Ugrasen!!!

Standard

उग्रसेन को भूल गए नेताजी!

अगर आप इतिहास से एकदम अनभिज्ञ हैं तो खुदा ही मालिक है। सोशलिस्ट मूवमेंट की बात करने वाले अब के मध्यवर्ती जातियों के नेता उग्रसेन को भूल गए। जब यूपी विधानसभा में 230 सीटें हुआ करती थीं तो उग्रसेन देवरिया जिले के सलेमपुर वेस्ट से जीत कर आते थे। साइकिल से चलने वाले उग्रसेन पूर्वी उत्तर प्रदेश की दबंग राजपूत क्षत्रिय जाति के थे। उन्हें हराया नहीं जा सकता था इसलिए नहीं कि वे कोई दबंग दादू थे या बाहुबली। वे तो निहायत ही सरल, सहज और हर वक्त उपलब्ध रहने और सामान्य-से दिखने वाले राजनेता थे। सदैव साइकिल से चले और मकान तक नहीं बनवा पाए। उनका पहला दर्शन मुझे 1976 में हुआ। उस समय यूपी में एनडी तिवारी मुख्यमंत्री थे और इमरजेंसी का भौकाल। संजय गांधी की ही चला करती थी और कहा जाता था कि एनडी तिवारी संजय की चप्पलें उठाया करते थे, ऐसा पत्रकार खुशवंत सिंह ने अपने बल्ब में लिखा था। यही एनडी तिवारी अपने कालिदास मार्ग स्थित आवास पर जनता दर्शन दे रहे थे कि अचानक लाइन में उग्रसेन प्रकट हुए। और मुख्यमंत्री जी से बोले- तिवारी जी माई बीमार है, चलेगी नहीं एकाध दिन का पेरोल बढ़वा दीजिए (उग्रसेन जी उस समय संभवत: नैनी जेल में बंद थे) । तिवारी जी बिदक गए और अपने स्वभाव के विपरीत कड़ी व तेज आवाज में बोले- “आप अपोजीशन वाले पहले तो बवाल काटते हो फिर चले आते हो बहाने बनाकर पेरोल मांगने”। उस समय कांग्रेस के कानपुर की छावनी सीट से विधायक श्याम मिश्रा वहीं खड़े थे। वे तत्काल आगे बढ़े और मुख्यमंत्री की कलाई पकड़ कर बोले- “नारयण दत्त! किसके साथ ऐसी बदतमीजी कर रहे हो? पता है ये उग्रसेन हैं जो जीवन भर सत्य और निष्ठा व गरीबों की लड़ाई लड़ते रहे। कभी किसी की चापलूसी नहीं की”। तिवारी जी घबरा गए और फौरन पीए से बोले- “अरे बढ़ाओ-बढ़ाओ इनकी पेरोल”। उग्रसेन के प्रति मेरे मन में अपार आदर उत्पन्न हुआ। उग्रसेन जी से दूसरी मुलाकात चित्रकूट में हुई 1980 में। वहां बाबूलाल गर्ग लोहियाइट थे और स्थानीय संस्कृत कालेज में प्राचार्य। वे डॉक्टर लोहिया जी की मृत्यु के बाद भी उनका शुरू करवाया रामायण मेला हर वर्ष करवाते थे। वहीं पर उग्रसेन जी भी आए हुए थे और एक धर्मशाला में टिके थे। जबकि मैं यूपी गवर्नमेंट के पर्यटक आवास गृह में। वहां पर एक दिन वे चित्रकूट भ्रमण पर निकले पैदल ही अपनी पत्नी व बेटी के साथ। उनकी पत्नी सामान्य-सी घरेलू महिला। सीधे पल्ले की जनानी धोती पहने और भोजपुरी बोलती हुई। एकदम वैसी ही जैसी कि अपने अध्यक्ष जी यानी चंद्रशेखर जी की पत्नी थीं। बेटी भी कुछ सिलबिल्ली टाइप (यहां सिलबिल्ली का मतलब सीधी-सादी है) लगी। मैने कहा कि उग्रसेन जी कोई गाड़ी वगैरह ले लीजिए तो बोले बेचारे गर्ग जी इतना बड़ा आयोजन कराते हैं, उन्हें क्या कष्ट देना और पैदल ही कामद गिरि, सती अनुसूया व गुप्त गोदावरी हो आए। उनकी बेटी के लिए मैने वहां आए बांदा के प्रखर पत्रकार सुरेश गुप्ता (जिनका बाद में माफियाओं ने मर्डर कर दिया था) से कह कर साइकिल की व्यवस्था करवा दी थी। ऐसे विधायक और सांसद यदि आपकी याद में हों तो बताएं। उनका ब्योरा मैं अपने चचा मुलायम सिंह यादव के पास भिजवा दूंगा ताकि कुछ तो शर्म करें। मुलायम सिंह जी कभी-कभी सोशलिस्टों की भी याद कर लिया करें।

आभासी दुनिया की ताकत और उसके रिश्ते!

Standard

आभासी दुनिया की ताकत और उसके रिश्ते!

शंभूनाथ शुक्ल

जो लोग अभी साल भर पहले तक फेसबुक को एक आभासी मीडिया समझकर उसका मजाक उड़ाते थे और मुझे भी नसीहत दिया करते थे कि आप भी शंभूजी किस लौंडियाँह में लगे रहते हो। आज वही उसके नतीजों को लेकर सीरियस होते जा रहे हैं। अमर उजाला के संपादक पद से रिटायर होने के बाद मैं फेसबुक पर आया और देखते ही देखते मेरी पांच हजारिया मित्र सूची पूरी हो गई। जबकि मेरे पास कोई पद नहीं था और मैं खुद सड़क पर वक्त के हिचकोले खा रहा था। चूंकि मैं पूरा जीवन एक ईमानदार, कर्मठ और कर्त्तव्यपारायणता की जिंदगी जी थी इसलिए जुगाड़ू मित्रों का अभाव था। अन्य संपादकगण मेरे रूखे व्यवहार (अनपॉलिस्ड बिहैवियर) और चापलूसी न करने की मेरी आदत तथा मेरे गँवई संस्कारों से चिढ़े रहा करते थे। रिटायर होने के बाद जब मैं अपने एक बालसखा संपादक मित्र से काम मांगने गया तो उन्होंने काम तो दिया नहीं उलटे यह जरूर बता दिया कि वसुंधरा लौटने की बस कहां से मिलेगी। वे तो जब बाहर छोडऩे आए तो और अपनी वैगन कार के पास में मेरी टयोटा इनोवा मय ड्राइवर के खड़ी देखी तो शरमाने लगे। एक संपादक इसलिए बुरा माने हुए थे क्योंकि वे जिस समूह के मालिक की निंदा मेरे मुँह से सुनना चाहते थे वैसा हो नहीं रहा था। कईयों ने इसलिए छापने से मना कर दिया क्योंकि मैं उनके क्षेत्र का नहीं था अथवा उनकी जाति और थी या उनके दक्षिणपंथी अथवा जातिवादी समाजवादी विचारों से मेरा मेल नहीं था। अब ऐसे में मैं क्या करता। और ऊपर से लिखने की हूक। आखिर जीवन भर कलम जो चलाई थी। मैं अन्य रिटायर लोगों की तरह ताश खेलकर, पार्क में बैठकर गप्पें लगाने अथवा संतान के ऊपर बोझ बन कर जिंदगी काटने का इच्छुक नहीं हूं। जब तक हाथ-पाँव सलामत हैं आप क्यों किसी पर निर्भर बनें उलटा होना यह चाहिए कि आप ही सबके लिए नजीर बनें। इसलिए मैने फालतू वक्त काटने की एक तरकीब सोची और वह थी अनवरत लेखन। ऐसा लेखन जो सिर्फ टाइम पास करने के लिए नहीं बल्कि पूरी गंभीरता और तन्मयता के साथ लिखा गया हो। फेसबुक चूंकि इंटरनेट मीडिया है इसलिए यह भी डर था कि सीरियस लेखन शायद इसके पाठक कहीं खारिज न कर दें। उन्हें आज के जमाने का चटपटा हिंग्लिश टाइप का लेखन चाहिए। जिसमें सेक्स हो, नेट हो गैजेट्स हों या फिल्म हो। मगर मैने एक प्रयोग किया तो पाया कि अरे हम जिस युवा और किशोर पीढ़ी को संस्कारहीन और परंपराहीन समझते थे वह तो हमारी पीढ़ी से कहीं अधिक सीरियस और प्रगतिकामी है। यही कारण है कि पहले ही दिन से मेरे मित्रों और फालेअर की संख्या बढऩे लगी और जल्द ही वह इतनी बढ़ गई कि मुझे अलग पेज बनाना पड़ा। मैं ब्लॉग लेखन में आया और उसे भी हाथोंहाथ लिया गया। मेरी भाषा प्रवाहमयी होती है पर वह हिंग्लिश नहीं बल्कि वह भाषा है जो बोली और बरती जाती है जिसमें प्रवाह है लेकिन फालतू के गड्ढे नहीं।

जब आपको हाथोहाथ लिया जाएगा और बिना किसी लालच के तो उत्साह बढ़ेगा ही। मैने वह लिखा जो मैं सर्वोत्तम लिख सकता था। मैने इतिहास पर लिखा, यात्रा वृत्तान्त लिखे, सामाजिक संबंधों और सामाजिक समीकरणों पर लिखा और सब खूब पढ़ा गया बल्कि जिस दिन मैं नहीं लिखता उस दिन मेरे फेसबुक इनबाक्स पर, मेरी मेल आईडी पर और मेरे मोबाइल पर संदेशे आने शुरू हो जाते- सर तबियत तो ठीक है? आजकल लिख नहीं रहे हैं। कभी-कभी जब मैं नाराज होकर फेसबुक से बाहर होने की बात करने लगता हूं तो फौरन लोग उदास हो जाते हैं। ऐसा बेमिसाल प्यार मिला है मुझे अपने फेसबुक मित्रों से और उनके मित्रों से। फेसबुक तो चेन है जो लाखों लोगों तक आपको जोड़ती है। पांच हजार मेरे मित्र हैं और इससे अधिक फालोअर। यही हाल मेरे पेज का है अब सोच लीजिए कि यह संख्या जब उनके मित्रों और उनके ही मित्रों से मिलकर अनेक गुणित होती है तो स्वत: लाखों में पहुंच जाती है।

इस फेसबुक मीडिया में मैने वह लिखा जो मैं लिखना चाहता था पर मेनस्ट्रीम मीडिया की तमाम पेशेगत मजबूरियों के चलते लिख नहीं पा रहा था। सामाजिक समीकरणों पर, संदर्भों पर और राजनीति से लेकर हर विषय तक बेबाक होकर टिप्पणियां कीं। कई नामी-गिरामी लोग मुझसे चिढ़े नाराज होकर हमले किए और मार देने की धमकियां दीं। लेकिन एक बात वे भूल गए कि जो आदमी दो दशक तक मेनस्ट्रीम मीडिया के कई राष्ट्रीय व बड़े घरानों में संपादक रहा हो उसे कोई ऐरा-गैरा भला क्या छका पाएगा। नतीजा कि वे हार मान गए। लेकिन उनकी हार के पीछे यही मेरे आभासी मित्रों की ताकत रही। जब भी किसी ने कुछ कहा तो दूर बेगूसराय में बैठे मित्र इफातुर रहमान ने कहा कि सर चिंता न करें जहां आपका पसीना गिरेगा मेरा लहू गिरेगा। भाजपा के ही पूर्व विधायक रूप चौधरी ने कहा कि सर दो हजार गुज्जर वीर आपके दरवाजे खड़े हैं कतई चिंता न करिएगा। ऐसे एक नहीं हजारों वीर मेरी सुरक्षा में रहे। वे कांग्रेसी थे, भाजपाई थे, सपाई थे और बसपाई थे व हैं तथा रहेंगे। हिंदू हैं, मुसलमान हैं, सिख हैं व ईसाई व जैन-बौद्घ। वे हैं, यादव-कुर्मी-लोध व गूजर हैं तथा असंख्य जाट हैं।

आज मुझे अपने इस मीडिया संस्थान से इतना प्यार है कि मुझे मेनस्ट्रीम मीडिया के काबिल से काबिल संपादक की तुलना में ज्यादा ज्ञान है कि लोग क्या पढऩा चाहते हैं और क्या खारिज करना चाहते हैं। किस बात पर ताली पड़ेगी और किस बात पर गाली। यह माकेर्टिंग का फंडा हो सकता है लेकिन मेरा मानना है कि लोकप्रियता अर्जित करना और वह भी संवैधानिक दायरे में रहकर सबसे बड़ी उपलब्धि है। फेसबुक मेरा लिटमस टेस्ट था और मैने उसे पास किया। आज मुझे पता है कि मुझे अपना शेष जीवन पूरे सम्मान के साथ बिताने के लिए न तो निराश होना पड़ेगा न किसी की नसीहत माननी होगी। यह फेसबुक की भारी जीत है। फेसबुक आज वह मीडिया बन चुका है जो सरकारें हिला सकता है और बना भी सकता है। जो नायक गढ़ सकता है और अगर वह खरा न उतरा तो उसे नायकत्व से खारिज भी कर सकता है।

मेरी एक फेसबुक पोस्ट पर उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बुजुर्ग पत्रकार साथी महरुददीन खाँ को पूरी पुलिस सुरक्षा दिलाई और उनके प्रमुख सचिव श्री नवनीत सहगल अक्सर हालचाल लेते रहते हैं। इसी फेसबुक पर ध्रुव गुप्त से परिचय हुआ जो बिहार के आईजी पुलिस रह चुके हैं और पुलिस को मानवीय संस्कार प्रदान करने के लिए सदैव प्रयासरत रहे। एसआर दारापुरी मिले जिन्होंने मुझे डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को फिर से पढऩे की प्रेरणा दी। कंवल भारती मिले और अतुल गंगवार मिले। दिव्यांशु पटेल मिले, चंचल बीएचयू मिले और यायावर राजीव उपाध्याय से मुलाकात हुई। ब्रजमोहन प्रसाद, अमित चतुर्वेदी और जगदीश्वर चतुर्वेदी व पंकज चतुर्वेदी मिले। विजय पुष्पम पाठक मिली जो शायद मेरठ की हैं जहां से मेरा लगाव संभवत: कानपुर के बाद सबसे अधिक है। आर्य समाजी वीर डा. अजीत मिले, मुंहफट बीएस गौतम मिले, मस्त मौला जफर इरशाद मिले और डॉ. इमरान इदरीस मिले जो एक दिन मुझसे मिलने के लिए बदायूं से भागे-भागे आए तब जब मैं कानपुर सेंट्रल स्टेशन पर स्वर्ण शताब्दी एक्सप्रेस के एक्जीक्यूटिव कोच में चढ़ ही रहा था। उन्होंने फटाक से मेरा सूटकेस संभाला और ठीक पुत्र की भांति भावुक होकर विदा किया। कुमार कुलदीप, राजीव रंजन उपाध्याय, देवेंद्र यादव, देवेंद्र सुरजन, गीता देव, मैत्रेयी पुष्पा, सुधा अरोड़ा, सुनीता सनाढ्य पांडेय, सुधा शुक्ला, संगीता पुरी, नूतन यादव मिलीं। यहीं पर मिले डॉ गिरीश मिश्र और डॉ वीरेंद्र यादव जिन्होंने मुझे अच्छी और विचारपूर्ण पुस्तकें पढऩे की प्रेरणा दी। और तमाम असंख्य परिजन। सबके नाम तो नहीं लिख पा रहा लेकिन उनका स्नेह नहीं भुलाया जा सकता।

यह दिलचस्प नहीं है कि फेसबुक से दोस्ती हुई और एक दिन मोहित खान आगरा का पंछी पेड़ा लेकर मेरे आवास पर आ गए। शिवानंद द्विवेदी शहर देवरिया का टिकट लेकर आ गए कि सोशल मीडिया के सम्मेलन में आपको चलना है। पृथक बटोही अपनी गाड़ी लेकर आ गए कि आप को गांधी पीस फाउंडेशन चलना है। वसीम अकरम त्यागी और जमाल अंसारी ने मेरे लेखों को उर्दू में प्रकाशित करने का जिम्मा लिया तो संतोष उपाध्याय ने एक दिन मीठे का थाल ही भिजवा दिया। मोहम्मद जाहिद ने इलाहाबाद से मेरे लिए गांधी जयंती की पूर्व संध्या पर बुके भेजा। लखनऊ के जेमिनी इंटरकांटीनेंटल होटल में जब मैने गत आठ मार्च को फेसबुक लेखकों का एक सम्मेलन किया था तब मित्र सिद्घार्थ कलहंस, हेमंत तिवारी, वीर विनोद छाबड़ा, ताजीन खान, सिद्घार्थ द्विवेदी मनु, जीतेंद्र खन्ना और राकेश तिवारी पूरा दिन उपस्थित रहे। हालांकि मुझे इस बीच एकधिक बार ऐसे तमाम लोगों ने कोसा जो विघ्नसंतोषी होना जिनका गुण है। एकाध निराश बुढउओं ने मेरी लोकप्रियता से चिढ़कर अनर्गल आरोप लगाए तो एक एनआरआई मोहतरमा ने विचारहीनता का आरोप। एक अल्पसंख्यक छोकरे ने गालियां दीं और एक एनआरआई भोंपू ने अपने कम्युनिज्म का छिछोरापन दिखाया। पर उन्हें माफ ही किया जा सकता है। क्योंकि मेरे साथ असंख्य जनता की ताकत रही। लेकिन हां, एक बात अवश्य नोट किया जाए। मैने कभी भी अपने फेसबुक मित्रों को तंग नहीं किया। मसलन कभी बिना किसी वाजिब वजह के किसी को कोई मेसेज नहीं भेजा। कभी भी किसी को टैग नहीं किया और न ही कभी किसी पर कोई अभद्र टिप्पणी की। मेरा मानना है कि हमें बिलावजह किसी की निजता को भंग नहीं करना चाहिए।

हमारे फेसबुक मित्र और रियल जीवन में मेरे पुत्र का दरजा प्राप्त संजय सिन्हा इसी फेसबुक को मेरे जीवन की बड़ी उपलब्धि मानते हैं। उन्होंने इस उपलक्ष्य में फेसबुक लेखकों की सभा बुलाई है नई दिल्ली स्थित छतरपुर के एक फार्म हाउस में कल सुबह दस बजे से चार बजे के बीच। वे खम ठोक कर कह रहे हैं कि वहां पर वे खिलाएंगे, पिलाएंगे और एक-दूसरे को सुनेंगे व सुनाएंगे। तो मिलिए कल सुबह दस से चार के बीच।

नेहरू के बिना गांधी की फिल्म अधूरी होती!

Standard

शंभूनाथ शुक्ल

जवाहर लाल नेहरू और गांधी जी के बीच के रिश्ते कैसे थे आज तक कोई भी इन्हें समझ नहीं पाया। महात्मा गांधी कट्टर भारतीयता के हामी और दिन की शुरुआत प्रार्थना से तथा समाप्ति भी प्रार्थना से करते थे। वे हर बात का परिष्कार करने के लिए व्रत करते निराहार रहते और आत्मा की शुद्घि करते। इसके विपरीत जवाहर लाल नेहरू कट्टर यूरोपियन दिमाग वाले, पूरी तरह सेकुलर और धर्म-कर्म को इंसान की दुनिया का अंधेरा पक्ष समझते थे। लेकिन नेहरू से अगर गांधी तत्व निकाल दिया जाए तो नेहरू में चिंतन और दर्शन नहीं रहेगा तथा गांधी में से यदि नेहरू को बाहर कर दिया जाए तो उत्साह और कार्यशैली नहीं दिखेगी। यानी दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। गांधी और नेहरू का मिलन कुछ ऐसा ही है जैसे समान लेकिन विपरीत गुण-दोषों वाली शख्सियतों का मिलना। आज जो लोग बिना नेहरू के गांधी को याद करते हैं वे सिर्फ एक ही पक्ष देख रहे होते हैं। बिना नेहरू के गांधी की फिल्म अधूरी है। तब गांधी महज एक चिंतक और साधु नजर आते हैं अपने राजनीतिक चिंतन को यथार्थ में बदलने वाले राजनेता नहीं। एक अगर दर्शन है तो दूसरा उस दर्शन को कार्यरूप में बदलने वाली ऊर्जा। एक अगर अध्यात्म है तो दूसरा उसका भौतिक स्वरूप। इसलिए जो लोग नेहरू और गांधी को अलग-अलग कर देखने के हिमायती हैं उन्हें अपनी सोच बदलनी चाहिए।

यह समझने के लिए दोनों के बीच कुछ कामन और कुछ अलग-अलग फैक्टरों को देखना चाहिए। दोनों ही बैरिस्टर थे और दोनों में ही अपने देश के लिए कुछ कर-गुजरने का जज्बा था। नेहरू में कुछ ज्यादा और गांधी में कुछ कम। दोनों में ही अपने रास्तों की शुचिता को लेकर देसी निष्ठा थी। गांधी में कुछ अधिक पर नेहरू में कुछ कम। लेकिन मकसद एक थे। अब विपरीत गुण-दोष देखिए। नेहरू उस पश्चिमोत्तर प्रांत के अवध इलाके से आते थे जहां अंग्रेजों ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन को विफल करने के लिए स्थानीय जनता का इस बुरी तरह दमन किया था कि किसान सिर उठाना भूल गए थे। जमींदारी की नई रैयतवारी व्यवस्था ने किसानों की कमर ऊपर से तोड़ दी। सदैव खुशहाल और मस्त रहने वाला किसान अपनी सहजता भूल चुका था। उसके ऊपर चौबीसो घंटे जमींदार का डंडा रहता। ऐसे में उसके अंदर एक दयनीयता का भाव आ गया था। विरोध करने की क्षमता वह खो चुका था। यह दयनीय भाव तत्कालीन पश्यिमोत्तर प्रांत के शहरी अभिजात्य में भी था। उनका कुलक और जमींदार वर्ग तो अंग्रेज अफसरों के आगे दंडवत रहता और पीजेंट्री व मजदूर वर्ग अपने काले मालिकों के आगे। अवध के पूरे इलाके में विद्रोह का पहला झंडा चंपारण के राजकुमार शुक्ल ने बुलंद किया था। शुक्ल जी ने गांधी जी को चंपारण बुलाया और बताया कि किस तरह निलहे अंग्रेजों ने वहां की देसी रैयत की जमीन हथिया कर उन्हें नील की खेती करने पर मजबूर कर दिया है। गांधी जी 1916 में चंपारण गए और उसी साल जवाहर लाल नेहरू लंदन से बैरिस्टरी पास कर भारत लौटे। उनके पिता चूंकि पश्चिमोत्तर प्रांत के हाईकोर्ट के नामी वकील थे इसलिए उनकी मंशा थी कि बेटा बैरिस्टर बने लेकिन नेहरू जी लंदन से कम्युनिज्म का पाठ सीखकर आए थे इसलिए उन्होंने पिता की इस मंशा को मानने से मना कर दिया और साफ कहा कि वे देश के लिए कुछ करना चाहते हैं। तब तक सर एओ ह्यूम द्वारा बनाई गई संस्था कांग्रेस अपने परंपरागत अंग्रेज हुक्मरानों से छोटी-छोटी रियायतों को अर्जी लिखकर मांगने वाले अपने चरित्र से बाहर निकलकर आजादी की लड़ाई का मंच बन चुकी थी। इसके अध्यक्ष बाल गंगाधर तिलक ने लखनऊ में सिंह गर्जना की थी- स्वराज्य हमारा जन्मसिद्घ अधिकार है।

गांधी जी का बचपन जिस पोरबंदर इलाके में बीता था वह जूनागढ़ स्टेट का एक रजवाड़ा था। उनके पिता कर्मचंद गांधी उस पोरबंदर इस्टेट के ठिकानेदार (राजा) के प्रधानमंत्री थे। मछुआरों की बस्ती और समुद्री किनारा इसलिए व्यापारी भी खूब थे खासकर जैनी व्यापारी। गांधी जी के पिता के पास तमाम धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के लोग आया करते थे वे अपने-अपने समाज के मानवीय मूल्यों और निष्ठाओं की चर्चा करते। उनकी माँ एक सामान्य घरेलू वैष्णव मत को मानने वाली महिला थीं जिनके अंदर वैष्णव भक्ति भाव कूट-कूट कर भरा हुआ था। गांधी जी ने अपने पिता से सर्वधर्म समभाव सीखा और माँ से वैष्णवी भक्ति। मगर जवाहर लाल नेहरू का परिवार कश्मीरी पंडितों के नैष्ठिक आचार-विचार और उनके पिता मोतीलाल नेहरू के योरोपियन तौर तरीके, सब मिलाकर ऐसा घालमेल था कि नेहरू लंदन जाकर एकदम लंदनिया कम्युनिस्ट बनकर लौटे। उन्हें कोई हिंदुस्तानी राग-बिराग पसंद नहीं था पर इसके बावजूद जवाहर लाल नेहरू खांटी हिंदुस्तानी थे। पहले तो उनके पिता ने जब उनका देश सेवा का प्रण सुना तो उन्हें अवध के किसान नेता बाबा रामचंदर से मिलवाया। लेकिन बाबा रामचंदर के टोटके देखकर नेहरू जी को उनसे कोफ्त हो आई। बाबा रामचंदर बिना शक अवध के किसानों के एकक्षत्र नेता थे लेकिन बाबा ड्रामेबाज भी थे। वे किसानों के बीच आते नहीं थे बल्कि परगट होते थे। बाबा की किसान सभा अपने सम्मेलनों और सभाओं का खुले में मंच लगाती। निर्धारित समय के पूर्व बाबा रामचंदर मंच स्थल के पास के किसी पेड़ की डाल पर छुपकर बैठ जाते और जैसे ही किसान जुटते बाबा डाल से कूदकर मंच पर आ जाते। यह देखते ही किसान चिल्लाने लगते कि बाबा परगट भये। नेहरू जी को इस ड्रामे से चिढ़ हो गई। ऐसे में उनकी मुलाकात गांधी जी से हुई। जल्द ही गांधी को अपने सपनों को पूरा करने का अक्स जवाहर लाल नेहरू में दिखने लगा और नेहरू को मिला अहिंसा का एक ऐसा राजनीतिक चिंतन जिसमें अध्यात्म था और दृढ़ता भी।

नेहरू जी को गांधी जी की अहिंसा और उनका अपरिग्रह तथा बात-बात पर अनशन पर बैठ जाना पसंद नहीं था लेकिन उनकी दृढ़ता और उनके सर्वधर्म समभाव के वे कायल थे। जो बातें वे लंदन से सीखकर आए थे उन सब बातों को हूबहू गांधी जी में देखकर नेहरू अचरज करते। उन्हें भरोसा नहीं होता था कि मोहनदास कर्मचंद गांधी नामका यह अदना-सा शख्स एक दिन अंग्रेजों को भारत से खदेड़ देगा। पर धीरे-धीरे गांधी जी में उनकी निष्ठा बढऩे लगी और जवाहर लाल नेहरू को उन्हीं गांधी की वे सब चीजें अच्छी लगने लगीं जिनके कारण वे इस अंग्रेजी पढ़े-लिखे गुजराती बैरिस्टर को नपसंद करते थे। गांधी जी अपने इस शिष्य की विशालता और उसके अंतरमन की कोमलता को पहचानते थे इसीलिए गांधी जी ने हरदम नेहरू को वरीयता दी चाहे वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस के मुकाबले हो अथवा सरदार बल्लभ भाई पटेल के मुकाबले। यह तथ्य सर्वविदित है कि जवाहर लाल नेहरू का नेतृत्व कांग्रेस में सर्वमान्य नहीं था। असंख्य पार्टी जन उनके विरोधी थे। इसीलिए नेहरू के मामले में गांधी जी को सदैव एक तानाशाह का रोल अदा करना पड़ा। कई बार वे नेहरू के हितों के लिए अड़े और अंतत वे नेहरू को उस कुर्सी तक पहुंचाने में कामयाब रहे जहां पहुंचना नेहरू जी की महात्वाकांक्षा थी। इसकी वजह यह नहीं थी कि गांधी जी ने नेहरू को अन्य लोगों के मुकाबले आगे बढ़ाकर कोई अनुचित कदम उठाया। दरअसल जैसा कि गांधी जी स्वयं कहा करते थे कि मैं कांग्रेस का अकेला डिक्टेटर हूं, वे जानते थे कि नेहरू अकेले ऐसे शख्स हैं जो आजाद भारत को अक्षुण्ण बनाए रखेंगे। इसकी वजह नेहरू का मानवीय हृदय और उनका सेकुलरिज्म। सरदार पटेल शायद भारत को पीछे की तरफ ले जाते और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में भारत एक तानाशाह मुल्क के रूप में पनपता।

जवाहर लाल नेहरू का अपना कोई दर्शन और स्पष्ट राजनीतिक चिंतन नहीं था। वे एक ऐसे सभ्य योरोपियन संस्कारों से लैस थे जिनके अंदर मानवीयता थी और प्रचंड राष्ट्रभक्ति। एक उदारता और विवेकशीलता। शायद यही वजह थी कि नेहरू जी ने देश के लिए जो विकास माडल चुना उसके केंद्र में कोई व्यापारी या पूंजीपति नहीं वरन् आम नागरिक थे। यह नेहरू का ही कमाल था कि आजादी के फौरन बाद भारत अपने पैरों पर खड़ा हो गया जिसे कोई सुभाष जैसा तानाशाह या सरदार पटेल जैसा सामंती राजनेता नहीं खड़ा कर सकता था। जवाहर लाल नेहरू की 125 वीं जयंती पर उन्हें याद कर लेना चाहिए कि नेहरू सदैव गांधी के पूरक रहे और वे जितना गांधी जी के समय में प्रासंगिक थे उतने ही आज भी हैं।

बाबू नारायण दास अरोड़ा

Standard

Naraindas Arora

बाबू नारायण दास अरोड़ा न होते तो विद्यार्थी जी प्रताप न निकाल पाते

शंभूनाथ शुक्ल

भारत में पूंजी की सबसे गलत व्याख्या हुई है। पूंजी अपने आप में एक प्रगतिशील तत्व है लेकिन इसका विशेषण एक दोष बन जाता है। इस पूंजी और पूंजीवाद में फर्क नहीं कर पाने के कारण हमारे देश में पूंजी एक गाली बन गई है। पूंजी न आती तो यह औद्योगिक क्रांति न हुई होती। दुनिया आज भी राजा-महाराजाओं के युग में जी रही होती। उस युग में जो कुलीनतावादी था, श्रेष्ठतावादी था और एक तरह से जातिवादी भी। चाहे वह योरोप हो अथवा एशिया। पर पूंजी के विकास ने समाज को इस सामंती सभ्यता से निकाला। सारे रेनेसाँ और सारे समाज सुधार तथा संचार की सारी क्रांतियां इसी पूंजी की देन हैं। लेकिन भारत में अँग्रेजों ने पूंजी नहीं पनपने दी और हमें सीधे सामंतकाल से पूंजीवाद की सर्वाधिक अनिवार्य विकृति इजारेदार पूंजीवाद में पहुंचा दिया। इसका नतीजा हम पिछले 67 साल से देख रहे हैं। आज वास्तविकता यह है कि न तो हम पूंजीवादी देश बन पाए न समाजवादी और न ही साम्यवादी। हकीकत में हम एक दलाल पूंजीवादी देश के तौर पर विकसित हुए और हो रहे हैं। हमारे पास कुछ भी ‘मेक इन इंडिया’ नहीं है। जो कुछ है अच्छा या बुरा सब अंग्रेजों की देन है। चाहे वह कम्युनिलज्म हो अथवा सेकुलरिज्म का थोथा नारा। सामंतवाद में कम्युनलिज्म और सेकुलरिज्म नहीं होता है वहां एलीटिज्म होता है। यही कारण है कि समाज के हर वर्ग में यहां परस्पर मेक इन इंडिया मिथकीय विकृतियां हैं। खैर बात हो रही थी कानपुर के स्वाधीनता संग्राम और कांग्रेस की एक नामी हस्ती नारायण दास अरोड़ा की। अरोड़ा जी का परिवार पंजाब के किसी स्थान से आया था और कब आया तथा कहां से आया यह किसी को नहीं पता। न तो अरोड़ा जी ने इसमें दिलचस्पी ली न औरों ने पर यह सच है कि अरोड़ा जी ठेठ कनपुरिये थे, कट्टर कांग्रेसी थे और घर फूँक तमाशा देखने वाले शौकीन मिजाज व्यापारी कुलोद्भव थे।

अगर अरोड़ा जी न होते तो शायद गणेश शंकर विद्यार्थी प्रताप न निकाल पाते न एक किरानी के रूप में कैरियर की शुरुआत करने वाले विद्यार्थी जी एक सर्वश्रेष्ठ पत्रकार, साहित्यकार और स्वतंत्रता सेनानी बन पाते। विद्यार्थी जी ने प्रभा, अभ्युदय, सरस्वती और कर्मयोगी आदि सभी पत्रों में काम किया पर अपने तीखे तेवर के कारण वे टिक नहीं पाए। तब कानपुर से अपना अखबार शुरू करने की तलब लगी लेकिन धन कहां से आएगा। यह जुगाड़ करने लगे। ऐसे समय उन्हें अकेले सहारा दिखे नारायण दास अरोड़ा और शिवप्रसाद मिश्र। नारायण दास अरोड़ा ने धन दिया और मिसिर जी ने प्रबंधन संभाला। प्रताप का तो मकसद ही था निशिदिन घाटे में चलना और नारायण दास अरोड़ा ने अपना वचन निभाया। नारायण दास अरोड़ा थे तो कांग्रेसी पर विचारों से थोड़ा उग्र समाजवादी थे। वे मोतीलाल नेहरू के विचारों के हामी थे और गरम दलीय। भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद को धन और मन से मदद वही करते थे। पर चुप रहकर। उनके मन में गरीबों के प्रति हमदर्दी ही नहीं बल्कि कुछ करने का जज्बा था। व्यापारी थे पर अपने कर्मचारियों को अपना परिवार मानने वाले। यही पूंजीवाद का शुरुआती स्वरूप था जिसे पनपने नहीं दिया गया और इसी का नतीजा है कि हम अपने देश में एक ऐसा पूंजीवाद देख रहे हैं जो एशिया के अन्य मुल्कों में नहीं है। यही कारण है हमारी सामाजिक समस्याओं का, हमारे समाज के अंदर व्याप्त सांप्रदायिकता और जातीयता का। लेकिन इसका मनन तब ही कर पाएंगे जब समाज में उन हीरों को तलाशा जाएगा जो पूंजीवाद के मौजूदा घृणित स्वरूप के चलते बिला गए हैं। नारायण दास अरोड़ा इस विकृति को समझते थे इसीलिए उन्होंने जनपदीय इतिहास लेखन को प्रश्रय दिया और अपने खर्चे से तमाम पुस्तकें छपवाईं। आज कानपुर के जिस इतिहास पर हम गौरव करते हैं वह अरोड़ा जी की ही देन है। चाहे वह दादा नरेश चंद्र चतुर्वेदी का लिखा हुआ हो अथवा लक्ष्मीकांत त्रिपाठी का। शहर की जमीन से जुड़ी हस्तियों को ढूंढऩा और उन पर काम करवाना अरोड़ा जी का शौक था। वे एक व्यापारी थे, राजनेता रहे पर बिना किसी पद के और लालच के। ऐसी महान शख्सियतों के कारण ही कोई-कोई स्थान इतिहास में अपना नाम दर्ज करवा जाता है। नारायण दास अरोड़ा जैसी शख्सियतों को प्रणाम।

(नारायण दास अरोड़ा के पुत्र अर्जुन अरोड़ा पचास के दशक में कानपुर से राज्यसभा के सदस्य रहे हैं और उनके पौत्र अनिल सारी हिंदुस्तान टाइम्स में फिल्म क्रीटिक थे। मेरी मुलाकात अनिल सारी से थी। जब मैं दिल्ली आया था तो एक दिन वे इंडियन एक्सप्रेस दफ्तर आए। आईटीओ के बहादुरशाह जफर मार्ग (बीएसजेड मार्ग) स्थित एक्सप्रेस बिल्डिंग के सामने फुटपाथ पर बीरबल चौरसिया पान की पेटी टिकाकर एक दूकान चलाते थे। वहां वे सिगरेट लेने आए और मैं पान लेने। तभी वहां राजीव शुक्ला भी पान लेने आ गए। राजीव ने परिचय कराया कि ये अनिल सारी हैं और अर्जुन अरोड़ा के बेटे हैं। इसके बाद तो खूब दोस्ती हो गई। मैं जब भी कनाट प्लेस के कस्तूरबा गांधी मार्ग स्थित हिंदुस्तान टाइम्स बिल्डिंग जाता उनसे जरूर मिलता और वे अपनी कैंटीन में ले जाकर इतना खिलाते-पिलाते कि अक्सर लंच ही हो जाता। पर बीच में मैं दिल्ली से बाहर चला गया और सात साल बाद जब वापस आया तो पता चला कि अनिल सारी नहीं रहे। मुझे नहीं पता कि अरोड़ा जी के परिवार में अब कौन-कौन है पर कोई भी हो किसी ने भी नारायण दास अरोड़ा अथवा अर्जुन अरोड़ा का कोई इतिहास नहीं रखा। यही है मौजूदा पूंजीवाद का स्वरूप।)

For more information visit on my Blog- http://www.tukdatukdazindagi.com

Azeemulla Khaan

Standard

अजीमुल्ला खाँ ने बनाया नाना राव पेशवा को कानपुर का राजा

शंभूनाथ शुक्ल

अजीमुल्ला खाँ कानपुर के नाना धंधूपंत पेशवा के सलाहकार थे और उनके घनिष्ठ मित्रों में से थे। अँग्रेजी और फ्रेंच में निष्णात थे। कानपुर के क्राइस्ट चर्च स्कूल से पढ़े हुए थे। उनकी माँ घरों में झाड़ू पोंछा लगाकर गुजारा करती थी। मिशनरी वालों ने इस गरीब माँ के बच्चे को स्कूल में भरती कर लिया इस लालच में कि यह गरीब बच्चा ईसाई हो जाएगा। पर एक नाबालिग के धर्म परिवर्तन के लिए माँ की आज्ञा आवश्यक थी इसलिए क्राइस्ट चर्च के फादर ने माँ को समझाया कि देख तेरा बच्चा ईसाई हो गया तो ऊँची शिक्षा के लिए विलायत जाएगा और फिर ईस्ट इंडिया कंपनी में लाट साहब बनकर आ जाएगा। पर माँ मानी ही नहीं और अजीमुल्ला खाँ को स्कूल से निकाल दिया गया। ऐसे समय बाजीराव पेशवा द्वितीय ने इस बच्चे की पढ़ाई का खर्च अपने ऊपर लिया और कलकत्ते पढऩे के वास्ते भेजा। अजीमुल्ला खाँ ने अंग्रजी के साथ-साथ फ्रेंच भी सीखी। अजीमुल्ला के दिल में अंग्रेजों के प्रति घोर नफरत भरी थी और इसीलिए उसने फ्रेंच सीखी थी ताकि अंग्रेजों के शक्तिशाली दुश्मन फ्रेंच से मदद ली जा सके। पढ़ लिखकर कानपुर वापस आया तब तक बाजीराव की मृत्यु हो चुकी थी और उनके दत्तक पुत्र नाना धूंधूपंत पेशवा को कंपनी ने उनका वारिस बनाने से मना कर दिया। नतीजा यह हुआ कि बाजीराव पेशवा को मिलने वाली आठ लाख रुपया सालाना की पेंशन बंद कर दी गई और रमेल के 120 गाँवों का मालिकाना हक भी। नाना धंधूपंत पेशवा ने अजीमुल्ला खाँ को लंदन भेजा अपने मामले की पैरवी के लिए। अजीमुल्ला खाँ अँग्रेजी तो अच्छी बोल ही लेते थे बेहद सुंदर और आकर्षक थे। अंग्रेज औरतें उन पर फिदा होने लगी। नीली आँखों वाला पेशवा का यह मंत्री अपने मकसद में सफल तो नहीं हो पाया पर हिंदुस्तानियों को फिरंगी के हाथों आजाद कराने के लिए बम बनाने से लेकर तमाम रणनीतिक चालें सीख कर आया। सर विलियम रसेल ने लिखा है कि क्रीमिया में उस समय रूसियों और अँग्रेजों का युद्घ चल रहा था। उस समय वे और खाँ एक होटल में बैठकर काफी पी रहे थे ठीक उसी वक्त एक गोला अजीमुल्ला खाँ के पैरों के पास आकर गिरा। अजीमुल्ला खाँ तनिक भी विचलित नहीं हुआ। और पहले की तरह काफी पीता रहा। यही नायक जब भारत आया तो उसने अपने आका नाना को समझाया कि अँग्रेजों से दोस्ती करने का कोई लाभ नहीं है। आप बादशाह बहादुर शाह जफर के साथ जुडें और जीत के लिए युद्घ करें। नाना साहब ने कानपुर के जनरल व्हीलर की छावनी नष्ट कर दी और पूरे चार महीने तक कानपुर के राजा रहे। कानपुर में ऐलान कर दिया गया कि ‘खलक खुदा का मुल्क बादशाह का और हुक्म नानाराव पेशवा का’। ब्रिगेडियर ज्वाला प्रसाद अग्निहोत्री तथा नाना साहब के भाई बाला जी और अजीमुल्ला खाँ के साथ मिलकर यह लड़ाई लड़ी गई थी। पांच जून 1857 को नाना साहब ने कानपुर अपने कंट्रोल में ले लिया और तत्काल अजीमुल्ला खाँ ने नाना साहब के छापे वाली मुद्रा ढालने हेतु सरसैया घाट के पास एक टकसाल लगाई। हिंदू मुसलमानों के बीच ऐसी अद्भुत एकता कायम हुई कि हिंदू कोर्ट में चीफ जज अजीमुल्ला खाँ बनाए गए और किसी को उन पर तनिक भी अविश्वास नहीं था। पर जनरल नील की फौजों ने अपार फौज के साथ इलाहाबाद फतेह कर लिया और तेजी से कानपुर की तरफ बढऩे लगे। औंग पर बना पुल तोडऩे की बहुत कोशिशें नाना की फौजों ने की पर तब तक जीटी रोड से चली आ रही नील की फौजों ने पुल पार कर लिया। वहां से नाना की फौजें पीछे हटने लगीं। गंगा के तट पर भीषण युद्घ हुआ। ब्रिगेडियर अग्निहोत्री और अजीमुल्ला खाँ पकड़ लिए गए पर इसके पूर्व अजीमुल्ला खाँ ने नाना धूंधूपंत पेशवा को नावों पर बिठवा कर गंगा पार करवा दी। नाना निकल गए और अजीमुल्ला खाँ तथा ब्रिगेडियर ज्वाला प्रसाद अग्निहोत्री को फाँसी दे दी गई। साथ में नाना के 11 साल के भतीजे को भी। अँग्रजों का न्याय तो प्रसिद्घ रहा ही है। उन्हें 11 साल के बच्चे को फाँसी देने में तनिक भी रहम न आया।

(आज उन्हीं रणबांकुरे अजीमुल्ला खाँ का जन्मदिन है। वे नाना साहेब से छह साल छोटे थे। चार नवंबर 1830 को उनका जन्म लखनऊ में हुआ पर उनकी पति की मृत्यु के बाद उनकी बेसहारा माँ बालपने में ही अजीमुल्ला खाँ को लेकर कानपुर आ गई थीं।)

इज कानपुर अ डाइंग सिटी?

Standard

इज कानपुर अ डाइंग सिटी?
शंभूनाथ शुक्ल
मैं मूलरूप से कानपुर का रहने वाला हूं। यहीं पैदा हुआ, पढ़ाई लिखाई की और सीपीआई (एमएल) का सपोर्टर रहा उनकी हर गतिविधि में साथ रहा। बहुत से लोगों को करीब से देखा। हर राजनेता को, पत्रकार को और व्यापारियों को भी। जब यहां रहा तो जीविका चलाने के लिए हर तरह के काम किए। काफी उम्र के बाद मैने पत्रकारिता में सेटल होने की ठानी और साल 1980 में मैं वहां के एक बड़े अखबार दैनिक जागरण से जुड़ा। दैनिक जागरण के मालिक और संपादक स्वर्गीय नरेंद्र मोहन खुद अपने अखबार में रखे जाने वाले हर पत्रकार का इंटरव्यू करते थे इसलिए उन्होंने ही मेरा भी साक्षात्कार किया और उपयुक्त पाये जाने पर दैनिक जागरण में उप संपादक (प्रशिक्षु) पर मेरा चयन हो गया। नरेंद्र मोहन जी संपादक ही नहीं पत्रकार की प्रतिभा को पहचानते भी थे। तब कानपुर में दैनिक जागरण के संयुक्त संपादक थे स्वर्गीय हरिनारायण निगम। निगम साहब ने मुझे जल्द ही अखबार के प्रसार क्षेत्र में आने वाले कस्बों और जिलों की विशेष कवरेज के लिए भेजना शुरू किया और मेरा यह प्रयास रंग लाया। अखबार दूर देहाती क्षेत्रों में लोकप्रिय होने लगा। तब मैने कुछ विशेष स्टोरीज कीं मसलन मध्य उत्तर प्रदेश में ग्रामीण अपराधों का सामाजिक आधार विषय पर पूरा समाज शास्त्रीय शोध कर डाला। दरअसल ये वे दिन थे जब मध्य उत्तर प्रदेश में मध्यवर्ती जातियों का वर्चस्व होने लगा था और यादव, कुर्मी, काछी, लोध व मल्लाह आदि जातियां चूंकि ब्राह्मणों-बनियों तथा कायस्थों द्वारा गांव से पलायन कर जाने के कारण उनकी खाली जगह को भरने को बेचैन थीं। आर्थिक रूप से तो अब वे बटैया नहीं खुद कास्तकार बन गए थे पर सामाजिक रूप से वे पिछड़े थे। ठाकुर उन्हें पनपने नहीं दे रहे थे और वे अब सारी अगड़ी जातियों के पेशे खुद अख्तयार करने को आतुर थे। मध्य उत्तर प्रदेश के दस्यु और अन्य अपराधी इन ठाकुरों के बगलगीर थे इसलिए अब मध्यवर्ती जातियों से भी दस्यु उभरने शुरू हुए। वे खुद को बागी कहते यानी कि समाज से बगावत करने वाला। कोई भी छोटा-मोटा अपराधी तमंचा लेकर जंगल या बीहड़ में कूद जाता और दस्यु सम्राट कहलाने लगता। वह अपने समाज का राबिनहुड बन जाता और लोग उसकी पूजा करने लगते। मैने इस नई सामाजिक व्यवस्था को गांव-गांव जाकर महसूस किया और खूब लिखा। जल्द ही मैं कानपुर दैनिक जागरण में सदियों से जमें पत्रकारों की आँख की किरकिरी बन गया और वे मुझे हटवाने के लिए कुचक्र रचने लगे। जागरण के कानपुर दफ्तर एक से एक धाकड़ कनपुरिये थे और अधिकतर कनौजिये ब्राह्मण भी। वे मुझे उखाडऩे में कामयाब रहे। हालांकि मुझे उखाडऩे के लिए उन्हें मेरे ऊपर शारीरिक रूप से हमला करवाना पड़ा पर कुछ चीजों पर आप काबू नहीं पा सकते।

लेकिन मेरा वहां से उखडऩा मेरे लिए बेहतर ही रहा। जनसत्ता की पहली टीम में ही मेरा चयन हो गया। खासकर मध्य उत्तर प्रदेश में ग्रामीण अपराधों का सामाजिक आधार पर मेरी वह थीसिस जनसत्ता के प्रधान संपादक स्वर्गीय प्रभाष जोशी को बहुत पसंद आई। मुझे उन्होंने एडिट पेज पर रख लिया। लेकिन यह बहुत बोरिंग काम था। सुबह 11 से शाम 5 की ड्यूटी ठीक सचिवालय में काम कर रहे बाबुओं की तरह। मेरा मन ऊबने लगा। कानपुर जागरण से आए मेरे अन्य साथी राजीव शुक्ल और सत्यप्रकाश त्रिपाठी जनरल डेस्क पर थे और कभी-कभी वे डेस्क प्रभारी का रोल भी निभाते। राजीव और मैं चूंकि एक ही मकान में लोधी कालोनी में रहते और राजीव मुझसे जनरल डेस्क के किस्से बताता तो मेरा मन और ऊबने लगता क्योंकि मुझे जिनके बीच निरंतर रहना पड़ता वे सब दिल्ली के धाकड़ पत्रकार और उतने ही रौब-दाब वाले। सब के सब सहायक संपादक जहां तक पहुंचने के लिए मेरे को कम से कम चार सीढिय़ां पार करनी पड़तीं। ये सहायक संपादक यानी सर्व श्री बनवारी, हरिशंकर व्यास, सतीश झा मेरे साथ बहुत अच्छा व्यवहार करते पर मेरा मन नीचे जनरल डेस्क पर काम करने को ललचाने लगा। प्रभाष जी ने खूब लालच दिए पर मैं नहीं माना और अंतत नीचे जनरल डेस्क पर पहुंच गया। पर तब तक नीचे का सीन बदल चुका था। जो मेरे साथ आए थे वे अब वहां सीनियर हो चुके थे और राजीव शुक्ल रविवार में विशेष संवाददाता बनकर जा चुके थे। हालांकि इसके पूर्व ही वे जनसत्ता मेें ही मेरठ के संवाददाता बनकर चले गए थे। अब यह तो संभव नहीं था कि मैं उन लोगों के अंडर में काम करता जो कभी मेरे ही बराबर थे इसलिए प्रभाष जी ने एक नई डेस्क बनाई राज्य डेस्क और मुझे उसका प्रभारी बनाया तथा आठ और उप संपादकों की टीम दी। तथा यूपी, एमपी, राजस्थान व बिहार का जिम्मा।

शादी मेरी तब ही हो गई थी जब मैं कालेज में था। पत्नी भी उसी कालेज में थीं। कुछ दिनों की देखादेखी के बाद ही हम परिणय सूत्र में बंध गए थे। चूंकि वे भी कानपुर की इसलिए हमें दिल्ली बहुत रास न आती। अक्सर महीने-दो महीने में ही कानपुर जाने को मन तुड़ाने लगता और पूरी की पूरी सैलरी इस आवाजाही में ही खप जाती। हमारे मित्र राजीव शुक्ल भी शुरू से इसी प्रवृत्ति के थे पर बाद में वे दिल्ली के ऐसे हुए कि शिखर तक पहुंच गए और इसमें कोई शक नहीं कि यह उनकी यात्रा का हिस्सा है, उनका गंतव्य नहीं।
फिर एक दौर वह भी आया कि दुर्भाय वश मैं कानपुर में में ही 19 अगस्त 2002 को अमर उजाला अखबार का स्थानीय संपादक बन कर आ गया। इसके बाद तो जीवन यात्रा में ब्रेक लग गया। अमर उजाला के नवोन्मेषक स्वर्गीय अतुल माहेश्वरी ने मेरा चयन किया था। चूंकि उस समय जनसत्ता के कलकत्ता संस्करण में मुझे सारी सुविधाएं मिलाकर करीब 60 हजार रुपये मासिक मिलता था इसलिए उन्होंने मुझे यही वेतन दिया। 12-13 साल पहले कानपुर में यह वेतन काफी नहीं तो भी मजे का था। लेकिन इस शहर में रो-रोकर मांगने वाले इतने ज्यादा हैं कि मैं पसीज जाता और हर उस आदमी की मदद कर देता जो मेरे ही पैसे से मेरे ही सामने शराब पीता, ऐश करता और मैं चुपचाप देखता रहता। रोज घर पर ऐसे लोगों का तांता लगा ही रहता। यहां के लोग यजमानी वृत्ति पर जीते हैं यानी किसी की भी आँख में धूल झोंककर पैसा निकाल लेने की कला में माहिर हैं। खासकर यहां का यूपीआईट और उनमें भी ब्राह्मण। यहां आकर बसे अन्य समुदाय यथा- पंजाबी, खत्री और मारवाड़ी अपनी मेहनत पर और अपने पेशेगत ईमानदारी पर जीना जानता है। लेकिन ठेठ कनपुरिये या तो रंगदारी वसूलते हैं अथवा डग्गामारी कर पैसे कमाकर सारी की सारी कमाई दारूबाजी व दारूखोरी में उड़ाना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं।
मैने जब अतुलजी को कहा कि भाई साहब आप मुझे कानपुर मत भेजिए क्योंकि वह मेरा शहर है और वहां हर आदमी मेरे पास कोई न कोई सिफारिश लेकर चला आएगा तो अतुल जी बोले- शुक्ला जी यही तो आपकी परीक्षा है और आपको कानपुर की हर तरह की जानकारी भी तो होगी। मुझे खुशी है कि मैं उनकी इस परीक्षा में खरा उतरा। मैने में ही 19 अगस्त 2002 को अमर उजाला ज्वाइन किया और सिर्फ छह महीने के भीतर मैने अखबार का प्रसार सिटी में एक लाख तक पहुंचा दिया। अतुल जी ने मुझे प्रशस्ति पत्र भेजा और कहा कि अखबार संपादक का होता है और सिर्फ वही किसी अखबार को अपने पाठकों के बीच लोकप्रिय बना सकता है।
लेकिन मेरा निजी जीवन चौपट हो गया। पैसे तो लोग लूटते ही रहे मेरा सुख चैन भी छीन लिया। मुझसे मिलने शहर की हर बड़ी शख्सियत आती। चाहे वे राजनेता हों अथवा नौकरशाह या उद्यमी। कई बार ये लोग मेरे न चाहते हुए भी मेरे घर आ जाते। चूंकि मेरा परिवार काफी दरिद्र था इसलिए मेरे हर रिश्तेदार चाहते कि मैं उनकी सिफारिश करवा कर कोई ठेका दिलवा दूं किसी की नौकरी लगवा दूं अथवा किसी को कोई भूखंड दिलवा दूं। इससे ऊपर बेचारे सोच भी नहीं सकते थे। मैं यह सब काम नहीं करता और न इन्हें प्रोत्साहित करता हूं। मैने जीवन में मुफ्त का कुछ नहीं लिया उलटे अपनी सैलरी का 25 प्रतिशत हिस्सा जकात यानी दान में ही खर्च किया है। सो मैं कहता कि अगर किसी को कोई तकलीफ है तो मुझसे ले लो मैं किसी की सिफारिश नहीं करूंगा। नतीजा यह निकला कि अधिकांश मिलने वाले मेरे विरुद्ध अनर्गल प्रलाप करने लगे। हर कोई मेरा चाल, चरित्र और चेहरे पर टिप्पणी करने लगा कि एक तो मैं घमंडी हूँ और दूसरे कान का कच्चा हूँ। और तीसरा जो हर सफल आदमी पर आरोप लगता है कि मेरा चरित्र ठीक नहीं है। मैं बंदरघुड़कियों से नहीं डरा और जो मुझे उचित लगा वही किया। अखबार के अंदर प्रबंधन भी मेरे विरुद्ध हो गया और कारपोरेट आफिस तक ऐसी-ऐसी अफवाहें फैलाई गईं मानों मैं कोई खलनायक हूं। वह तो शुक्र था कि अतुल जी मुझे पसंद करते थे इसलिए ऐसी अफवाहें मेरा कुछ न बिगाड़ सकीं।
कानपुर से जाने के बाद भी हर महीने मेरा कानपुर आना-जाना लगा रहा। एक तो पिताजी अकेले रहते थे और दूसरे मेरी दोनों छोटी बहनें भी। यहां तक कि एक बेटी का विवाह भी यहीं हुआ था। परिवार के लोगों से मिलने की इच्छा हर एक को होती है मैं कोई अपवाद तो नहीं। इसलिए आता-जाता रहा। अखबारी जीवन से मुक्त होने के बाद कानपुर प्रवास कुछ ज्यादा दिनों तक का होने लगा। मैने पाया कि कानपुर में जीवन में स्पंदन नहीं है। यह एक मरता हुआ शहर है और यहां के लोग हरदम निराशा में घिरे रहते हैं। कानपुर किसी के जीवन में उत्साह क्यों नहीं पैदा कर पाता? हर व्यक्ति चिड़चिड़ा, दंभी और हठी भी है। नौकरियां यहां हैं नहीं, व्यापार मंदा है लेकिन लोग जी रहे हैं तो आत्मविश्वास खोकर या कुछ लोग ऐसे हैं जो परले दरजे के बेईमान और धूर्त हैं अलबत्ता वे मजे में हैं। जो जितना बड़ा बेईमान उतना ही सफल वह है। लेकिन यह तो सही है कि कानपुर में लाइफ नहीं है, स्पंदनहीन है यह शहर और यहां जीने के लिए सिवाय बेईमानी, धूर्तता और मक्कारी के और कोई रास्ता नहीं बचा।
पर फिर भी कानपुर में अभी कुछ लोग हैं जिन पर इस शहर को गर्व हो सकता है। जो इस शहर में बैठकर तमाम सारे क्रिएटिव कामों में लगे हैं। कोई साहित्य रच रहा है तो कोई चुपचाप मूर्तियां गढ़ रहा है। कोई बच्चों की जिंदगी संवारने में लगा है तो कोई कोई बुजुर्गों को नया जीवन दे रहा है। एक मरते हुए शहर की यह कला भी उसे अन्य तमाम शहरों से अलग करती है और लगता है कि कुछ तो डिफरेंट हैं कानपुर में।

Walk without Purpose

Standard

जिंदा रहना है तो आवारगी को बचाओ मित्रों!
बहुत लोग मुझे समझाते हुए कहते हैं कि शंभू जी आप फिजूल में घूमा करते हैं अथवा फिजूल में फेसबुक पर समय नष्ट किया करते हैं। आप कोई पुस्तक क्यों नहीं लिखते? मेरा उनसे यही जवाब होता है कि मुझे कोई धर्मोपदेशक नहीं बनना कि मैं संवाद को एकपक्षीय कर दूं, एकालाप करने लगूं। मेरे लेखन में जो विविधता, निडरता और निष्पक्षता है तो मेरी इसी आवारगी की वजह से। पर आवारगी का मतलब वही समझेगा जो आवारा हो, मस्त हो और अपना सब कुछ खाक कर हमारे साथ चलने की हिम्मत कर सके। मैं कभी भी लीक में नहीं बंधा और उसी लाइन पर नहीं चला जो सीधी आपके घर को जाती है। कभी तो लीक तोड़ो और नदी की धारा के खिलाफ चलो। पर अपने यहां तो अब आवारगी का मतलब बदचलनी हो गया है और यह नैतिकता बांधी आर्य समाज ने अर्थात पश्चिम से आक्रांत लोगों ने। बदचलनी शब्द उन लोगों ने गढ़ा जो अनेक बंदिशों में समाज को कैद रखने के हामी थे। वे जो एक पुस्तक और एक नेता को मसीहा मानते थे और हैं। खूब पढ़ो, गुनो और सोद्देश्य जीने का नारा देने वालों ने एक पूरी पीढ़ी को पतन के गर्त में धकेल दिया। ध्यान रखिए मित्रों पुस्तकें और गहन अध्ययन आपके स्वतंत्र चिंतन व मनन को बाधित करती हैं। आप वही सोचते हैं जो पुस्तक लेखक आपसे सोचवाना चाहते हैं और आप चाहे-अनचाहे उन पुस्तकों के निष्कर्ष से बंध जाते हैं। फिर आप एकालाप करने लगते हैं इसिलए मेरी मानों और इस फिजूल की पढ़ाई-लिखाई को तिलांजलि दो और कुछ आवारगी करो ताकि कुछ सोच सको किताबों की दुनिया से बाहर आकर। यूं ही निरुद्देश्य घूमो। दीन-दुनिया से बेखबर होकर। तब आप पाओगे कि आपकी सोच और आपका चिंतन तथा जगत व जीवन के बारे में आपकी अवधारणा सबसे अलग है। किताबों की दुनिया में कैद हुए डॉ. अंबेडकर और किताबों की दुनिया से फ्री रहे गांधी। किताब आपको बांध देती है और पूरे समाज से काट देती है। इसलिए हर तरह की पुस्तकों को नष्ट करो तब ही आजाद चिंतन कर पाओगे और फ्री थिंकर बन पाओगे। मेरा मानना है कि प्रिंस क्रोपाटकिन लेनिन से ज्यादा महान थे।