नेहरू के बिना गांधी की फिल्म अधूरी होती!

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शंभूनाथ शुक्ल

जवाहर लाल नेहरू और गांधी जी के बीच के रिश्ते कैसे थे आज तक कोई भी इन्हें समझ नहीं पाया। महात्मा गांधी कट्टर भारतीयता के हामी और दिन की शुरुआत प्रार्थना से तथा समाप्ति भी प्रार्थना से करते थे। वे हर बात का परिष्कार करने के लिए व्रत करते निराहार रहते और आत्मा की शुद्घि करते। इसके विपरीत जवाहर लाल नेहरू कट्टर यूरोपियन दिमाग वाले, पूरी तरह सेकुलर और धर्म-कर्म को इंसान की दुनिया का अंधेरा पक्ष समझते थे। लेकिन नेहरू से अगर गांधी तत्व निकाल दिया जाए तो नेहरू में चिंतन और दर्शन नहीं रहेगा तथा गांधी में से यदि नेहरू को बाहर कर दिया जाए तो उत्साह और कार्यशैली नहीं दिखेगी। यानी दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। गांधी और नेहरू का मिलन कुछ ऐसा ही है जैसे समान लेकिन विपरीत गुण-दोषों वाली शख्सियतों का मिलना। आज जो लोग बिना नेहरू के गांधी को याद करते हैं वे सिर्फ एक ही पक्ष देख रहे होते हैं। बिना नेहरू के गांधी की फिल्म अधूरी है। तब गांधी महज एक चिंतक और साधु नजर आते हैं अपने राजनीतिक चिंतन को यथार्थ में बदलने वाले राजनेता नहीं। एक अगर दर्शन है तो दूसरा उस दर्शन को कार्यरूप में बदलने वाली ऊर्जा। एक अगर अध्यात्म है तो दूसरा उसका भौतिक स्वरूप। इसलिए जो लोग नेहरू और गांधी को अलग-अलग कर देखने के हिमायती हैं उन्हें अपनी सोच बदलनी चाहिए।

यह समझने के लिए दोनों के बीच कुछ कामन और कुछ अलग-अलग फैक्टरों को देखना चाहिए। दोनों ही बैरिस्टर थे और दोनों में ही अपने देश के लिए कुछ कर-गुजरने का जज्बा था। नेहरू में कुछ ज्यादा और गांधी में कुछ कम। दोनों में ही अपने रास्तों की शुचिता को लेकर देसी निष्ठा थी। गांधी में कुछ अधिक पर नेहरू में कुछ कम। लेकिन मकसद एक थे। अब विपरीत गुण-दोष देखिए। नेहरू उस पश्चिमोत्तर प्रांत के अवध इलाके से आते थे जहां अंग्रेजों ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन को विफल करने के लिए स्थानीय जनता का इस बुरी तरह दमन किया था कि किसान सिर उठाना भूल गए थे। जमींदारी की नई रैयतवारी व्यवस्था ने किसानों की कमर ऊपर से तोड़ दी। सदैव खुशहाल और मस्त रहने वाला किसान अपनी सहजता भूल चुका था। उसके ऊपर चौबीसो घंटे जमींदार का डंडा रहता। ऐसे में उसके अंदर एक दयनीयता का भाव आ गया था। विरोध करने की क्षमता वह खो चुका था। यह दयनीय भाव तत्कालीन पश्यिमोत्तर प्रांत के शहरी अभिजात्य में भी था। उनका कुलक और जमींदार वर्ग तो अंग्रेज अफसरों के आगे दंडवत रहता और पीजेंट्री व मजदूर वर्ग अपने काले मालिकों के आगे। अवध के पूरे इलाके में विद्रोह का पहला झंडा चंपारण के राजकुमार शुक्ल ने बुलंद किया था। शुक्ल जी ने गांधी जी को चंपारण बुलाया और बताया कि किस तरह निलहे अंग्रेजों ने वहां की देसी रैयत की जमीन हथिया कर उन्हें नील की खेती करने पर मजबूर कर दिया है। गांधी जी 1916 में चंपारण गए और उसी साल जवाहर लाल नेहरू लंदन से बैरिस्टरी पास कर भारत लौटे। उनके पिता चूंकि पश्चिमोत्तर प्रांत के हाईकोर्ट के नामी वकील थे इसलिए उनकी मंशा थी कि बेटा बैरिस्टर बने लेकिन नेहरू जी लंदन से कम्युनिज्म का पाठ सीखकर आए थे इसलिए उन्होंने पिता की इस मंशा को मानने से मना कर दिया और साफ कहा कि वे देश के लिए कुछ करना चाहते हैं। तब तक सर एओ ह्यूम द्वारा बनाई गई संस्था कांग्रेस अपने परंपरागत अंग्रेज हुक्मरानों से छोटी-छोटी रियायतों को अर्जी लिखकर मांगने वाले अपने चरित्र से बाहर निकलकर आजादी की लड़ाई का मंच बन चुकी थी। इसके अध्यक्ष बाल गंगाधर तिलक ने लखनऊ में सिंह गर्जना की थी- स्वराज्य हमारा जन्मसिद्घ अधिकार है।

गांधी जी का बचपन जिस पोरबंदर इलाके में बीता था वह जूनागढ़ स्टेट का एक रजवाड़ा था। उनके पिता कर्मचंद गांधी उस पोरबंदर इस्टेट के ठिकानेदार (राजा) के प्रधानमंत्री थे। मछुआरों की बस्ती और समुद्री किनारा इसलिए व्यापारी भी खूब थे खासकर जैनी व्यापारी। गांधी जी के पिता के पास तमाम धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के लोग आया करते थे वे अपने-अपने समाज के मानवीय मूल्यों और निष्ठाओं की चर्चा करते। उनकी माँ एक सामान्य घरेलू वैष्णव मत को मानने वाली महिला थीं जिनके अंदर वैष्णव भक्ति भाव कूट-कूट कर भरा हुआ था। गांधी जी ने अपने पिता से सर्वधर्म समभाव सीखा और माँ से वैष्णवी भक्ति। मगर जवाहर लाल नेहरू का परिवार कश्मीरी पंडितों के नैष्ठिक आचार-विचार और उनके पिता मोतीलाल नेहरू के योरोपियन तौर तरीके, सब मिलाकर ऐसा घालमेल था कि नेहरू लंदन जाकर एकदम लंदनिया कम्युनिस्ट बनकर लौटे। उन्हें कोई हिंदुस्तानी राग-बिराग पसंद नहीं था पर इसके बावजूद जवाहर लाल नेहरू खांटी हिंदुस्तानी थे। पहले तो उनके पिता ने जब उनका देश सेवा का प्रण सुना तो उन्हें अवध के किसान नेता बाबा रामचंदर से मिलवाया। लेकिन बाबा रामचंदर के टोटके देखकर नेहरू जी को उनसे कोफ्त हो आई। बाबा रामचंदर बिना शक अवध के किसानों के एकक्षत्र नेता थे लेकिन बाबा ड्रामेबाज भी थे। वे किसानों के बीच आते नहीं थे बल्कि परगट होते थे। बाबा की किसान सभा अपने सम्मेलनों और सभाओं का खुले में मंच लगाती। निर्धारित समय के पूर्व बाबा रामचंदर मंच स्थल के पास के किसी पेड़ की डाल पर छुपकर बैठ जाते और जैसे ही किसान जुटते बाबा डाल से कूदकर मंच पर आ जाते। यह देखते ही किसान चिल्लाने लगते कि बाबा परगट भये। नेहरू जी को इस ड्रामे से चिढ़ हो गई। ऐसे में उनकी मुलाकात गांधी जी से हुई। जल्द ही गांधी को अपने सपनों को पूरा करने का अक्स जवाहर लाल नेहरू में दिखने लगा और नेहरू को मिला अहिंसा का एक ऐसा राजनीतिक चिंतन जिसमें अध्यात्म था और दृढ़ता भी।

नेहरू जी को गांधी जी की अहिंसा और उनका अपरिग्रह तथा बात-बात पर अनशन पर बैठ जाना पसंद नहीं था लेकिन उनकी दृढ़ता और उनके सर्वधर्म समभाव के वे कायल थे। जो बातें वे लंदन से सीखकर आए थे उन सब बातों को हूबहू गांधी जी में देखकर नेहरू अचरज करते। उन्हें भरोसा नहीं होता था कि मोहनदास कर्मचंद गांधी नामका यह अदना-सा शख्स एक दिन अंग्रेजों को भारत से खदेड़ देगा। पर धीरे-धीरे गांधी जी में उनकी निष्ठा बढऩे लगी और जवाहर लाल नेहरू को उन्हीं गांधी की वे सब चीजें अच्छी लगने लगीं जिनके कारण वे इस अंग्रेजी पढ़े-लिखे गुजराती बैरिस्टर को नपसंद करते थे। गांधी जी अपने इस शिष्य की विशालता और उसके अंतरमन की कोमलता को पहचानते थे इसीलिए गांधी जी ने हरदम नेहरू को वरीयता दी चाहे वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस के मुकाबले हो अथवा सरदार बल्लभ भाई पटेल के मुकाबले। यह तथ्य सर्वविदित है कि जवाहर लाल नेहरू का नेतृत्व कांग्रेस में सर्वमान्य नहीं था। असंख्य पार्टी जन उनके विरोधी थे। इसीलिए नेहरू के मामले में गांधी जी को सदैव एक तानाशाह का रोल अदा करना पड़ा। कई बार वे नेहरू के हितों के लिए अड़े और अंतत वे नेहरू को उस कुर्सी तक पहुंचाने में कामयाब रहे जहां पहुंचना नेहरू जी की महात्वाकांक्षा थी। इसकी वजह यह नहीं थी कि गांधी जी ने नेहरू को अन्य लोगों के मुकाबले आगे बढ़ाकर कोई अनुचित कदम उठाया। दरअसल जैसा कि गांधी जी स्वयं कहा करते थे कि मैं कांग्रेस का अकेला डिक्टेटर हूं, वे जानते थे कि नेहरू अकेले ऐसे शख्स हैं जो आजाद भारत को अक्षुण्ण बनाए रखेंगे। इसकी वजह नेहरू का मानवीय हृदय और उनका सेकुलरिज्म। सरदार पटेल शायद भारत को पीछे की तरफ ले जाते और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में भारत एक तानाशाह मुल्क के रूप में पनपता।

जवाहर लाल नेहरू का अपना कोई दर्शन और स्पष्ट राजनीतिक चिंतन नहीं था। वे एक ऐसे सभ्य योरोपियन संस्कारों से लैस थे जिनके अंदर मानवीयता थी और प्रचंड राष्ट्रभक्ति। एक उदारता और विवेकशीलता। शायद यही वजह थी कि नेहरू जी ने देश के लिए जो विकास माडल चुना उसके केंद्र में कोई व्यापारी या पूंजीपति नहीं वरन् आम नागरिक थे। यह नेहरू का ही कमाल था कि आजादी के फौरन बाद भारत अपने पैरों पर खड़ा हो गया जिसे कोई सुभाष जैसा तानाशाह या सरदार पटेल जैसा सामंती राजनेता नहीं खड़ा कर सकता था। जवाहर लाल नेहरू की 125 वीं जयंती पर उन्हें याद कर लेना चाहिए कि नेहरू सदैव गांधी के पूरक रहे और वे जितना गांधी जी के समय में प्रासंगिक थे उतने ही आज भी हैं।

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One thought on “नेहरू के बिना गांधी की फिल्म अधूरी होती!

  1. सुभाष जैसा तानाशाह और पटेल जैसा सामंती ..- नही सहमत हो पा रहा आपके शब्दों से.. इस हिसाब से तो सुभाष बहुत छोटे दायरे मे डाल दिये गये. आपने ही कहा गांधी की भी तानाशाही चली .. नेहरु को बुराई की हद तक प्रश्रय दिया गांधीजी ने.

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