आभासी दुनिया की ताकत और उसके रिश्ते!

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आभासी दुनिया की ताकत और उसके रिश्ते!

शंभूनाथ शुक्ल

जो लोग अभी साल भर पहले तक फेसबुक को एक आभासी मीडिया समझकर उसका मजाक उड़ाते थे और मुझे भी नसीहत दिया करते थे कि आप भी शंभूजी किस लौंडियाँह में लगे रहते हो। आज वही उसके नतीजों को लेकर सीरियस होते जा रहे हैं। अमर उजाला के संपादक पद से रिटायर होने के बाद मैं फेसबुक पर आया और देखते ही देखते मेरी पांच हजारिया मित्र सूची पूरी हो गई। जबकि मेरे पास कोई पद नहीं था और मैं खुद सड़क पर वक्त के हिचकोले खा रहा था। चूंकि मैं पूरा जीवन एक ईमानदार, कर्मठ और कर्त्तव्यपारायणता की जिंदगी जी थी इसलिए जुगाड़ू मित्रों का अभाव था। अन्य संपादकगण मेरे रूखे व्यवहार (अनपॉलिस्ड बिहैवियर) और चापलूसी न करने की मेरी आदत तथा मेरे गँवई संस्कारों से चिढ़े रहा करते थे। रिटायर होने के बाद जब मैं अपने एक बालसखा संपादक मित्र से काम मांगने गया तो उन्होंने काम तो दिया नहीं उलटे यह जरूर बता दिया कि वसुंधरा लौटने की बस कहां से मिलेगी। वे तो जब बाहर छोडऩे आए तो और अपनी वैगन कार के पास में मेरी टयोटा इनोवा मय ड्राइवर के खड़ी देखी तो शरमाने लगे। एक संपादक इसलिए बुरा माने हुए थे क्योंकि वे जिस समूह के मालिक की निंदा मेरे मुँह से सुनना चाहते थे वैसा हो नहीं रहा था। कईयों ने इसलिए छापने से मना कर दिया क्योंकि मैं उनके क्षेत्र का नहीं था अथवा उनकी जाति और थी या उनके दक्षिणपंथी अथवा जातिवादी समाजवादी विचारों से मेरा मेल नहीं था। अब ऐसे में मैं क्या करता। और ऊपर से लिखने की हूक। आखिर जीवन भर कलम जो चलाई थी। मैं अन्य रिटायर लोगों की तरह ताश खेलकर, पार्क में बैठकर गप्पें लगाने अथवा संतान के ऊपर बोझ बन कर जिंदगी काटने का इच्छुक नहीं हूं। जब तक हाथ-पाँव सलामत हैं आप क्यों किसी पर निर्भर बनें उलटा होना यह चाहिए कि आप ही सबके लिए नजीर बनें। इसलिए मैने फालतू वक्त काटने की एक तरकीब सोची और वह थी अनवरत लेखन। ऐसा लेखन जो सिर्फ टाइम पास करने के लिए नहीं बल्कि पूरी गंभीरता और तन्मयता के साथ लिखा गया हो। फेसबुक चूंकि इंटरनेट मीडिया है इसलिए यह भी डर था कि सीरियस लेखन शायद इसके पाठक कहीं खारिज न कर दें। उन्हें आज के जमाने का चटपटा हिंग्लिश टाइप का लेखन चाहिए। जिसमें सेक्स हो, नेट हो गैजेट्स हों या फिल्म हो। मगर मैने एक प्रयोग किया तो पाया कि अरे हम जिस युवा और किशोर पीढ़ी को संस्कारहीन और परंपराहीन समझते थे वह तो हमारी पीढ़ी से कहीं अधिक सीरियस और प्रगतिकामी है। यही कारण है कि पहले ही दिन से मेरे मित्रों और फालेअर की संख्या बढऩे लगी और जल्द ही वह इतनी बढ़ गई कि मुझे अलग पेज बनाना पड़ा। मैं ब्लॉग लेखन में आया और उसे भी हाथोंहाथ लिया गया। मेरी भाषा प्रवाहमयी होती है पर वह हिंग्लिश नहीं बल्कि वह भाषा है जो बोली और बरती जाती है जिसमें प्रवाह है लेकिन फालतू के गड्ढे नहीं।

जब आपको हाथोहाथ लिया जाएगा और बिना किसी लालच के तो उत्साह बढ़ेगा ही। मैने वह लिखा जो मैं सर्वोत्तम लिख सकता था। मैने इतिहास पर लिखा, यात्रा वृत्तान्त लिखे, सामाजिक संबंधों और सामाजिक समीकरणों पर लिखा और सब खूब पढ़ा गया बल्कि जिस दिन मैं नहीं लिखता उस दिन मेरे फेसबुक इनबाक्स पर, मेरी मेल आईडी पर और मेरे मोबाइल पर संदेशे आने शुरू हो जाते- सर तबियत तो ठीक है? आजकल लिख नहीं रहे हैं। कभी-कभी जब मैं नाराज होकर फेसबुक से बाहर होने की बात करने लगता हूं तो फौरन लोग उदास हो जाते हैं। ऐसा बेमिसाल प्यार मिला है मुझे अपने फेसबुक मित्रों से और उनके मित्रों से। फेसबुक तो चेन है जो लाखों लोगों तक आपको जोड़ती है। पांच हजार मेरे मित्र हैं और इससे अधिक फालोअर। यही हाल मेरे पेज का है अब सोच लीजिए कि यह संख्या जब उनके मित्रों और उनके ही मित्रों से मिलकर अनेक गुणित होती है तो स्वत: लाखों में पहुंच जाती है।

इस फेसबुक मीडिया में मैने वह लिखा जो मैं लिखना चाहता था पर मेनस्ट्रीम मीडिया की तमाम पेशेगत मजबूरियों के चलते लिख नहीं पा रहा था। सामाजिक समीकरणों पर, संदर्भों पर और राजनीति से लेकर हर विषय तक बेबाक होकर टिप्पणियां कीं। कई नामी-गिरामी लोग मुझसे चिढ़े नाराज होकर हमले किए और मार देने की धमकियां दीं। लेकिन एक बात वे भूल गए कि जो आदमी दो दशक तक मेनस्ट्रीम मीडिया के कई राष्ट्रीय व बड़े घरानों में संपादक रहा हो उसे कोई ऐरा-गैरा भला क्या छका पाएगा। नतीजा कि वे हार मान गए। लेकिन उनकी हार के पीछे यही मेरे आभासी मित्रों की ताकत रही। जब भी किसी ने कुछ कहा तो दूर बेगूसराय में बैठे मित्र इफातुर रहमान ने कहा कि सर चिंता न करें जहां आपका पसीना गिरेगा मेरा लहू गिरेगा। भाजपा के ही पूर्व विधायक रूप चौधरी ने कहा कि सर दो हजार गुज्जर वीर आपके दरवाजे खड़े हैं कतई चिंता न करिएगा। ऐसे एक नहीं हजारों वीर मेरी सुरक्षा में रहे। वे कांग्रेसी थे, भाजपाई थे, सपाई थे और बसपाई थे व हैं तथा रहेंगे। हिंदू हैं, मुसलमान हैं, सिख हैं व ईसाई व जैन-बौद्घ। वे हैं, यादव-कुर्मी-लोध व गूजर हैं तथा असंख्य जाट हैं।

आज मुझे अपने इस मीडिया संस्थान से इतना प्यार है कि मुझे मेनस्ट्रीम मीडिया के काबिल से काबिल संपादक की तुलना में ज्यादा ज्ञान है कि लोग क्या पढऩा चाहते हैं और क्या खारिज करना चाहते हैं। किस बात पर ताली पड़ेगी और किस बात पर गाली। यह माकेर्टिंग का फंडा हो सकता है लेकिन मेरा मानना है कि लोकप्रियता अर्जित करना और वह भी संवैधानिक दायरे में रहकर सबसे बड़ी उपलब्धि है। फेसबुक मेरा लिटमस टेस्ट था और मैने उसे पास किया। आज मुझे पता है कि मुझे अपना शेष जीवन पूरे सम्मान के साथ बिताने के लिए न तो निराश होना पड़ेगा न किसी की नसीहत माननी होगी। यह फेसबुक की भारी जीत है। फेसबुक आज वह मीडिया बन चुका है जो सरकारें हिला सकता है और बना भी सकता है। जो नायक गढ़ सकता है और अगर वह खरा न उतरा तो उसे नायकत्व से खारिज भी कर सकता है।

मेरी एक फेसबुक पोस्ट पर उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बुजुर्ग पत्रकार साथी महरुददीन खाँ को पूरी पुलिस सुरक्षा दिलाई और उनके प्रमुख सचिव श्री नवनीत सहगल अक्सर हालचाल लेते रहते हैं। इसी फेसबुक पर ध्रुव गुप्त से परिचय हुआ जो बिहार के आईजी पुलिस रह चुके हैं और पुलिस को मानवीय संस्कार प्रदान करने के लिए सदैव प्रयासरत रहे। एसआर दारापुरी मिले जिन्होंने मुझे डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को फिर से पढऩे की प्रेरणा दी। कंवल भारती मिले और अतुल गंगवार मिले। दिव्यांशु पटेल मिले, चंचल बीएचयू मिले और यायावर राजीव उपाध्याय से मुलाकात हुई। ब्रजमोहन प्रसाद, अमित चतुर्वेदी और जगदीश्वर चतुर्वेदी व पंकज चतुर्वेदी मिले। विजय पुष्पम पाठक मिली जो शायद मेरठ की हैं जहां से मेरा लगाव संभवत: कानपुर के बाद सबसे अधिक है। आर्य समाजी वीर डा. अजीत मिले, मुंहफट बीएस गौतम मिले, मस्त मौला जफर इरशाद मिले और डॉ. इमरान इदरीस मिले जो एक दिन मुझसे मिलने के लिए बदायूं से भागे-भागे आए तब जब मैं कानपुर सेंट्रल स्टेशन पर स्वर्ण शताब्दी एक्सप्रेस के एक्जीक्यूटिव कोच में चढ़ ही रहा था। उन्होंने फटाक से मेरा सूटकेस संभाला और ठीक पुत्र की भांति भावुक होकर विदा किया। कुमार कुलदीप, राजीव रंजन उपाध्याय, देवेंद्र यादव, देवेंद्र सुरजन, गीता देव, मैत्रेयी पुष्पा, सुधा अरोड़ा, सुनीता सनाढ्य पांडेय, सुधा शुक्ला, संगीता पुरी, नूतन यादव मिलीं। यहीं पर मिले डॉ गिरीश मिश्र और डॉ वीरेंद्र यादव जिन्होंने मुझे अच्छी और विचारपूर्ण पुस्तकें पढऩे की प्रेरणा दी। और तमाम असंख्य परिजन। सबके नाम तो नहीं लिख पा रहा लेकिन उनका स्नेह नहीं भुलाया जा सकता।

यह दिलचस्प नहीं है कि फेसबुक से दोस्ती हुई और एक दिन मोहित खान आगरा का पंछी पेड़ा लेकर मेरे आवास पर आ गए। शिवानंद द्विवेदी शहर देवरिया का टिकट लेकर आ गए कि सोशल मीडिया के सम्मेलन में आपको चलना है। पृथक बटोही अपनी गाड़ी लेकर आ गए कि आप को गांधी पीस फाउंडेशन चलना है। वसीम अकरम त्यागी और जमाल अंसारी ने मेरे लेखों को उर्दू में प्रकाशित करने का जिम्मा लिया तो संतोष उपाध्याय ने एक दिन मीठे का थाल ही भिजवा दिया। मोहम्मद जाहिद ने इलाहाबाद से मेरे लिए गांधी जयंती की पूर्व संध्या पर बुके भेजा। लखनऊ के जेमिनी इंटरकांटीनेंटल होटल में जब मैने गत आठ मार्च को फेसबुक लेखकों का एक सम्मेलन किया था तब मित्र सिद्घार्थ कलहंस, हेमंत तिवारी, वीर विनोद छाबड़ा, ताजीन खान, सिद्घार्थ द्विवेदी मनु, जीतेंद्र खन्ना और राकेश तिवारी पूरा दिन उपस्थित रहे। हालांकि मुझे इस बीच एकधिक बार ऐसे तमाम लोगों ने कोसा जो विघ्नसंतोषी होना जिनका गुण है। एकाध निराश बुढउओं ने मेरी लोकप्रियता से चिढ़कर अनर्गल आरोप लगाए तो एक एनआरआई मोहतरमा ने विचारहीनता का आरोप। एक अल्पसंख्यक छोकरे ने गालियां दीं और एक एनआरआई भोंपू ने अपने कम्युनिज्म का छिछोरापन दिखाया। पर उन्हें माफ ही किया जा सकता है। क्योंकि मेरे साथ असंख्य जनता की ताकत रही। लेकिन हां, एक बात अवश्य नोट किया जाए। मैने कभी भी अपने फेसबुक मित्रों को तंग नहीं किया। मसलन कभी बिना किसी वाजिब वजह के किसी को कोई मेसेज नहीं भेजा। कभी भी किसी को टैग नहीं किया और न ही कभी किसी पर कोई अभद्र टिप्पणी की। मेरा मानना है कि हमें बिलावजह किसी की निजता को भंग नहीं करना चाहिए।

हमारे फेसबुक मित्र और रियल जीवन में मेरे पुत्र का दरजा प्राप्त संजय सिन्हा इसी फेसबुक को मेरे जीवन की बड़ी उपलब्धि मानते हैं। उन्होंने इस उपलक्ष्य में फेसबुक लेखकों की सभा बुलाई है नई दिल्ली स्थित छतरपुर के एक फार्म हाउस में कल सुबह दस बजे से चार बजे के बीच। वे खम ठोक कर कह रहे हैं कि वहां पर वे खिलाएंगे, पिलाएंगे और एक-दूसरे को सुनेंगे व सुनाएंगे। तो मिलिए कल सुबह दस से चार के बीच।

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One thought on “आभासी दुनिया की ताकत और उसके रिश्ते!

  1. satish sharma

    सौभाग्य की बात है जो घूमते भटकते आपका ब्लॉग मिल गया।अब पढ़ने की प्यास कुछ तो मिटेगी।

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