घर वापसी बजरिए कांग्रेसी पत्रकार!

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घर वापसी बजरिए कांग्रेसी पत्रकार!
1983 के जाड़े के दिन थे। एक शाम एक्सप्रेस बिल्डिंग से जनसत्ता की नौकरी कर हम बाहर निकले और खूनी दरवाजे पर आकर 26 नंबर की बस का इंतजार करने लगे। तब हम लोधी रोड रहा करते थे। हम यानी कि मैं और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तथा पूर्व की मनमोहन सरकार के मंत्री श्री राजीव शुक्ल। श्री शुक्ल अपने साथ ही जनसत्ता में थे और वे रात की ड्यूटी पर रहा करते थे। तब दिल्ली में शाम ढलते ही सन्नाटा छा जाता और सड़कें वीरान हो जाया करतीं। मेरी बस 26 नंबर करीब घंटे भर के इंतजार के बाद आई। यह बस मुझे इसलिए मुफीद रहती कि यह ठीक मेहरचंद खन्ना मार्केट के पास उतारती और वहां से मेरा फ्लैट दिखा करता। मगर उस दिन जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में क्रिकेट मैच चल रहा था इसलिए बस दयालसिंह कालेज जाकर टर्मिनेट हो गई। अब मेरे तो होश उड़ गए। न तो मुझे अपने घर का पता मालूम था न रोड न वह इलाका। मेरे पास कुल आठ आने थे उसमें से तीस पैसे बस टिकट में खर्च हो गए और अब आईटीओ वापसी के पैसे भी मेरे पास नहीं थे कि वापस दफ्तर जाकर राजीव से पता पूछ कर आता। तब न तो मोबाइल हुआ करता था न लैंड लाइन फोन सुविधा देने वाले पीसीओ। मैं उस ठंड में भी कांपने लगा। मात्र बीस पैसे लेकर कहां जाऊँ? यूं मैं कानपुर जा सकता था भारतीय रेलवे की फ्री यात्रा सुविधा का लाभ उठाकर। मगर रेलवे स्टेशन जाने के लिए भी न्यूनतम तीस पैसे होने जरूरी थे। तब यही सबसे कम बस टिकट थी। मैं लगभग रुआंसा हो गया। तब ही साक्षात देवदूत की तरह मुझे जनसत्ता के न्यूज एडिटर श्री Gopal Misra दिख गए। मैं भाग कर उनके पास पहुंचा और एक ही सांस में अपनी व्यथा-कथा कह डाली। मिश्रा जी बोले- तुम्हारे घर का कुछ नंबर या लैंडमार्क मालूम है? मैने पूछा कि यह लैंडमार्क क्या बला है? इस नाम का एक होटल जरूर कानपुर में बन रहा है। अब मिश्रा जी मेरे घामड़पन पर खूब हंसे और बोले- ठीक है तुम मेरे घर चलो वहां से फिर हम मिलकर तुम्हारा घर तलाशेंगे। हम पहुंचे मिश्र जी के घर। भाभी जी ने लखनवी अंदाज में चाय पिलाई और मठरियां खिलाईं तब मुझे कुछ चेत आया। मैने बहुत याद करने के बाद बताया कि वहां मदर डेयरी का एक बूथ है और पास में एनडीएमसी आफिसर्स क्वार्टर्स हैं। अब यह कोई पहचान नहीं हुई। खैर मिश्रा जी और हम चले अपना मकान तलाशने। अचानक मुझे वह बूथ दिखा और मैने चहक कर कहा बस मिश्रा जी वह रहा मेरा फ्लैट। हम लोग चूंकि तब वहां ताला-वाला नहीं लगाते थे इसलिए भिड़े किंवाड़ खोले और लॉबी में जाकर देखा तो पता चला अपने फ्लैट का नंबर। अब तो खैर मुझे भी याद है वह नंबर मगर लिखूंगा नहीं क्योंकि पता नहीं कौन भला आदमी वहां रह रहा हो और यह भी संभव है कि वह बेचारा भी सबलेटिंग में रह रहा हो जैसे कि हम रहा करते थे। ऐसा हुआ तो नंबर फ्लैश होते ही बेचारा मुसीबत में पड़ जाएगा क्योंकि ऐसा बताया जाता है कि मेरे फेसबुक अपडेट्स पीएमओ में भी बांचे जाते हैं। पर मिश्रा जी ने उसे रट लिया और कहा कि अब आगे कभी फिर भटकोगे तो आखिर घर वापसी कराने तो मुझे ही आना पड़ेगा। गोपाल जी बाद में कांग्रेस पत्रिका के संपादक रहे और वे खाँटी कांग्रेसी तो खैर थे ही। एक कांग्रेसी ने मेरी सकुशल घर वापसी करवाई।

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