इज कानपुर अ डाइंग सिटी?

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इज कानपुर अ डाइंग सिटी?
शंभूनाथ शुक्ल
मैं मूलरूप से कानपुर का रहने वाला हूं। यहीं पैदा हुआ, पढ़ाई लिखाई की और सीपीआई (एमएल) का सपोर्टर रहा उनकी हर गतिविधि में साथ रहा। बहुत से लोगों को करीब से देखा। हर राजनेता को, पत्रकार को और व्यापारियों को भी। जब यहां रहा तो जीविका चलाने के लिए हर तरह के काम किए। काफी उम्र के बाद मैने पत्रकारिता में सेटल होने की ठानी और साल 1980 में मैं वहां के एक बड़े अखबार दैनिक जागरण से जुड़ा। दैनिक जागरण के मालिक और संपादक स्वर्गीय नरेंद्र मोहन खुद अपने अखबार में रखे जाने वाले हर पत्रकार का इंटरव्यू करते थे इसलिए उन्होंने ही मेरा भी साक्षात्कार किया और उपयुक्त पाये जाने पर दैनिक जागरण में उप संपादक (प्रशिक्षु) पर मेरा चयन हो गया। नरेंद्र मोहन जी संपादक ही नहीं पत्रकार की प्रतिभा को पहचानते भी थे। तब कानपुर में दैनिक जागरण के संयुक्त संपादक थे स्वर्गीय हरिनारायण निगम। निगम साहब ने मुझे जल्द ही अखबार के प्रसार क्षेत्र में आने वाले कस्बों और जिलों की विशेष कवरेज के लिए भेजना शुरू किया और मेरा यह प्रयास रंग लाया। अखबार दूर देहाती क्षेत्रों में लोकप्रिय होने लगा। तब मैने कुछ विशेष स्टोरीज कीं मसलन मध्य उत्तर प्रदेश में ग्रामीण अपराधों का सामाजिक आधार विषय पर पूरा समाज शास्त्रीय शोध कर डाला। दरअसल ये वे दिन थे जब मध्य उत्तर प्रदेश में मध्यवर्ती जातियों का वर्चस्व होने लगा था और यादव, कुर्मी, काछी, लोध व मल्लाह आदि जातियां चूंकि ब्राह्मणों-बनियों तथा कायस्थों द्वारा गांव से पलायन कर जाने के कारण उनकी खाली जगह को भरने को बेचैन थीं। आर्थिक रूप से तो अब वे बटैया नहीं खुद कास्तकार बन गए थे पर सामाजिक रूप से वे पिछड़े थे। ठाकुर उन्हें पनपने नहीं दे रहे थे और वे अब सारी अगड़ी जातियों के पेशे खुद अख्तयार करने को आतुर थे। मध्य उत्तर प्रदेश के दस्यु और अन्य अपराधी इन ठाकुरों के बगलगीर थे इसलिए अब मध्यवर्ती जातियों से भी दस्यु उभरने शुरू हुए। वे खुद को बागी कहते यानी कि समाज से बगावत करने वाला। कोई भी छोटा-मोटा अपराधी तमंचा लेकर जंगल या बीहड़ में कूद जाता और दस्यु सम्राट कहलाने लगता। वह अपने समाज का राबिनहुड बन जाता और लोग उसकी पूजा करने लगते। मैने इस नई सामाजिक व्यवस्था को गांव-गांव जाकर महसूस किया और खूब लिखा। जल्द ही मैं कानपुर दैनिक जागरण में सदियों से जमें पत्रकारों की आँख की किरकिरी बन गया और वे मुझे हटवाने के लिए कुचक्र रचने लगे। जागरण के कानपुर दफ्तर एक से एक धाकड़ कनपुरिये थे और अधिकतर कनौजिये ब्राह्मण भी। वे मुझे उखाडऩे में कामयाब रहे। हालांकि मुझे उखाडऩे के लिए उन्हें मेरे ऊपर शारीरिक रूप से हमला करवाना पड़ा पर कुछ चीजों पर आप काबू नहीं पा सकते।

लेकिन मेरा वहां से उखडऩा मेरे लिए बेहतर ही रहा। जनसत्ता की पहली टीम में ही मेरा चयन हो गया। खासकर मध्य उत्तर प्रदेश में ग्रामीण अपराधों का सामाजिक आधार पर मेरी वह थीसिस जनसत्ता के प्रधान संपादक स्वर्गीय प्रभाष जोशी को बहुत पसंद आई। मुझे उन्होंने एडिट पेज पर रख लिया। लेकिन यह बहुत बोरिंग काम था। सुबह 11 से शाम 5 की ड्यूटी ठीक सचिवालय में काम कर रहे बाबुओं की तरह। मेरा मन ऊबने लगा। कानपुर जागरण से आए मेरे अन्य साथी राजीव शुक्ल और सत्यप्रकाश त्रिपाठी जनरल डेस्क पर थे और कभी-कभी वे डेस्क प्रभारी का रोल भी निभाते। राजीव और मैं चूंकि एक ही मकान में लोधी कालोनी में रहते और राजीव मुझसे जनरल डेस्क के किस्से बताता तो मेरा मन और ऊबने लगता क्योंकि मुझे जिनके बीच निरंतर रहना पड़ता वे सब दिल्ली के धाकड़ पत्रकार और उतने ही रौब-दाब वाले। सब के सब सहायक संपादक जहां तक पहुंचने के लिए मेरे को कम से कम चार सीढिय़ां पार करनी पड़तीं। ये सहायक संपादक यानी सर्व श्री बनवारी, हरिशंकर व्यास, सतीश झा मेरे साथ बहुत अच्छा व्यवहार करते पर मेरा मन नीचे जनरल डेस्क पर काम करने को ललचाने लगा। प्रभाष जी ने खूब लालच दिए पर मैं नहीं माना और अंतत नीचे जनरल डेस्क पर पहुंच गया। पर तब तक नीचे का सीन बदल चुका था। जो मेरे साथ आए थे वे अब वहां सीनियर हो चुके थे और राजीव शुक्ल रविवार में विशेष संवाददाता बनकर जा चुके थे। हालांकि इसके पूर्व ही वे जनसत्ता मेें ही मेरठ के संवाददाता बनकर चले गए थे। अब यह तो संभव नहीं था कि मैं उन लोगों के अंडर में काम करता जो कभी मेरे ही बराबर थे इसलिए प्रभाष जी ने एक नई डेस्क बनाई राज्य डेस्क और मुझे उसका प्रभारी बनाया तथा आठ और उप संपादकों की टीम दी। तथा यूपी, एमपी, राजस्थान व बिहार का जिम्मा।

शादी मेरी तब ही हो गई थी जब मैं कालेज में था। पत्नी भी उसी कालेज में थीं। कुछ दिनों की देखादेखी के बाद ही हम परिणय सूत्र में बंध गए थे। चूंकि वे भी कानपुर की इसलिए हमें दिल्ली बहुत रास न आती। अक्सर महीने-दो महीने में ही कानपुर जाने को मन तुड़ाने लगता और पूरी की पूरी सैलरी इस आवाजाही में ही खप जाती। हमारे मित्र राजीव शुक्ल भी शुरू से इसी प्रवृत्ति के थे पर बाद में वे दिल्ली के ऐसे हुए कि शिखर तक पहुंच गए और इसमें कोई शक नहीं कि यह उनकी यात्रा का हिस्सा है, उनका गंतव्य नहीं।
फिर एक दौर वह भी आया कि दुर्भाय वश मैं कानपुर में में ही 19 अगस्त 2002 को अमर उजाला अखबार का स्थानीय संपादक बन कर आ गया। इसके बाद तो जीवन यात्रा में ब्रेक लग गया। अमर उजाला के नवोन्मेषक स्वर्गीय अतुल माहेश्वरी ने मेरा चयन किया था। चूंकि उस समय जनसत्ता के कलकत्ता संस्करण में मुझे सारी सुविधाएं मिलाकर करीब 60 हजार रुपये मासिक मिलता था इसलिए उन्होंने मुझे यही वेतन दिया। 12-13 साल पहले कानपुर में यह वेतन काफी नहीं तो भी मजे का था। लेकिन इस शहर में रो-रोकर मांगने वाले इतने ज्यादा हैं कि मैं पसीज जाता और हर उस आदमी की मदद कर देता जो मेरे ही पैसे से मेरे ही सामने शराब पीता, ऐश करता और मैं चुपचाप देखता रहता। रोज घर पर ऐसे लोगों का तांता लगा ही रहता। यहां के लोग यजमानी वृत्ति पर जीते हैं यानी किसी की भी आँख में धूल झोंककर पैसा निकाल लेने की कला में माहिर हैं। खासकर यहां का यूपीआईट और उनमें भी ब्राह्मण। यहां आकर बसे अन्य समुदाय यथा- पंजाबी, खत्री और मारवाड़ी अपनी मेहनत पर और अपने पेशेगत ईमानदारी पर जीना जानता है। लेकिन ठेठ कनपुरिये या तो रंगदारी वसूलते हैं अथवा डग्गामारी कर पैसे कमाकर सारी की सारी कमाई दारूबाजी व दारूखोरी में उड़ाना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं।
मैने जब अतुलजी को कहा कि भाई साहब आप मुझे कानपुर मत भेजिए क्योंकि वह मेरा शहर है और वहां हर आदमी मेरे पास कोई न कोई सिफारिश लेकर चला आएगा तो अतुल जी बोले- शुक्ला जी यही तो आपकी परीक्षा है और आपको कानपुर की हर तरह की जानकारी भी तो होगी। मुझे खुशी है कि मैं उनकी इस परीक्षा में खरा उतरा। मैने में ही 19 अगस्त 2002 को अमर उजाला ज्वाइन किया और सिर्फ छह महीने के भीतर मैने अखबार का प्रसार सिटी में एक लाख तक पहुंचा दिया। अतुल जी ने मुझे प्रशस्ति पत्र भेजा और कहा कि अखबार संपादक का होता है और सिर्फ वही किसी अखबार को अपने पाठकों के बीच लोकप्रिय बना सकता है।
लेकिन मेरा निजी जीवन चौपट हो गया। पैसे तो लोग लूटते ही रहे मेरा सुख चैन भी छीन लिया। मुझसे मिलने शहर की हर बड़ी शख्सियत आती। चाहे वे राजनेता हों अथवा नौकरशाह या उद्यमी। कई बार ये लोग मेरे न चाहते हुए भी मेरे घर आ जाते। चूंकि मेरा परिवार काफी दरिद्र था इसलिए मेरे हर रिश्तेदार चाहते कि मैं उनकी सिफारिश करवा कर कोई ठेका दिलवा दूं किसी की नौकरी लगवा दूं अथवा किसी को कोई भूखंड दिलवा दूं। इससे ऊपर बेचारे सोच भी नहीं सकते थे। मैं यह सब काम नहीं करता और न इन्हें प्रोत्साहित करता हूं। मैने जीवन में मुफ्त का कुछ नहीं लिया उलटे अपनी सैलरी का 25 प्रतिशत हिस्सा जकात यानी दान में ही खर्च किया है। सो मैं कहता कि अगर किसी को कोई तकलीफ है तो मुझसे ले लो मैं किसी की सिफारिश नहीं करूंगा। नतीजा यह निकला कि अधिकांश मिलने वाले मेरे विरुद्ध अनर्गल प्रलाप करने लगे। हर कोई मेरा चाल, चरित्र और चेहरे पर टिप्पणी करने लगा कि एक तो मैं घमंडी हूँ और दूसरे कान का कच्चा हूँ। और तीसरा जो हर सफल आदमी पर आरोप लगता है कि मेरा चरित्र ठीक नहीं है। मैं बंदरघुड़कियों से नहीं डरा और जो मुझे उचित लगा वही किया। अखबार के अंदर प्रबंधन भी मेरे विरुद्ध हो गया और कारपोरेट आफिस तक ऐसी-ऐसी अफवाहें फैलाई गईं मानों मैं कोई खलनायक हूं। वह तो शुक्र था कि अतुल जी मुझे पसंद करते थे इसलिए ऐसी अफवाहें मेरा कुछ न बिगाड़ सकीं।
कानपुर से जाने के बाद भी हर महीने मेरा कानपुर आना-जाना लगा रहा। एक तो पिताजी अकेले रहते थे और दूसरे मेरी दोनों छोटी बहनें भी। यहां तक कि एक बेटी का विवाह भी यहीं हुआ था। परिवार के लोगों से मिलने की इच्छा हर एक को होती है मैं कोई अपवाद तो नहीं। इसलिए आता-जाता रहा। अखबारी जीवन से मुक्त होने के बाद कानपुर प्रवास कुछ ज्यादा दिनों तक का होने लगा। मैने पाया कि कानपुर में जीवन में स्पंदन नहीं है। यह एक मरता हुआ शहर है और यहां के लोग हरदम निराशा में घिरे रहते हैं। कानपुर किसी के जीवन में उत्साह क्यों नहीं पैदा कर पाता? हर व्यक्ति चिड़चिड़ा, दंभी और हठी भी है। नौकरियां यहां हैं नहीं, व्यापार मंदा है लेकिन लोग जी रहे हैं तो आत्मविश्वास खोकर या कुछ लोग ऐसे हैं जो परले दरजे के बेईमान और धूर्त हैं अलबत्ता वे मजे में हैं। जो जितना बड़ा बेईमान उतना ही सफल वह है। लेकिन यह तो सही है कि कानपुर में लाइफ नहीं है, स्पंदनहीन है यह शहर और यहां जीने के लिए सिवाय बेईमानी, धूर्तता और मक्कारी के और कोई रास्ता नहीं बचा।
पर फिर भी कानपुर में अभी कुछ लोग हैं जिन पर इस शहर को गर्व हो सकता है। जो इस शहर में बैठकर तमाम सारे क्रिएटिव कामों में लगे हैं। कोई साहित्य रच रहा है तो कोई चुपचाप मूर्तियां गढ़ रहा है। कोई बच्चों की जिंदगी संवारने में लगा है तो कोई कोई बुजुर्गों को नया जीवन दे रहा है। एक मरते हुए शहर की यह कला भी उसे अन्य तमाम शहरों से अलग करती है और लगता है कि कुछ तो डिफरेंट हैं कानपुर में।

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Walk without Purpose

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जिंदा रहना है तो आवारगी को बचाओ मित्रों!
बहुत लोग मुझे समझाते हुए कहते हैं कि शंभू जी आप फिजूल में घूमा करते हैं अथवा फिजूल में फेसबुक पर समय नष्ट किया करते हैं। आप कोई पुस्तक क्यों नहीं लिखते? मेरा उनसे यही जवाब होता है कि मुझे कोई धर्मोपदेशक नहीं बनना कि मैं संवाद को एकपक्षीय कर दूं, एकालाप करने लगूं। मेरे लेखन में जो विविधता, निडरता और निष्पक्षता है तो मेरी इसी आवारगी की वजह से। पर आवारगी का मतलब वही समझेगा जो आवारा हो, मस्त हो और अपना सब कुछ खाक कर हमारे साथ चलने की हिम्मत कर सके। मैं कभी भी लीक में नहीं बंधा और उसी लाइन पर नहीं चला जो सीधी आपके घर को जाती है। कभी तो लीक तोड़ो और नदी की धारा के खिलाफ चलो। पर अपने यहां तो अब आवारगी का मतलब बदचलनी हो गया है और यह नैतिकता बांधी आर्य समाज ने अर्थात पश्चिम से आक्रांत लोगों ने। बदचलनी शब्द उन लोगों ने गढ़ा जो अनेक बंदिशों में समाज को कैद रखने के हामी थे। वे जो एक पुस्तक और एक नेता को मसीहा मानते थे और हैं। खूब पढ़ो, गुनो और सोद्देश्य जीने का नारा देने वालों ने एक पूरी पीढ़ी को पतन के गर्त में धकेल दिया। ध्यान रखिए मित्रों पुस्तकें और गहन अध्ययन आपके स्वतंत्र चिंतन व मनन को बाधित करती हैं। आप वही सोचते हैं जो पुस्तक लेखक आपसे सोचवाना चाहते हैं और आप चाहे-अनचाहे उन पुस्तकों के निष्कर्ष से बंध जाते हैं। फिर आप एकालाप करने लगते हैं इसिलए मेरी मानों और इस फिजूल की पढ़ाई-लिखाई को तिलांजलि दो और कुछ आवारगी करो ताकि कुछ सोच सको किताबों की दुनिया से बाहर आकर। यूं ही निरुद्देश्य घूमो। दीन-दुनिया से बेखबर होकर। तब आप पाओगे कि आपकी सोच और आपका चिंतन तथा जगत व जीवन के बारे में आपकी अवधारणा सबसे अलग है। किताबों की दुनिया में कैद हुए डॉ. अंबेडकर और किताबों की दुनिया से फ्री रहे गांधी। किताब आपको बांध देती है और पूरे समाज से काट देती है। इसलिए हर तरह की पुस्तकों को नष्ट करो तब ही आजाद चिंतन कर पाओगे और फ्री थिंकर बन पाओगे। मेरा मानना है कि प्रिंस क्रोपाटकिन लेनिन से ज्यादा महान थे।

हिंदू और मुस्लिम दो आँखें

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मध्यकाल का इतिहास

शंभूनाथ शुक्ल

हमारे यहां सबसे अंधेरा है मध्यकालीन इतिहास। इसे उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जैसे अंग्रेजों ने हमें पढ़ाया वैसा ही हम जानते हैं। इसी का नतीजा है हिंदू मुस्लिम परस्पर घृणा और असामंजस्य। हिंदू मुस्लिम संबंध कोई आज के नहीं हजार साल से अधिक पुराने हैं पर उनके साथ बरतने का इतिहास हमारे पास सिर्फ 1857 के बाद का है।

– अगर हिंदू मुस्लिम संबंध इतने ही गड़बड़झाले वाले होते तो आखिर क्या वजह थी कि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में सब ने बहादुर शाह जफर को ही अपना नेता माना।

– आखिर क्यों मध्यकाल के सारे काव्य में मुसलमानों और मुस्लिम शासकों के खिलाफ एक भी शब्द नहीं सुनाई पड़ती। जबकि तमाम कवियों ने मुसलमानों के धार्मिक कर्मकांड की खूब खिल्ली उड़ाई है। जैसे कबीर, पलटू, दादू आदि ने।

– भक्त कवि तुलसीदास ने पूरे काव्य में कहीं भी मंदिर तोड़े जाने या मुसलमान शासकों की कथित असहिष्णुता पर कुछ भी नहीं लिखा।

– मुगल शासक आगरा से हिंदुस्तान पर राज करते थे पर उनकी ही नाक के नीचे मथुरा में भक्त कवियों का जमावड़ा था और उनमें से किसी ने भी मुगलों यहां तक कि औरंगजेब के कथित अत्याचारों पर कुछ नहीं लिखा।

– जबकि यही कवि अकबर द्वारा फतेहपुर सीकरी बुलाए जाने पर नहीं जाते थे और उलटे ताना देते थे- संतन को कहा सीकरी सो काम, आवत जात पनहियां टूटी बिसर गए हरिनाम।

– गुरु नानक ने बाबर के संदर्भ में एक जगह बस इतना ही लिखा है- खुरासान खसमाना कीया, हिंदुस्तान डराया।

– अलाउद्दीन खिलजी के समय मलिक मोहम्मद जायसी थे और उन्होंने अपने सारे काव्य में हिंदू धर्म के विरुद्घ कहीं कुछ नहीं लिखा। जायसी ने यह जरूर लिखा है कि ऊपर वाले ने कई धर्म बनाए और उनमें से मोहम्मद का धर्म श्रेष्ठ है। यहां आग्रह दुराग्रह कहीं नहीं है।

– मुस्लिम पठान शासक यदि हिंदुओं से जजिया लेते थे तो मुस्लिम प्रजा से जकात। दोनों लगभग समान थे।

– धन के लिए यदि मुस्लिम शासकों ने मंदिर तोड़े तो हिंदू शासकों ने भी तोड़े।

– अगर मुस्लिम शासक अत्याचारी थे तो भारत में दिल्ली के अलावा जो हिंदू सुल्तानेट थे वहां रहने वाले जरूर इन शासकों के विरुद्घ कुछ लिखते।

– रीति काल में भूषण ने शिवाजी की वीरता का बखान करते हुए उन्होंने उन्हें म्लेच्छों का उच्छेदक बताया है। पर यहां म्लेच्छों का मतलब विदेशी है और शिवाजी को पहले बीजापुर के सुल्तान से बाद में हिंदुस्तान के बादशाह से भिडऩा पड़ा था इसलिए ऐसा लिखा है वर्ना भूषण ने कहीं भी मुस्लिम शासकों को हिंदू द्वेषी नहीं बताया है।

– औरंगजेब अगर हिंदू कुल द्रोही होता तो महाराजा जसवंत सिंह उसके मुख्य सलाहकार क्यों होते?

– औरंगजेब के समय कौन सा मंदिर तोड़ा गया, इसका उल्लेख जरूर मिलता क्योंकि तब तक राजपूताना, बुंदेलखंड और महाराष्ट्र और मालवा में हिंदू शासक बहुत ताकतवर थे।

– मथुरा और आगरा में जिस गोकुल जाट के विद्रोह का जिक्र है वह धार्मिक कम बल्कि औरंगजेब द्वारा अंतिम दिनों में कर बढ़ा देने के कारण हुआ।

– परवर्ती काल में 17वीं और 18वीं सदी में कहीं भी मुस्लिम शासकों द्वारा किसी तरह के हिंदू विरोधी कार्यों का ब्योरा नहीं मिलता। चाहे वह मथुरा के वैष्णवन की वार्ता का साहित्य हो अथवा सखी संप्रदाय या ललित किशोरी पंथ का या राधा संप्रदाय का।

– जहांगीर के बारे में कहा जाता है कि उसने इटावा के 36 हजार ब्राह्मणों का सिर हाथियों से कुचलवा दिया था। पर एक तो गंग कवि अकबर के दरबारी कवि थे और उनकी जहांगीर से दुश्मनी जग जाहिर थी लेकिन इस घटना का जिक्र कहीं मिलता नहीं है बस इटावा और आसपास ऐसी जनश्रुति है।

– संगीत सम्राट तानसेन अपनी मर्जी से ब्राहमण से इस्लाम पंथानुयायी बने थे। यह भी जनश्रुति ही है। वर्ना उन्हीं के समकालीन बीरबल तो नहीं बने।

– दूसरी सबसे अहम बात अगर मुस्लिम शासक धन या तलवार से इस्लाम फैलाते तो हिंदुओं की तमाम जातियां मुस्लिम होतीं पर तथ्य यही बताते हैं कि मुस्लिम धर्म अधिकतर राजपूतों और पेशेवर जातियों ने ही अपनाया। कृषक जातियों में उसका असर कम पड़ा। ब्राह्मण और भूमिहार भी इस्लाम की शरण में गए। मगर सबसे कम संख्या में दलितों ने इस्लाम पंथ अपनाया।

– और इसकी वजह थी कि मुस्लिम शासकों ने हिंदू धर्म की सामाजिक संरचना से छेड़छाड़ नहीं की।

– वे अपने में मगन रहे और हिंदू अपने में।

– अलबत्ता यूरोपियन खासकर ब्रिटिशर्स जब भारत आए तो उन्होंने सबसे अधिक धर्मान्तरण किया। मुसलमानों का भी और हिंदुओं का भी। इसीलिए हिंदू मुसलमान दोनों ही समुदायों में आचार भ्रष्ट का मतलब ख्रिस्तान हो जाना था।

– पर भाइयो अब ब्रिटिशर्स भी भारत से भागकर जा चुके हैं और मुसलमान अपने ही भाई हैं सो अब छोड़ो रार और परस्पर भाइयों की तरह रहो।