गढ़ कुंडार की यात्रा

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मौसम गढ़ कुंडार जाने का है
तुर्कों के आने के पहले की भारतीय सभ्यता और शिल्प तथा आर्कीटेक्ट देखना हो तो गढ़ कुंढार जरूर जाना चाहिए। झांसी से कुल 91 किमी दूर यह किला टीकमगढ़ जिले में है। 11 वीं सदी में बने इस पचमहले दुर्ग को खंगार राजाओं ने बनवाया था। इसकी दो मंजिलें जमीन के नीचे और तीन ऊपर हैं। एक पहाड़ी के ऊपर बने इस किले के सबसे ऊँचे टीले पर बैठकर बाहर की तरफ देखा जाए तो ऐसा लगता है यह झील के ऊपर बना है। दरअसल यह एक कुंड पर पडऩे वाली सूर्य की छाया की बिना पर बना था। इसका अर्थ ही है कुंड का अर्क। सन् 1180 में राजा खेतसिंह खंगार ने यह इलाका चंदेल राजाओं से जीता था। और उनके किले जिनगढ़ को अपनी राजधानी बनवाई। बाद में उनके पोते राजा खूब सिंह ने यहां पर गढ़ कुंढार किला बनवाया। जिनगढ़ के अवशेष अभी भी विद्यमान हैं। बाद में जब खंगारों का प्रताप बढ़ा तो चंदेल उनसे डर कर हिमाचल में जाकर बस गए। इस किले में गिद्ध वाहिनी मां गज आनन का मंदिर भी है जो खंगारों की कुलदेवी थीं।
1347 में मुहम्मद तुगलक ने खंगार राजाओं से यह इलाका जीत लिया और उन्होंने बुंदेला नरेशों को यह किला सौंप दिया। राजा मानसिंह की राजकुमारी ने तुगलक के आक्रमण के दौरान जौहर कर लिया। और अब वहां राजकुमारी केसर दे की पूजा की जाती है। हालांकि महल के नीचे मुसलमानों का ही गांव है पर वे केसर दे की पूजा नियमित रूप से करते हैं। खंगारों के पतन के बाद उनका सम्मान घटता चला गया। और वे इधर-उधर फैल गए। हालांकि वे अपने को क्षत्रिय कहते हैं पर चंदेल अथवा बुंदेले क्षत्रिय उनसे शादी विवाह नहीं करते। लेकिन खंगार एक बहादुर और आन-बान-शान वाले क्षत्रिय थे पर पराजय के चलते उनका वंश डूबता चला गया।
मैं हर साल मार्च के पहले हफ्ते में गढ़ कुंढार जरूर जाता हूं। मैं तो कानपुर से वाया कार जाता हूं। पर दिल्ली से शताब्दी के जरिए झांसी पहुंचिए और वहां से किसी भी ट्रांसपोर्ट से ओरछा जाकर रुकिए। ओरछा मध्यप्रदेश सरकार के इकोनामी होटल भी हैं और रिजॉर्ट भी। वहां के राजा महाराज मधुकर शाह का महल भी अब रिजॉर्ट बन गया है। ओरछा से टैक्सी के जरिए आप गढ़ कुंढार जा सकते हैं। पर वहां न तो पीने के पानी की व्यवस्था है न कुछ खाना-पीना मिलेगा। इसलिए बेहतर है कि आप पहाड़ी के ऊपर जाकर किला देखने के पूर्व ही नीचे के गांव में किसी को पैसा दे जाइए। और यकीन मानिए कि अगर आप मांसाहारी हैं तो वे तत्काल कोई खस्सी मार कर पका देंगे तथा गेहूं पीसकर आटा निकालेंगे और उसी आटे की रोटियां मिलेंगी। अगर शाकाहारी हैं तो दाल रोटी और चावल। अगर वाकई अब एक गांव में रहना चाहते हैं तो उस गांव में रह भी सकते हैं

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2 thoughts on “गढ़ कुंडार की यात्रा

  1. अशोक सूर्यवेदी

    गरिमामयी यात्रा की शानदार प्रस्तुति ……!

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