़ा-लिखा होगा। अब मैकू जाटव और मैकू सुुकुल दोनों ही मेरे गांव में खेतिहर मजदूर हैं और उन दोनों को ही आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता। इसलिए मध्यवर्ग के सवर्णों में इसे लेकर बेचैनी है गरीब सवर्ण को तो भड़काया जा रहा है। इस लेख के छपने के बाद ही केंद्रीय मंत्री रामपूजन पटेल हमारे दफ्तर आए और प्रभाष जी के पास जाकर मुझे बुलवाया। मुझसे हाथ मिलाते हुए उन्होंने कहा कि शुक्ला जी आप पहले ब्राह्मण तो क्या सवर्ण पत्रकार हैं जिन्होंने आरक्षण के समर्थन में लेख लिखा। मैं आपका आभारी हूं।
इसी दौर में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह का एक लेख नवभारत टाइम्स में छपा जिसमें बताया गया था कि वीपी सिंह में नया करने की ललक तो है पर शऊर नहीं है।
जारी

पत्रकारिता की घिसी हुयी सीढियां!

Standard

शम्भूनाथ शुक्ल

(जब से अखबार से रिटायर हुआ हूं लोग समझते हैं कि मैं तो निठल्ला बैठा ही हूं इसलिए जिसे देखो आग्रह किए जा रहा है कि आप अपने पत्रकारिता के संस्मरण लिखिए। जैसे पत्रकार को अपनी कोई राजनीतिक विचारधारा रखने का हक ही नहीं है। क्योंकि जैसे ही मैं कोई राजनीतिक पोस्ट डालता हूं असंख्य लोग कोसना शुरू कर देते हैं। चलिए अब अपने राजनीतिक विचार अपने मन में ही रखता हूं और पत्रकारिता के अपने अनुभव ही साझा कर रहा हूं। लेकिन धैर्य बरतिएगा क्योंकि ये संस्मरण केवल एक ही पोस्ट के जरिए तो लिखे नहीं जा सकते।)

“जब से विजुअल मीडिया का दौर आया है पत्रकारिता एक ग्लैमरस प्रोफेशन बन गया है। पर हमारे समय में दिनमान ही पत्रकारिता का आदर्श हुआ करता था और रघुवीर सहाय हमारे रोल माडल। लेकिन उनकी दिक्कत यह थी कि वे साहित्यकार थे और पत्रकारिता उनके लिए दूसरे दरजे की विधा थी। पर दिनमान वे पूरी पत्रकारीय ईमानदारी से निकालते थे। हमारे घर दिनमान तब से आ रहा था जब उसके संपादक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय थे। लेकिन जब मैने उसे पढऩा शुरू किया तो संपादक रघुवीर सहाय हो गए थे। दिनमान हम पढ़ते जरूर थे। उसके तीखे तेवर, हर विषय पर सामयिक टिप्पणी और उसके शीर्षक। सदस (सर्वेश्वरदयाल सक्सेना) का नियमित कालम तथा श्याम लाल शर्मा, शुक्ला रुद्र, सुषमा पाराशर, त्रिलोक दीप और जवाहर लाल कौल के लेख और रपटें। citizen-journalismपर बनवारी जी ने जब इस पत्रिका में कदम रखा तो इसके तेवर ही बदल गए और यह एक विशुद्ध रूप से सामयिक पत्रिका बन गई। बनवारी जी के लिखने की स्टाइल ही अलग थी। चाहे वह नेपाल के चुनाव की रपटें हों या दिल्ली में कुतुब मीनार की सीढिय़ों से फिसल कर ४२ बच्चों की मौत की रपट। अब तो शायद लोगों को पता भी नहीं होगा कि आज से ३२ साल पहले तक कुतुब मीनार पर चढ़ा भी जा सकता था। लेकिन १९८२ में एक भयानक दुर्घटना घटी। कुतुब मीनार देखने आई छात्राओं की एक भीड़ भरभराती हुई तीसरी मंजिल से नीचे आ गिरी, उसमें ४२ छात्राएं मरीं। बनवारी की इस रपट की हेडिंग थी घिसी हुई सीढिय़ों पर मौत। मुझे यह शीर्षक इतना आकर्षक और रपट इतनी कारुणिक लगी कि मैं सिर्फ बनवारी जी से मिलने के लिए साढ़े चार सौ किमी की यात्रा तय कर कानपुर से दिल्ली आ गया। चूंकि मैं हावड़ा-दिल्ली (इलेवन अप) एक्सप्रेस पकड़कर दिल्ली आया था और वह ट्रेन सुबह पांच बजे ही पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन आ जाया करती थी इसलिए पूरे तीन घंटे तो प्लेटफार्म पर ही वाक कर काटे और आठ बजे के आसपास वहां से पैदल ही दिनमान के दफ्तर के लिए निकल पड़ा। ठीक नौ बजे १० दरियागंज स्थित टाइम्स बिल्डिंग में पहुंच गया। पता लगा कि बनवारी जी तो दस के बाद आएंगे। लेकिन वहां मौजूद सक्सेना नामके चपरासी ने चाय पिलाई और समोसे लाकर खिलाए। मैं उसकी सज्जनता से गदगद था। उसने बताया कि टाइम्स से उसे १२ सौ रुपये महीने पगार मिलती है जो मेरी पगार से ड्यौढ़ी थी जबकि मैं कानपुर में दैनिक जागरण में उप संपादक था। खैर करीब सवा दस बजे बनवारी जी आए। मैं उनसे जाकर मिला। वे हल्की लाइनों वाला कुरता तथा एकदम झकाझक सफेद पायजामा धारण किए हुए एक बेहद सौम्य और उत्साही पत्रकार लगे। पर यह भी महसूस हुआ कि शायद पत्रिकाओं के संपादक कुछ हौवा टाइप के हुआ करते थे। क्योंकि बनवारी जी मुझसे बात करते समय कुछ सहमे से लगे और बार-बार संपादक रघुवीर सहाय के केबिन की तरफ देख लिया करते थे। ऐसा लग रहा था कि अभी एक दरवाजा खुलेगा और एक डरावना सा अधबूढ़ा संपादक निकलेगा। जो महान कवि होगा और महान चिंतक भी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और केबिन खुला तो खाकी रंग की एक जींस नुमा पैंट पहने एक व्यक्ति निकला और लंबे-लंबे संगीतकार जैसे बालों वाले सदस की टेबल तक गया फिर उसने हाल पर नजर डाली मुझे भी देखा और लौट गया। बनवारी जी ने बताया कि वे रघुवीर जी थे। मेरी मिलने की बहुत इच्छा हुई लेकिन न तो बनवारी जी ने मेरी उनसे मुलाकात के लिए बहुत उत्कंठा जताई और न ही वे सज्जन हाल में ज्यादा देर तक रुके थे। इसलिए मन मारकर चला आया। दिल्ली में तब तक किसी को जानता नहीं था इसलिए नई दिल्ली स्टेशन गया। पता लगा कि गोमती जाने को तैयार है। टिकट लिया कुल बीस रुपये अस्सी पैसे का। और ट्रेन में जाकर बैठ गया। तब गोमती एक्सप्रेस नई-नई चली थी। और दिल्ली के बाद सीधे कानपुर आ कर ही रुकती थी। सामने वाली बर्थ पर जो मोहतरमा थीं वे कोई लखनऊ के नवाब परिवार से ताल्लुकात रखती थीं। जब भी वे अपना पानदान खोलतीं तो पूरा कोच उसकी गमकती खुशबू से भर जाता।”

 

यहां कुछ भी दाएं या बाएं नहीं है।

images-1शंभूनाथ शुक्ल
पत्रकारिता में कुछ भी दाएं-बाएं नहीं होता। यहां पर तो जो कुछ है वह सपाट है, स्ट्रेट है और यथास्थितिवादी है। बस उसके अर्थ अलग-अलग निकाले जाते हैं। राइट अपने हिसाब से मायने निकालता है और लेफ्ट अपने लिहाज से। इसीलिए देखिए कि चाहे वे वामचिंतक हों या दाम चिंतक सहारा एक ही रिपोर्ट का लेते हैं और परस्पर उसी के भरोसे युद्ध चलाते हैं। जब दिनमान सूर्य की भांति अपनी चमक बिखेर रहा था तभी धूमकेतु की भांति उदय हुआ रविवार। धर्मयुग के दो पुराने सहयोगी सुरेंद्र प्रताप सिंह और उदयन शर्मा की जोड़ी ने इस साप्ताहिक पत्र को कलकत्ता से निकाला। बंगला के मशहूर अखबार आनंदबाजार पत्रिका समूह की तरफ से निकाले गए इस साप्ताहिक ने बाजार में आते ही पत्रकारिता के सारे रंग-ढंग बदल डाले। यह दिनमान की भांति धीर-गंभीर नहीं बल्कि चंद्रमा की तरह चंचल और सुर्ख था। जनता पार्टी के शासन काल में यह व्यवस्था विरोध के नाम पर निकाला गया और पहली बार लगा कि पत्रकारिता से सरकारें डरने लगी हैं, राजनेता भय खाने लगे हैं। और पत्रकार की हैसियत उनके बीच एक मध्यस्थ की बन गई है।
पहली बार रविवार ने उन क्षेत्रों और उन प्रतीकों पर लेख लिखवाए जो तब तक की शालीन और मर्यादित पत्रकारिता के लिए वर्जित था।
अप्रैल १९७८ में रविवार में मेरी एक स्टोरी छपी ‘अर्जक संघ उत्तर प्रदेश का डीएमके’। इसके बाद सुरेंद्र प्रताप सिंह से चिट्ठियों के जरिए संवाद का सिलसिला शुरू हुआ। तभी वहां कुछ नई भरतियां शुरू हुईं मैने भी आवेदन किया और कानपुर से तीन लोगों को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया। एक मैं, दूसरे संतोष तिवारी और तीसरे बलराम। साथ ही यह भी बताया गया कि आने-जाने का किराया दिया जाएगा। यह दूसरी बात ज्यादा उत्साहित कर रही थी। इंटरव्यू में पास हो या फेल किराया मिलेगा। हम तीनों तूफान मेल पकड़ कर अगले रोज शाम को पहुंच गए हावड़ा। वहीं हावड़ा होटल में सामान रखकर चल दिए कलकत्ता। अति उत्साह में इंटरव्यू के एक दिन पहले ही आनंदबाजार पत्रिका के दफ्तर में पहुंच गए। रिशेप्सन में एक आदमी जोर-जोर से अंग्रेजी में हल्ला कर रहा था। और रिशेप्शन पर बैठा आदमी सहमा हुआ सा उसे बांग्ला में समझा रहा था। पता चला कि हल्ला करने वाला शख्स रघु राय हैं। मशहूर फोटोग्राफर। हमने नमस्ते किया तो उन्होंने कोई जवाब तक नहीं दिया। अंदर जिस केबिन में रविवार का दफ्तर था वह मुश्किल से आठ बाई दस का एक कमरा था जिसके एक कोने में सुरेंद्र प्रताप सिंह बैठे थे। उनकी टेबल के सामने का हिस्सा कुछ उठा हुआ था शायद स्पांडलाइटिस से बचने के वास्ते यह व्यवस्था हुई होगी। उनके सामने साइड में अनिल ठाकुर और कुछ ही दिनों पहले ‘भगवान’ के घर चार दिन बिताकर लौटे राजकिशोर बैठे थे। सुरेंद्र प्रताप सिंह से मिलकर अच्छा लगा और महसूस हुआ कि यह आदमी तो हम लोगों जैसा ही है। अगले रोज इंटरव्यू में सारे सवाल तो ठीक पाए गए लेकिन जब स्नातक की डिग्री दिखाने को कहा गया तो सिवाय बलराम के हम और संतोष तिवारी सिफर निकले। संतोष की पढ़ाई जारी थी और मैने बी एससी पार्ट वन करके पढ़ाई छोड़ दी थी और घर से भागकर पहले कलकत्ता फिर पटना और अंत में वाराणसी सारनाथ आ गया था जहां से पिताजी मुझे पकड़ कर लाए थे। लेकिन इन तीन सालों की भागादौड़ी में मैने सारनाथ रहकर पाली सीख ली थी। बाद में इमरजेंसी के कुछ पहले एक साप्ताहिक अखबार निकाला और इमरजेंसी में छापा पड़ा तो गांव चला गया जहां बाबा ने शादी करवा दी। बाद में फिर पढ़ाई अवरुद्ध होती ही चली गई। सुरेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि आनंद बाजार पत्रिका समूह के नियमों के मुताबिक ग्रेजुएट होना जरूरी है। पर हमें कोई मलाल नहीं था। कलकत्ता घूमना हो ही गया। संतोष तिवारी तो वापस चले गए लेकिन मैं और बलराम वहीं कुछ और दिनों तक के लिए रुक गए। पर तभी १९७८ की भयानक बारिश के चलते ट्रेनें ठप हो गईं और बड़ा बाजार में नावें चलने लगीं। पैसा जो लाए थे वह भी खत्म होने लगा इसलिए हमने बड़ा बाजार गुरुद्वारे में जाकर शरण ली। सुबह शाम लंगर छकते और बाकी समय वहीं कोठरियों में रात काटते। एक दिन ऊबकर हम फिर सुरेंद्र प्रताप सिंह के पास गए और उनसे अपना दुखड़ा रोया कि हमारे पास पैसे खत्म हो गए हैं। जो आपके यहां से किराये के पैसे मिले थे वे भी और ट्रेनें बंद पड़ी हैं हम जाएं तो कैसे जाएं। सुरेंद्र जी में गजब की आत्मीयता थी। उन्होंने तत्काल आनंद बाजार प्रबंधन से कह कर हमारे जाने के लिए लखनऊ तक का हवाई टिकट मंगवा दिया और सौ-सौ रुपये भी दिए यह कहकर कि भविष्य में जरा जल्दी ही लेख भेज देना उसी में काट लिया जाएगा। हमारी खुशी का पार नहीं था। तब हवाई यात्रा के तो हम हवाई किले ही बनाया करते थे और ऊपर से सौ-सौ रुपये। खैर हम वाया लखनऊ वापस आ गए। बिना उन सौ रुपयों में से एक पैसा खरचे। अमौसी हवाई अड्डे पर उतरते ही हमने पहला काम तो यह किया कि अमौसी रेलवे स्टेशन तक पैदल गए और वहां से भारतीय रेल सेवा की फ्री सेवा ली। जब हम कानपुर सेंट्रल से पैदल चलकर घर पहुंचे तो सौ रुपये यथावत थे।
अब यह अलग बात है कि हम तीनों में से किसी का भी रविवार में चयन नहीं हुआ। हमने कहा कि हो जाता तो भी हम नहीं जाते। एक तो रविवार के कमरे में बैठने की जगह तक नहीं है दूसरे कलकत्ता की बारिश और बाढ़ का क्या ठिकाना!
(बाकी के संस्मरण अब कल पढि़एगा।)

सिर्फ शहरों के बूते नहीं पनपते अखबार

imagesशंभूनाथ शुक्ल
रविवार ही नहीं बगैर ग्रेजुएशन कंपलीट किए सांस्थानिक मीडिया हाउसों में नौकरी मिलने से रही और कालेज जाकर पढ़ाई करने का मन नहीं करता था। वहां जो प्रोफेसर थे वे कभी मेरे साथ पढ़ चुके थे। उम्र करीब २५ साल हो आई थी और पुत्री का पिता भी बन चुका था। फ्रीलांसिंग में पैसा तो था पर स्थायित्व नहीं। इसलिए नौकरी कर लेने की ठानी। मैने एक कहानी लिखी वंश हत्या, जो दैनिक जागरण के साप्ताहिक परिशिष्ट में छपी। यथार्थवादी समानांतर कहानी का युग था। उसके छपते ही हंगामा मच गया और दैनिक जागरण के समाचार संपादक हरिनारायण निगम ने मुझसे पूछा कि नौकरी करोगे? मैने कहा जी तो बोले कि ठीक कल आ जाना। अगले दिन उन्होंने मुझे दैनिक जागरण के मालिक संपादक नरेंद्र मोहन जी से मिलवाया। जिन्हें वहां सब मोहन बाबू कहते थे। वहां एक और सज्जन, जो भी शायद कोई शुक्ला ही थे वे टोपी तो नहीं लगाए थे लेकिन अपने कुरते की आधी बाजू समेटे हुए थे, को भी इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था। वे श्रीमान शुक्ल जी हाई स्कूल से लेकर एमए हिंदी तक प्रथम श्रेणी में थे तथा पी एचडी कर रहे थे। मोहन बाबू ने मेरे सामने ही उनसे पूछा कि एक निजी कार और टैक्सी में क्या फर्क है? वे बोले- टैक्सी काली-पीली होती है। मोहन बाबू उनके जवाब से खुश नहीं हुए और यही सवाल मुझसे दोहरा दिया। जाहिर है एक जवाब मुझे मिल ही चुका था। और अब उसे दोहराने का कोई मतलब नहीं था इसलिए मैने कहा कि टैक्सी की नंबर प्लेट सफेद पर उसकी लिखावट काली होती है और प्राइवेट कार की नंबर प्लेट काली पर नंबर सफेद से लिखे जाते हैं। मालूम हो तब तक ऐसा ही होता था। अब तो निजी कार की नंबर प्लेट सफेद और नंबर काले होते हैं। मोहन बाबू खुश और चयन तय। न उन्होंने पूछा कि ग्रेजुएट हो या नहीं न मैने बताया। और यह बात मैने हरिनारायण निगम साहेब को भी नहीं बताई थी। मेरा चयन हो गया पर कार्मिक विभाग ने जब मेरी पढ़ाई लिखाई का ब्यौरा मांगा तो मैने अपने को स्नातक बता दिया। लेकिन डिग्री या माक्र्सशीट कहां से लाऊँ? अंत में मैने वहां पर तब मैगजीन एडिटर विजय किशोर मानव से सलाह ली और न्यूज एडिटर हरिनारायण निगम को सारा किस्सा बता दिया। मोहन बाबू ने कहा कि ठीक है नौकरी चलती रहेगी लेकिन होगी ठेके पर। जब तक स्नातक नहीं कर लेते ग्रेड नहीं मिलेगा। साढ़े चार सौ रुपये महीने की पगार तय हुई। लेकिन यह ठेके की नौकरी मेरे लिए मुफीद हो गई। इसमें न तो कोई हाजिरी का झंझट था न समय का और खूब लिखने-पढऩे तथा फ्रीलांसिंग की पूरी आजादी। यहां तक कि जो कुछ मेरा दैनिक जागरण में भी छपता उसका भी पैसा मिलता। तब मोहन बाबू हर सोमवार को संपादकीय विभाग की एक बैठक करते और कुछ सवाल पूछते जो उसे बता देता उसकी जय-जय। कुछ ऐसा हुआ कि पहली ही बैठक में मोहन बाबू ने पूछा कि बताओ फाकलैंड कहां है? उन दिनों फाकलैंड पर कब्जे को लेकर अर्जेंटीना और ग्रेट ब्रिटेन में युद्ध चल रहा था। मैं चूंकि फ्री लांसिंग के चक्कर में इंडियन एक्सप्रेस घर पर मंगाया करता था इसलिए इस सवाल का जवाब दे दिया। बाकी के सब मुँह ताकते रहे। मोहन बाबू बड़े खुश हुए और मेरा उसी रोज से पचास रुपये महीने मेहनताना बढ़ गया। जब मैं जागरण में भरती हुआ तब दिसंबर १९७९ चल रहा था। अपने राजनीतिक गुरु डॉक्टर जेबी सिंह के आग्रह पर मैने कालेज में एडमिशन ले लिया और १९८१ की जुलाई में मेरा ग्रेजुएशन कंपलीट। लेकिन तब कानपुर विश्वविद्यालय का सत्र इतना लेट चल रहा था कि रिजल्ट आते-आते १९८२ आ गया और तब मुझे मिल पाया दैनिक जागरण में सब एडिटर का ग्रेड। लेकिन इस बीच भले मैं ठेके पर काम करता रहा पर मोहन बाबू और निगम साहेब ने मुझसे हर तरह की रिपोर्टिंग कराई। खूब बाहर भेजा और गांव-गांव जाकर मैने मध्य उत्तर प्रदेश की दस्यु समस्या और गांवों में उभरते नए जातीय समीकरण तथा नए प्रतीकों पर शोध ही कर डाला।
इसी दौरान में मैं मैनपुरी एटा के दस्यु छविराम यादव उर्फ नेताजी से मिला। इटावा के मलखान सिंह से मिला, बाबा मुस्तकीम से मिला। तब तक शायद डकैतों से मिलना आसान नहीं हुआ करता था और डाकुओं के बारे में वैसी ही अफवाहें हुआ करती थीं जैसी कि सुनील दत्त की फिल्में देखकर लोग बनाया करते थे। लेकिन हर डकैत से मैं गांवों के बीचोबीच उनके ठिकानों पर ही मिला और पूरा गांव जानता था कि ये पत्रकार किसके घर जा रहा है। इसके बाद मैने बुंदेलखंड पर ध्यान फोकस किया और वहां की सामाजिक समस्याओं पर लिखा।
एक दिन मैं जागरण के सर्वोदय नगर स्थित दफ्तर से रात करीब नौ बजे निकलकर घर जा रहा था। पैदल ही था और सोचा कि कुछ दूर आई हास्पिटल से टैंपू पकड़ लूंगा। लेकिन दफ्तर से और आई हास्पिटल तक का करीब आधे किमी का रास्ता एकदम सूना और बीच में खूंखार कुत्तों का इलाका था। मैं गेट से निकलकर कुछ ही कदम बढ़ा था कि एक लंबी सी कार मेरी बगल से गुजरी। कार मोहन बाबू की थी। मेरे मन में एक ख्याल कौंधा कि काश मुझे भी इस कार में बैठने का मौका मिले। आश्चर्य कि वह कार अचानक बैक होने लगी और मेरे बगल में आकर रुकी। अंदर मोहन बाबू बैठे थे। उन्होंने खिड़की का सीसा खोला और बोले- अंदर आ जाओ शंभूनाथ। मैं उनकी सौजन्यता से अभिभूत था। मैने कहा नहीं भाई साहब मैं चला जाऊँगा। पर मेरी नकार के बावजूद उन्होंने मुझे कार में बिठा लिया। मैने उनसे कहा कि भाई साहब मेरा गांव यहां से कुल तीस किमी है पर अपना अखबार वहां तीन दिन बाद पहुंचता है। ऐसी कोई व्यवस्था होनी चाहिए कि अखबार वहां भी रोज का रोज पहुंचे। लोग अखबार पढऩा चाहते हैं। इस एक बात ने पता नहीं क्या असर डाला मोहन बाबू पर कि अगले ही रोज उन्होंने मुझे अपने कमरे में बुलाया और कहा कि शंभूनाथ कल से तुम कानपुर से लेकर एटा तक और दूसरी तरफ सुल्तानपुर तक और बुंदेलखंड में महोबा तक खूब दौरा करो और स्टोरी निकाल कर लाओ अखबार मैं गांव-गांव पहुंचा दूंगा। और इसके बाद मैं हो गया दैनिक जागरण का रोविंग करस्पांडेंट।

देवभूमि का दुःख!

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uttarakhandअलग होने से विकास तो नहीं ही होता!

शंभूनाथ शुक्ल
उत्तराखंड को यूपी से अलग करने का दुख मुझे बहुत हुआ था और आज भी मुझे लगता है कि ऐसा करना कोई बहुत समझदारी का काम नहीं था। पर वरिष्ठ पत्रकार प्रयाग पाण्डे पांडे की किताब ‘देवभूमि का रण’ बहुत सारे भ्रम दूर करती है। और पहली दफे लगा कि इस पूरे इलाके को पहले तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने फिर यूपी की लखनऊ में बैठी सरकारों ने लूटा ही था। यह अलग बात है कि यूपी में अब तक जितने भी मुख्यमंत्री हुए हैं उनमें से आठ दफे तो इसी अंचल के लोग रहे हैं और इसे यूपी में मिलाने का फैसला भी उन गोविंद बल्लभ पंत ने किया था जो खूद कुमायूं के थे।
प्रयाग पांडे ने अपनी किताब में लिखा है- “उत्तराखंड में ब्रिटिश राज के पूरी तरह कायम होने के बाद धार्मिक आस्था के केंद्र उत्तराखंड के पहाड़ों का ऐशो-आराम और हवाखोरी के केंद्र के रूप में परिवर्तित होने का क्रम शुरू हो गया। हिमालय की शास्वत नीरवता, रोमांचक और आकर्षक छवि ने अंग्रेजों को लुभाया। पहाड़ के भव्य और अनोखे नजारे अंग्रेजों को भा गए। पहाड़ों की स्वास्थ्य वर्धक एवं स्फूर्ति दायक जलवायु और आबो-हवा इंग्लैंड से मिलती-जुलती थी। पहाड़ों का स्वच्छ, शुद्ध वातावरण बच्चों के पोषण और विकास के लिए आदर्श समझा गया। इस प्राकृतिक वातावरण के कारण यहां नैनीताल जैसे हिल स्टेशन बसाए गए। पहाड़ों में आवासीय स्कूलों की स्थापना होने लगी। ब्रिटिश साम्राज्य की अखंड एवं ताकतवर सामथ्र्य के प्रतीक साम्राज्यवादी स्थापत्य शैली के भवनों का निर्माण शुरू हुआ। इससे पहाड़ का उन्मुक्त शुद्ध वातावरण और पर्यावरण बिगडऩे लगा। जबकि मुगलकाल में मुगल शासकों ने श्रीनगर में तो अपनी ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाई। पर उन्होंने उत्तराखंड के पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ नहीं की।”
प्रयाग पांडे के तर्क वजनदार हैं पर इससे अलग उत्तराखंड का तर्क गले नहीं उतरता। यूपी की सरकारों ने उत्तराखंड के लिए बहुत कुछ किया था और यूपी की मजबूत प्रशासनिक और पुलिस मशीनरी इस राज्य को ज्यादा मजबूत बना रही थी। इसका नमूना हाल ही में जून 2013 में आए सैलाब से ही देखने को मिल गया। जब अलग उत्तराखंड की सरकार इससे निपटने में एकदम नाकाम रही और इस जलजले की जिम्मेदार भी वह खुद थी। उत्तर प्रदेश के समय 1962 में 2013 की तुलना में ज्यादा बड़ा जलजला आया था पर न तो इतने अधिक जान माल का नुकसान हुआ था न इंफ्र्रास्ट्रक्चर का। संयुक्त उत्तर प्रदेश का जब हमें नक्शा समझाया जाता तो बताया जाता था कि भारत के नक्शे में जो हिस्सा गर्दन उठाए शेर का है वह उत्तर प्रदेश है। पर अब गर्दन कट गई है। न तो अलग उत्तराखंड विकास कर पाया और बाकी का उत्तर प्रदेश। देवभूमि के हट जाने के कारण शेष उत्तर प्रदेश दानवीय ज्यादा लगता है।
ऐसा ही दुख तेलांगना के अलग हो जाने के कारण विशालांध्र केे लोगों को हुआ होगा। जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने 1946 से 1951 तक पृथक तेलांगना आंदोलन चलाया था तब इसी कांग्रेस पार्टी ने आंदोलनकारियों का बुरी तरह दमन किया था आज वही कांग्रेस सीमांध्र के लोगों का कर रही थी। इससे बड़ा आंदोलन तो अलग दार्जिलिंग के लिए सुभाष घीसिंग ने चलाया था लेकिन पश्चिम बंग सरकार ने दार्जिलिंग को अलग नहीं होने दिया। बस एक हिल कौंसिल देकर छुट्टी पा ली।
छोटे राज्यों की शुरुआत भाजपा ने अपने हितों के लिए की थी इसीलिए यूपी, बिहार और मध्यप्रदेश को काट डाला गया था। कांग्रेस तो बड़े राज्यों की हिमायती थी उसने ऐसा क्यों किया?